ANALYSIS: आसान नहीं है अमित शाह होना, पहली बार बीजेपी को मिला इतना समर्पित अध्यक्ष

अमित शाह अगस्त 2014 से बीजेपी के अध्‍यक्ष हैं. उन्होंने न सिर्फ भारत के सियासी नक्शे को भगवामय किया है बल्कि भाजपा को 10 करोड़ सदस्‍यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भी बनवाया है.

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 29, 2019, 2:48 PM IST
ANALYSIS: आसान नहीं है अमित शाह होना, पहली बार बीजेपी को मिला इतना समर्पित अध्यक्ष
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (File Photo)
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 29, 2019, 2:48 PM IST
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में कौन-कौन होगा? इसे लेकर अटकलों और चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है वो है बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का. क्या अमित शाह मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा बनेंगे? और बनेंगे तो उन्हें कौन सा विभाग मिलेगा? लेकिन इससे बड़ा  सवाल है अमित शाह का विकल्प ढूढ़ना. क्योंकि मंत्री बनने के लिए तो प्रधानमंत्री मोदी के पास नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन बीजेपी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं है और वो भी अमित शाह के बाद.

मोदी और शाह के बीच तालमेल का मिला बीजेपी काे फायदा


वरिष्ठ पत्रकार अंबिका नंद सहाय का मानना है कि जनसंघ से लेकर बीजेपी तक संगठन को अमित शाह जैसा समर्पित अध्यक्ष पहली बार मिला है. जिसका असर पार्टी पर साफ-साफ दिखता है. अमित शाह जिस तरह साल के 365 दिन और 24 घंटे पार्टी के लिए अपना शत-प्रतिशत देते हैं, उसका कोई दूसरा उदाहरण किसी भी संगठन में देखने को नहीं मिला. अंबिका नंद सहाय का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह में जैसा तालमेल है, वैसा इसके पहले किसी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री में देखने को नहीं मिला. साथ ही इन संबंधों का पार्टी के सगंठन पर हमेशा सकारात्मक असर रहा. ऐसे में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमित शाह का विकल्प तलाशना है, क्योंकि पार्टी संविधान लगातार दो बार से ज्यादा अध्यक्ष रहने की इजाजत नहीं देता.

नया पार्टी अध्यक्ष चुनना आसान नहीं

अंबिका नंद सहाय का मानना है कि मीडिया में जो नाम बीजेपी अध्यक्ष के लिए आ रहे हैं, उनसे अमित शाह की तुलना करना सूरज को दीया दिखाने जैसा है. चाहे वो संगठन पर पकड़ की बात हो या प्रधानमंत्री से तालमेल, फिलहाल बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में अमित शाह की तुलना में उनके आस-पास भी कोई दिखाई नहीं देता. ऐसे में जब बीजेपी पश्चिम बंगाल और दक्षिण में अपने विस्तार में लगी है तो पार्टी और सरकार में तालमेल बहुत जरूरी है. जिस तरह पार्टी ने पश्चिम बंगाल में ममता का किला दरका दिया है, ऐसे में पार्टी संगठन में इतने बड़े फेरबदल पर फैसला लेना पीएम मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के लिए आसान नहीं है.

आखिर ये चुनौती इतनी बड़ी क्यों है?
अमित शाह अगस्त 2014 से बीजेपी के अध्‍यक्ष हैं. उन्होंने न सिर्फ भारत के सियासी नक्शे को भगवामय किया है बल्कि भाजपा को 10 करोड़ सदस्‍यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भी बनवाया है. इसके पीछे उनकी रणनीति और मेहनत है. 2016 के विधानसभा चुनावों में असम, त्रिपुरा में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. यही नहीं कर्नाटक, ओडिशा और पश्‍चिम बंगाल में भी मजबूती से उभरी. 2019 का चुनाव भी जीत लिया. इसलिए कोई इससे इनकार नहीं कर रहा है कि बीजेपी के अब तक के शानदार सफर के सबसे बड़े सेनानी अमित शाह हैं. ऐसे में बीजेपी को यहां से आगे ले जाना आसान नहीं है, क्योंकि आने वाली चुनौती पश्चिम बंगाल, केरल, आध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में विस्तार है जहां बीजेपी अपनी स्थापना के बाद से अपने लिए ठोस जमीन नहीं तलाश पाई है.
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