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IPS अधिकारी की फोन टैपिंग पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कहा-इस देश में आखिर क्या हो रहा है?

भाषा
Updated: November 4, 2019, 9:07 PM IST
IPS अधिकारी की फोन टैपिंग पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, कहा-इस देश में आखिर क्या हो रहा है?
कोर्ट ने कहा, ‘किसी के लिए भी निजता नहीं बची है.’

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सीनियर आईपीएस मुकेश गुप्ता (IPS Mukesh Gupta) और उनके परिवार के सदस्यों के फोन टैप कराने की छत्तीसगढ़ सरकार की कार्रवाई पर सोमवार को कड़ा रुख अपनाया.

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सीनियर आईपीएस मुकेश गुप्ता (IPS Mukesh Gupta) और उनके परिवार के सदस्यों के फोन टैप कराने की छत्तीसगढ़ सरकार की कार्रवाई पर सोमवार को कड़ा रुख अपनाया. कोर्ट ने कहा, ‘किसी के लिए भी निजता नहीं बची है.’ शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार से जानना चाहा कि क्या इस तरह से किसी भी व्यक्ति के निजता के अधिकार का हनन किया जा सकता है.

विस्तृत हलफनामा दे राज्य सरकार
जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने राज्य सरकार को सारे मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और कहा कि इसमें यह भी स्पष्ट किया जाए कि फोन की टैपिंग का आदेश किसने दिया और किन कारणों से दिया ?

पीठ ने सख्त लहजे में कहा, ‘ये करने की क्या आवश्यकता है? किसी के लिए कोई निजता बची ही नहीं है. इस देश में आखिर क्या हो रहा है? क्या किसी व्यक्ति की निजता का इस तरह हनन किया जा सकता है? किसने यह आदेश दिया? विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए.’

वकील पर FIR को लेकर जताई नाराजगी
पीठ ने शीर्ष अदालत में आईपीएस अधिकारी का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील के खिलाफ अलग से FIR दायर किये जाने पर भी नाराजगी व्यक्त की और वकील के खिलाफ जांच पर रोक लगा दी. पीठ ने कहा कि इस मामले में अगले आदेश तक कोई दण्डात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा.

राजनीतिक रंग न देने की ताकीद
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पीठ ने आईपीएस अधिकारी मुकेश गुप्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी से कहा कि इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का नाम घसीट कर इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाए. न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिका में पक्षकारों की सूची से मुख्यमंत्री का नाम हटा दिया जाए.

इस वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने अपनी याचिका में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को भी एक प्रतिवादी बनाया है. शीर्ष अदालत ने 25 अक्टूबर को राज्य सरकार को गुप्ता और उनके परिवार के टेलीफोन सुनने या टैप करने से रोक दिया था और इस आईपीएस अधिकारी को उसके खिलाफ दर्ज मामलों में गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया था.

न्यायालय ने राज्य सरकार से यह भी कहा था कि गुप्ता के खिलाफ दर्ज दो FIR में आगे जांच पर रोक लगाने संबंधी अंतरिम आदेश अगले आदेश तक जारी रहेगा. हालांकि, शीर्ष अदालत ने इन FIR को रद्द करने से इंकार कर दिया था. इनमें से एक मामला एक ट्रस्ट द्वारा एफसीआरए के उल्लंघन के बारे में हैं. यह ट्रस्ट आंख के एक अस्पताल का संचालन करता है जिसकी स्थापना गुप्ता के पिता ने की थी.

पुलिस के आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ द्वारा 2015 में नागरिक आपूर्ति घोटाले के दौरान गैरकानूनी तरीके से फोन टैप करने और आपराधिक साजिश रचने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज किये जाने के बाद इस साल नौ फरवरी को विशेष पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता सहित दो आईपीएस अधिकारियों को निलंबित किया गया था.

इस कथित घोटाले का फरवरी, 2015 में उस समय भण्डाफोड़ हुआ था जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने नागरिक आपूर्ति निगम के 26 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे थे. भूपेश बघेल सरकार ने इस मामले की जांच के लिये आठ जनवरी को 12 सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया था.
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First published: November 4, 2019, 9:01 PM IST
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