गहरी सोच और दूरंदेशी के लिए याद आते रहेंगे अरुण जेटली

RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: August 24, 2019, 1:43 PM IST
गहरी सोच और दूरंदेशी के लिए याद आते रहेंगे अरुण जेटली
किसी विषय पर विचार रखने से पहले जेटली गंभीरता के साथ विषय को सोच समझ लेते थे.

सिर्फ वकील (Advocate) के तौर पर ही तर्कपूर्ण व्यवाहर करते थे, बल्कि नेता (Politician ) के तौर पर भी बाखूबी समझते थे एक छोटे से बयान का भी क्या असर हो सकता है.

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अरुण जेटली (Arun Jaitley) को मोदी सरकार-1 (Modi Government-1) में बेहद ताकतवर मंत्री के तौर पर देखा गया था. ये दिगर बात है कि मोदी सरकार-2 (Modi Government-2)  में सेहत संबंधी कारणों से वे शामिल नहीं हुए. हालांकि, ये भई याद रखने वाली बात है कि जब अरुण जेटली (Arun Jaitley) ने मंत्री पद ग्रहण करने से अनिच्छा जताई थी तो प्रधानमंत्री खुद उनके आवास पर गए थे और कहा गया था कि पीएम मोदी उन्हें मनाने गए हैं. फिर भी जेटली सरकार में नहीं शामिल हुए. उनका स्वास्थ्य पिछली सरकार में ही काफी गिर गया था. यहां तक कि इलाज के लिए देश से बाहर होने के कारण वे बजट भी नहीं पेश कर पाए थे. दरअसल इससे पहले वाली मोदी सरकार में जेटली महत्वपूर्ण स्थिति उनकी गहरी सोच और तर्कपूर्ण फैसलों के कारण बनी हुई थी.

जेटली गंभीरता के साथ विषय को सोच समझ लेते थे

किसी विषय पर विचार रखने से पहले जेटली गंभीरता के साथ विषय को सोच समझ लेते थे. ये भी कहा जा सकता है कि तर्कपूर्ण सोच उनकी पेशागत विशेषता थी. क्योंकि वकालत के पेशे में तर्क ही काम करते हैं, लेकिन एक मौके पर उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में जो कुछ कहा था वो अपने आप में बहुत अहम है. उससे पता चलता है कि दूरंदेश सोच जेटली की खासियत थी.

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अरुण जेटली बीते दो दशकों से भी ज्यादा समय से देश की नीति निर्धारण और महत्वपर्ण विषयों पर अपनी राय ऱखते आ रहे थे.


बाकया 2002 का है. उस वक्त केंद्र में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार थी. तब मशहूर वकील राम जेठमलानी बीजेपी की तरफ ही हुआ करते थे. बीजेपी हमेशा से कश्मीर पर कुछ पहल करने की कोशिश करती रहती थी. हालांकि, अटल जी हमेशा बातचीत से ही मुद्दे हल करने की पैरवी करते रहे. उस दौरान केंद्र सरकार ने कश्मीर मामले पर विचार करने या पहल करने के लिए एक कमेटी का गठन किया और उसके चेयरमैन बनाए गए राम जेठमलानी (Ram Jethmalani). अरुण जेटली भी कमेटी में सदस्य बनाए गए.

मीडियाकर्मियों के लिए आसानी से उपलब्ध रहते

राम जेठमलानी ने दिल्ली और श्रीनगर दोनो जगहों पर कश्मीर मामलों को लेकर कुछ बयान दे दिए. उस दौर में अरुण जेटली पत्रकारों के लिए अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध होने वाले नेता हुआ करते थे. पत्रकारों के एक-दो जत्थे सुबह शाम उनके आवास पर जाता और जेटली जी बड़े इत्मीनान से औपचारिक औनौपचारिक दोनों तरह से पत्रकारों से बातचीत करते थे. अखबार के रिपोर्टर के तौर पर मैं भी जब तब जेटली जी के आवास पर सबके साथ पहुंच जाता था.
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जेटली कानून के जानकार तो थे ही साथ ही वह एक सुलझे राजनेता भी थे


एक रोज किसी ने बातचीत में कहा कि जेटली जी आप भी कश्मीर मामलों की समिति में हैं. जेठमलानी जी ने दिल्ली और श्रीनगर दोनों जगह पर अपने बयान दे दिए, लेकिन आप इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते. इस पर जेटली जी ने बहुत मार्के वाली कही. उन्होंने कहा जेठमलानी भी बोल देते हैं. उनका मन लेकिन वे इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलना चाहते. फिर भी जब जेटली से कुछ बोलने का कई बार आग्रह किया गया तो उन्होंने कहा - "एक चीज होती है एसपेक्टेशन मैनेजमेंट( लोगों की उम्मीदों का मैनेजमेंट). लोगों की उम्मीदें इतनी नहीं बढ़ा देनी चाहिए कि जब लोगों को नतीजा न मिले तो निराशा हो जाय और लोग आपको असफल कहने लगे."

फिर उन्होंने और समझाया कि कश्मीर मुद्दे कुछ बोलने पर सारे देश का उस पर ध्यान जाता है. फिर लोग उम्मीद करते हैं. फिलहाल कोई नतीजा आने वाला नहीं है. लिहाजा बोलना ही नहीं चाहिए. जेटल का ये सूत्र सिर्फ राजनीति ही नहीं जीवन के बहुत सारे क्षेत्रों के लिए एक समान महत्वपूर्ण है और ज्यादातर निराशा उम्मीदों का मैनेजमेंट न करने के कारण ही होती है. निश्चित तौर पर बिना सोचे समझे बोलने वालों के इस दौर में जेटली जैसे नेताओं की कमी खलेगी.

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First published: August 24, 2019, 1:02 PM IST
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