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कृषि वैज्ञानिकों ने 2 साल पहले ही डेवलप कर लिया था पराली का समाधान, किसानों तक क्यों नहीं पहुंची दवा?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 2, 2019, 1:07 PM IST
कृषि वैज्ञानिकों ने 2 साल पहले ही डेवलप कर लिया था पराली का समाधान, किसानों तक क्यों नहीं पहुंची दवा?
चार कैप्सूल का घोल एक एकड़ में पराली को सड़ाकर खाद बना देगा

पराली (Parali) खत्म करने का सस्ता विकल्प मौजूद तो महंगी मशीनों का प्रमोशन क्यों? कृषि वैज्ञानिकों, किसान नेताओं का सवाल, कृषि राज्य मंत्री (Mos Agriculture) ने दिया ये जवाब

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  • Last Updated: November 2, 2019, 1:07 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली-एनसीआर में पराली से होने वाले प्रदूषण से निपटने का तरीका कृषि वैज्ञानिकों (Agriculture Scientist) ने 2 साल पहले ही खोज लिया था. खेती-किसानी पर रिसर्च करने वाली सबसे बड़ी सरकारी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agricultural Research Institute) पूसा के वैज्ञानिकों ने एक दवा बनाई थी. सवाल यह उठ रहा है कि इतना पहले हुई महत्वपूर्ण खोज की जानकारी अब तक ज्यादातर किसानों (Farmers) तक क्यों नहीं पहुंच सकी है. पराली की समस्या से निपटने के लिए एक तरफ लाखों की मशीनों का बाजार आबाद हो रहा है. उन मशीनों पर सब्सिडी दी जा रही है. तो दूसरी ओर सिर्फ पांच रुपये में पराली को गलाकर खाद बना देने वाले कैप्सूल (Pusa Waste Decomposer) की जानकारी ही किसानों तक नहीं पहुंची.

सस्ते उपाय मौजूद तो महंगी मशीनों का प्रमोशन क्यों?
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं "कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture)  के कुछ अधिकारी और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कुछ वैज्ञानिक सस्ते उपायों की जगह पराली निस्तारण के लिए मशीनों के महंगे विकल्प को प्रमोट कर रहे हैं. पराली कटाई वाली मशीनें बनाने वाली कंपनियों का एक प्रेशर ग्रुप है जो सस्ती चीजों को प्रमोट नहीं होने देता."

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कृषि विभाग मशीनों को ही प्रमोट कर रहा है. उसे भी पूसा के कैप्सूल की जानकारी नहीं!


उधर, राष्ट्रीय किसान संघ के फाउंडर मेंबर बीके आनंद ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि जब पूसा और नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्गेनिक फार्मिंग (National Centre of Organic Farming) के वैज्ञानिकों ने पराली को सड़ाकर खाद बनाने वाला वेस्ट डी-कंपोजर (Waste Decomposer) बना लिया है तो फिर मशीनों को क्यों प्रमोट किया जा रहा है.

15 दिन के लिए क्यों डाला जा रहा किसानों पर बोझ
शर्मा के मुताबिक "पराली तो कृषि उपकरण बनाने वालों के लिए अपनी मशीनें खेतों में डंप  करने का मौका है. पंजाब में 1 लाख ट्रैक्टरों की जरूरत होते हुए 4.5 लाख ट्रैक्टर मौजूद हैं. समझ में नहीं आता कि किसानों पर और मशीनों का बोझ क्यों डाला जा रहा? पंजाब में किसान के कर्ज के पीछे ट्रैक्टरों का बोझ ही है. पराली की समस्या तीन-चार हफ्ते ही चलती है. ये मशीनें साल के ज्यादातर समय बेकार पड़ी रहेंगी."
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क्या कहते हैं मंत्री
इस बारे में जब हमने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि हमने पूसा द्वारा विकसित इस कैप्सूल के प्रचार-प्रसार के लिए अधिकारियों को कहा है. एक बार और निर्देश दिया जाएगा ताकि यह किसानों तक पहुंच जाए. हमारी कोशिश होगी कि कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए इसका भरपूर प्रचार हो. ताकि पराली की समस्या से सस्ते में निजात मिले.

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मशीन की मदद से धान की कटाई से बढ़ी है पराली की समस्या (File Photo)


सब्सिडी के बाद भी इसलिए महंगा है मशीन का विकल्प

पराली की समस्या तब से पैदा हुई है जब से धान की फसल मशीनों से कट रही है. मशीन एक फुट ऊपर से धान का पौधा काट देती है. जो शेष भाग बचता है वो किसान के लिए समस्या बन जाता है. इसे कटवाने की बजाए किसान जला देता है. इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कंपनियों ने मशीन तैयार की है. इसका नाम पैड्डी स्ट्रॉ चौपर (Paddy Straw Chopper Machine) है.

इसका दाम है 1.45 लाख. इसे ट्रैक्टर के साथ जोड़ दिया जाता है और यह पराली के छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर खेत में फैला देती है. बारिश होते ही पराली के ये टुकड़े मिट्टी में मिलकर सड़ जाते हैं. इन मशीनों पर 50 फीसद तक की सब्सिडी है. पराली निस्तारण के लिए मार्केट में सात-आठ तरह की मशीनें मौजूद हैं. महंगी होने की वजह से ज्यादातर किसान भाई इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाते और वे पराली को जला देते हैं.

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प्रदूषण और प्रदर्शन: सस्ते समाधान की तरफ किसी का ध्यान नहीं (File Photo)


क्या कहते हैं वैज्ञानिक
पूसा में इस कैप्सूल को विकसित करने वाली टीम में शामिल रहे माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल साइंटिस्ट युद्धवीर सिंह कहते हैं कि वैज्ञानिकों की एक टीम करीब डेढ़ दशक से इस कैप्सूल को विकसित करने में जुटी हुई थी. इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है. किसान अभी इसे पूसा से मंगा सकता है. इसकी खुली मार्केटिंग नहीं हो पा रही. इसे किसानों तक पहुंचाने का इंतजाम करना चाहिए.

पूसा का कैप्सूल: कमाल की खोज
कृषि विज्ञान केंद्र सहारनपुर के इंचार्ज एवं प्लांट प्रोटक्शन के प्रोफेसर आईके कुशवाहा का कहना है कि उन्होंने किसानों से इसका इस्तेमाल करवाया है. यह कमाल की खोज है. यह पराली खत्म करने का रामबाण ईलाज है. इतना सस्ता है कि किसान पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा. इस कैप्सूल में फसलों के मित्र फंगस होते हैं. जो एक तरफ पराली को सड़ाते हैं तो दूसरी ओर खेत को उपजाऊ बनाते हैं.

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First published: November 2, 2019, 11:55 AM IST
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