लाइव टीवी

OPINION: भगत सिंह कोश्यारी ही नहीं, देश के इन राज्यपालों के फैसलों पर भी उठे हैं सवाल

Dinesh Gupta | News18India
Updated: November 26, 2019, 6:42 PM IST
OPINION: भगत सिंह कोश्यारी ही नहीं, देश के इन राज्यपालों के फैसलों पर भी उठे हैं सवाल
वर्ष 1998 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाने में भूमिका निभाई थी. वे तीन दिन के लिए ही मुख्यमंत्री बन पाए. (File Photo)

महाराष्ट्र में चले सियासी घमासान के बीच राज्य के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshiyari) चर्चा में रहे, उन्हें लेकर तमाम तरह के सवाल भी उठे. लेकिन कोश्यारी देश के अकेले ऐसे राज्यपाल (Governer) नहीं हैं जिनके कारण इस संवैधानिक पद पर सवाल खड़े हुए हों.

  • News18India
  • Last Updated: November 26, 2019, 6:42 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. महाराष्ट्र के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshiyari) देश के अकेले ऐसे राज्यपाल (Governor) नहीं हैं, जिनके कारण इस संवैधानिक पद पर सवाल उठ खड़े हुए हैं. सवाल राज्यपाल की विवेकशक्ति पर भी उठे हैं. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राज्यपालों के फैसले भी बदले हैं. इनमें से महत्वपूर्ण उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार को बर्खास्त करने का फैसला भी एक है.

'इंदिरा युग में कठपुतली बन गए थे राज्यपाल'
राज्य में राज्यपाल केन्द्र के प्रतिनिधि की भूमिका निभाता है. सामान्यत: राज्यपाल के राजनीतिक निर्णय केन्द्र की सरकार के रूख पर निर्भर करते हैं. अस्सी के दशक में राज्यपालों के कई फैसले विवाद में रहे हैं. सबसे दिलचस्प मामला आंध्र प्रदेश का था. यहां एनटी रामाराव के नेतृत्व वाली तेलगू देशम पार्टी की सरकार थी. चुनाव वर्ष 1983 में हुए थे. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ दिन पहले एनटी रामाराव हार्ट सर्जरी कराने के लिए अमेरिका गए हुए थे. रामाराव सरकार को गिराने की योजना बना रही कांग्रेस ने मौके का फायदा उठाया. रामाराव सरकार के वित्त मंत्री नांदेडला भास्कर राव को तोड़ लिया गया. भास्कर राव ने 92 विधायकों को तोड़ने का दावा किया. कांग्रेस ने अपने 57 विधायकों का समर्थन दे दिया.

एआईएमआईएम और निर्दलीय विधायकों के समर्थन के आधार पर राज्यपाल रामलाल ने भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. भास्कर राव पर विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर की सूची राज्यपाल को देने के आरोप भी लगे. भास्कर राव सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए. बाद में केन्द्र सरकार ने रामलाल को हटाकर डॉ. शंकर दयाल शर्मा को आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बना दिया. बाद में कांग्रेस को इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा नुकसान आंध्रप्रदेश में उठाना पड़ा. इंदिरा गांधी की छवि को भी भारी नुकसान हुआ था. यही कारण था कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भी कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में वो सफलता नहीं मिली, जो अन्य राज्यों में मिली थी.

जगदंबिका पाल भी फडणवीस की तरह ही बने थे मुख्यमंत्री
जगदंबिका पाल वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी में है. वे उत्तरप्रदेश के सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं. वे सिर्फ तीन दिन के लिए मुख्यमंत्री बने थे. उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में भी राज्यपाल की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण रही थी. रोमेश भंडारी उत्तरप्रदेश के राज्यपाल थे. भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया. कल्याण सिंह ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को सही नहीं माना. कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बन गए. यह घटनाक्रम वर्ष 1998 का है.

नाराज देवीलाल ने राज्यपाल तवासे पर फेंक दी थी स्याही
Loading...

हरियाणा के राज्यपाल के तौर पर जीडी तवासे उस वक्त चर्चा में आए थे, जब 1982 में भजनलाल ने देवीलाल के कई विधायकों को अपने पक्ष में करके मुख्यमंत्री का पद हासिल कर लिया था. नाराज देवीलाल ने राजभवन में जाकर तवासे के मुंह पर स्याही फेंक दी थी. चुनाव में किसी राजनीतिक दल को बहुमत न मिलने के कारण विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर बूटा सिंह भी विवाद में रह चुके हैं.

वर्ष 2002 से 2006 तक बूटा सिंह बिहार के राज्यपाल थे. 2005 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिला तो बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो राज्यपाल की भूमिका पर गंभीर टिप्पणियां भी आईं. कोर्ट ने कहा कि एक खास पार्टी को सत्ता में लाने की मंशा के कारण ही केन्द्र सरकार को राज्य के हालात के बारे में सही सूचना नहीं दी गई. पी वेंकटसुबैया लगभग दो साल कर्नाटक के राज्यपाल बने. एसआर बोम्मई सरकार की बर्खस्तगी इन्हीं कार्यकाल में हुई थी. सुबैया ने उस समय कहा कि बोम्मई सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है.

चर्चित बोम्मई केस से सबक नहीं लेते राज्यपाल
राज्यपाल ने बोम्मई को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका भी नहीं दिया था. सुप्रीम कोर्ट में बोम्मई की जीत हुई. मार्च, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक खंडपीठ ने एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में बहुचर्चित निर्णय दिया था. इसमें संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश थे. एक अन्य दिलचस्प वाक्या कर्नाटक का ही है. यूपीए-1 की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हंसराज भारद्वाज कर्नाटक के राज्यपाल थे. उन्होंने बीएस येदियुरप्पा की बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त किया था. तर्क दिया गया उन्होंने फर्जी तरीके से बहुमत हासिल किया. उन्होने येदुयुरप्पा को दोबारा बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा और फिर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भी कर दी.

उत्तरखंड भी देख चुका है राज्यपाल की भूमिका का तमाशा
एनडीए-1 के दौरान उत्तराखंड में भी राज्यपाल का फैसला काफी विवाद में रहा था. उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार को अल्पमत बताकर राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया. कहा गया कि नौ विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है. तब केके पॉल उत्तराखंड के राज्यपाल थे. राजनीतिक संकट की स्थिति उस वक्त बनी जब विधानसभा अध्यक्ष ने मत विभाजन की मांग को अनदेखा कर विनियोग विधेयक को पारित घोषित कर दिया. विपक्ष का आरोप था कि बहुसंख्यक सदस्यों ने ध्वनिमत से विधेयक को नामंजूर किया है. कांग्रेस के नौ बागी विधायक भी विधेयक के विरोध में बताए गए. विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो फैसला हरीश रावत के पक्ष में आया.

प्रधानमंत्री मोदी का भी हो चुका है राज्यपाल से टकराव
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यपाल से टकराव हो चुका है. मुद्दा लोाकयुक्त की नियुक्ति से जुड़ा हुआ था. कमला बेनीबाल राज्य की राज्यपाल थीं. केंद्र सरकार की ओर से सभी राज्यों को सरकार की निगरानी के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति करने के लिए कहा गया था. कमला बेनीवाल ने राज्य सरकार की मंजूरी के बिना राज्य के पूर्व न्यायाधीश आरए मेहता को राज्य का पहला लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था.

यह भी पढ़ें: 

महाराष्ट्र में चुनाव परिणाम से लेकर SC के फैसले तक कब क्या हुआ, यहां पढ़ें

महाराष्ट्र: गेंद फिर से राज्यपाल के पाले में, क्या कहते हैं संविधान के जानकार

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए Mumbai से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 26, 2019, 6:06 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...