ABVP, बापसा और छात्र राजद के बावजूद JNU में ऐसे जीता लेफ्ट

लेफ्ट संगठन एकजुट न होते तो जेएनयू में भगवा झंडा लहरा सकता था. हालात भांपते हुए एकत्र हुए थे लेफ्ट के चार संगठन, गठबंधन राजनीति के लिए रोल मॉडल हो सकता है ये चुनाव!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 18, 2018, 1:43 PM IST
ABVP, बापसा और छात्र राजद के बावजूद JNU में ऐसे जीता लेफ्ट
लेफ्ट संगठन एकजुट न होते तो जेएनयू में भगवा झंडा लहरा सकता था. हालात भांपते हुए एकत्र हुए थे लेफ्ट के चार संगठन, गठबंधन राजनीति के लिए रोल मॉडल हो सकता है ये चुनाव!
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 18, 2018, 1:43 PM IST
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट ने पहले ही भांप लिया था कि यहां पर भगवा झंडा यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कमजोर नहीं है. इसलिए चार लेफ्ट संगठनों ने सारे मतभेद भुलाकर महागठबंधन करने का फैसला लिया, वरना यहां तस्‍वीर कुछ और होती. लेफ्ट के छात्र नेताओं का कहना है कि जेएनयू  के विद्यार्थी देश के नेताओं के मुकाबले ज्यादा अच्‍छी राजनीतिक समझ रखते हैं. हालात को ज्‍यादा गहराई से समझते हैं और इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह चुनाव था. एबीवीपी कहीं भी कमजोर नहीं थी, फिर भी समझदारी से काम लिया तो वह बाहर हो गई. तो क्या विपक्ष के लिए जेएनयू का चुनाव कोई आइडिया हो सकता है? कैसे नीले और भगवा ब्रिगेड के उभार के बावजूद तीन साल से गठबंधन की वजह से लेफ्ट अपना किला बचाए हुए है. पहले दो, फिर तीन और इस बार हालात भांपते हुए चार वाम संगठनों ने मिलकर चुनाव लड़ा.

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि जेएनयू इलेक्शन से राष्ट्रीय राजनीति आइडिया ले सकती है. आइडिया ये कि जब किसी एक ताकत का उदय हो रहा हो तो एक हो जाना चाहिए. बापसा पहले से कमजोर हुआ है, इसकी वजह है छात्र राजद की एंट्री. इससे भी कुछ सीखा जा सकता है.

आमतौर पर जेएनयू में लेफ्ट बनाम लेफ्ट की लड़ाई ही दिखती रही है, क्योंकि यह वामपंथी किला माना जाता है. हालांकि एबीवीपी ने 2015 में यहां सेंध लगा ली. उसने संयुक्‍त सचिव की एक सीट जीत ली थी. इसके बाद वहां लेफ्ट संगठनों को दक्षिणपंथी ताकत के उभार का डर सताने लगा. जैसे-जैसे जमीन खोने का डर सताने लगा लेफ्ट का गठबंधन पहले से ज्‍यादा मजबूत होता गया. 2016 में आईसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन) और एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) ने साथ चुनाव लड़ा था.

साल 2017 का चुनाव आया, तो इस गठबंधन में आईसा और एसएफआई के साथ डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्‍टूडेंट्स फेडरेशन) भी शामिल हुआ. लेफ्ट यूनिटी की ही गीता कुमारी ने जीत हासिल की थी, लेकिन लेफ्ट के तीन छात्र संगठनों के साथ आने के बावजूद एबीवीपी की निधि त्रिपाठी दूसरे स्थान पर रही थीं. लेफ्ट की जीत का रथ रोकने के लिए इस बार एबीवीपी और बापसा दोनों खड़े थे.

इस चिंता में इस साल यानी 2018 में एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फैडरेशन) भी लेफ्ट यूनिटी का हिस्सा हो गया. आइसा की नेशनल प्रेसिडेंट और जेएनयूएसयू की अध्यक्ष रहीं सुचेता डे ने माना था कि एबीवीपी कैंपस में मजबूत हुई है, इसीलिए लेफ्ट यूनिटी बनी है.

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साल 2015 में अध्‍यक्ष पद के लिए एबीवीपी को 956 वोट मिले थे. 2016 में 1048 और 2017 में 1042 वोट हासिल हुए. 2018 में एबीवीपी के ललित पांडे को अब तक 875 वोट हासिल हुए हैं. लेफ्ट के एन. साईं बालाजी को 1948 वोट मिले हैं. बापसा के थल्लापल्ली प्रवीण को 635,  छात्र राजद के जयंत कुमार 'जिज्ञासु' को 479 और एनएसयूआई के विकास यादव को 365 वोट मिले हैं.

इसका विश्लेषण करें तो ये साफ दिखता है कि एबीवीपी ज्यादा कमजोर नहीं थी, सिर्फ महागठबंधन और छात्र राजद की वजह से उसे शिकस्त मिली है. छात्र राजद की वजह से बापसा भी कमजोर हो गई है.
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