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तिहाड़ जेल में ऐसे दी जाती है फांसी, 12 फुट गहरे गड्ढे में 2 घंटे तक लटका रहता है दोषी

Anand Tiwari | News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 11:37 AM IST
तिहाड़ जेल में ऐसे दी जाती है फांसी, 12 फुट गहरे गड्ढे में 2 घंटे तक लटका रहता है दोषी
35 साल तिहाड़ जेल के लॉ अफसर और प्रवक्ता रहे सुनील गुप्ता ने विस्तार से यह बताया कि, कैसे फांसी दी जाती है

तिहाड़ जेल (Tihar Jail) के पूर्व लॉ अफसर सुनील गुप्ता (Sunil Gupta) ने बताया कि तैयारी के लिए सजायाफ्ता शख्स के कद और वजन के हिसाब से फांसी (Capital Punishment) से ठीक पहले डमी के साथ प्रक्रिया की जाती है.

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  • Last Updated: December 11, 2019, 11:37 AM IST
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नई दिल्ली. 35 साल तक तिहाड़ जेल (Tihar Jail) के लॉ अफसर और प्रवक्ता रहे सुनील गुप्ता (Sunil Gupta) ने फांसी देने की पूरी प्रक्रिया की मंगलवार को जानकारी दी. उन्होंने बताया कि फांसी देने से पहले ब्लैक वॉरंट (Black Warrant) जारी होता है, जिसको डेथ वॉरंट भी कहते है. यह वॉरंट न्यायिक प्रकिया पूरी होने और दोषी की सभी अपीलें खारिज होने के बाद ही जारी किया जाता है. ब्लैक वॉरंट पर फांसी पर लटकाने की तारीख और समय दिया होता है. अब सुप्रीम कोर्ट के नए नियम के हिसाब से ब्लैक वॉरंट की कॉपी फांसी होने वाले दोषी को देनी होती है. जो जज ब्लैक वॉरंट जारी करता है, उसको भी दोषी की बात सुननी होती है कि वह क्या कहना चाहता है. ब्लैक वॉरंट जारी होने के बाद दोषी से पूछा जाता है कि आप क्या अपने परिवार से मिलना चाहते हैं. अगर दोषी की इच्छा होती है तो परिवार के लोगों से फांसी से पहले उससे एक बार मिलवाया जाता है.

दोषी को सुबह 5 बजे या उससे थोड़ा पहले उठाया जाता है
सुनील गुप्ता ने बताया कि जिस दिन फांसी होनी होती है, उस दिन दोषी को सुबह 5 बजे या उससे थोड़ा पहले उठाया जाता है. नित्य क्रिया करवाई जाती है. अगर उसे नाश्ता करना है तो वो भी कराया जाता है. फिर इलाके के मजिस्ट्रेट, जेल में आते हैं. वो फांसी पर चढ़ने वाले दोषी से पूछते हैं कि आप अपनी जमीन, जायदाद किसी के नाम करना चाहते हैं क्या. अगर दोषी बोलता है, करना है तो वो प्रकिया करवाई जाती है, पर ज्यादातर दोषी ये करते नहीं हैं.

फांसी से पहले बांध दिए जाते हैं दोषी के हाथ-पैर

तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ अफसर ने बताया कि, फांसी वाली जगह यानी फांसी कोठी में जो जल्लाद (हैंगमैन) आता है, वह फांसी होने वाले दोषी से पूछता है कि कुछ खाना है आपको? अगर वह हां बोलता है तो उसे खाना दिया जाता है. फिर हैंगमैन दोषी को काले कपड़े पहना देता है. वह दोषी के हाथ पीछे से बांध देता है, उसके पैर भी बांध दिए जाते हैं. चेहरा काले थैले जैसे कपड़े से छिपा दिया जाता है. दोषी को काला कपड़ा पहना दिया जाता है, फिर दोषी को फांसी के तख्ते पर खड़ा कर दिया जाता है. उसके बाद दोषी के गले में फांसी का फंदा डाल दिया जाता है. उसके बाद सुपरिटेंडेंट जेल जैसे ही हैंगमैन को बोलता है, हैंगमैन फांसी-तख्त का लीवर खींच देता है. वहां 12 फुट गहरा गड्ढा होता है, जिस पर पटरे लगे रहते हैं. लीवर खींचने के बाद पटरे नीचे की तरफ खुल जाते हैं. उसके बाद 30 मिनट से लेकर 2 घंटे तक दोषी फांसी पर लटका रहता है.

35 साल तिहाड़ जेल के लॉ अफसर और प्रवक्ता रहे सुनील गुप्ता ने विस्तार से यह बताया कि, कैसे फांसी दी जाती है
35 साल तिहाड़ जेल के लॉ अफसर और प्रवक्ता रहे सुनील गुप्ता


डेथ सर्टिफिकेट साथ लगाकर कोर्ट को वापस भेजा जाता हैसुनील ने बताया कि शव को कम से कम 2 घंटे तक लटकाए रखना जरूरी है. मौके पर मौजूद डॉक्टर जांच करते हैं कि दोषी की मौत हो गई है या नहीं. डॉक्टर के कहने के बाद जेल सुपरिटेंडेंट ब्लैक वॉरंट पर साइन करता है कि फांसी हो गई है. इसके बाद डॉक्टर का लिखा डेथ सर्टिफिकेट साथ लगाकर कोर्ट को वापस भेजा जाता है कि आदेश का पालन हो गया है.

दोषियों को फांसी कोठी वाले कंडम सेल में कर दिया जाता है शिफ्ट
उन्होंने बताया कि जेल मैन्युअल और सुप्रीम कोर्ट के नए नियम के बाद शव का पोस्टमार्टम भी जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि कोर्ट की प्रकिया पूरी हुई है या नहीं. फिर जेल सरकार और प्रशासन तय करता है कि शव घर वालों को देना है या नहीं. ब्लैक वॉरंट जारी होने से पहले सभी कैदी एक सामान्य कैदी होते हैं, पर ब्लैक वॉरंट जारी होने के बाद उससे संबंधित दोषियों को फांसी कोठी वाले कंडम सेल में शिफ्ट कर दिया जाता है. उनसे कोई काम नहीं कराया जाता है. उन पर 24 घंटे निगरानी रखी जाती है.

मैंने तिहाड़ में दो बार फांसी देते हुए देखा है: सुनील गुप्ता
तिहाड़ जेल के लॉ अफसर और प्रवक्ता रहे सुनील गुप्ता ने बताया कि, मेरे वक्त में रंगा, बिल्ला को एक साथ लटकाया गया था. फिर करतार, उजागर दोनों दोषियों को एक साथ लटकाया गया था. फिर सतवंत और केहर को भी एक साथ लटकाया गया था. फांसी कोठी एक कंडम सेल है. लकड़ी के झूलेनुमा पटरे होते हैं, ऊपर रस्सी लटक रही होती है, लकड़ी के पटरे हटते ही दोषी का शरीर अपने भार से फांसी के फंदे में झूल जाता है.

सुरक्षा स्टाफ बुला सकता है जेल सुपरिटेंडेंट
सुनील गुप्ता ने बताया कि पहले तिहाड़ में दो लोगों को एक बार में फांसी दी गई है. फांसी सूर्योदय के वक्त दी जाती है. 6 या 6.30 बजे के वक्त. उस वक्त जेल सुपरिटेंडेंट, मेडिकल अफसर. एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट का होना जरूरी है. बाकी सुरक्षा स्टाफ जेल सुपरिटेंडेंट बुला सकता है. फांसी होने के वक्त जेल बंद रहती है. सभी कैदियों को उनकी बैरकों में बंद रखा जाता है. पहले कभी तिहाड़ के पास जल्लाद नहीं था. पुराने मैन्युअल के मुताबिक, जेल प्रशासन भी फांसी दे सकता है.

मुलायम होती है बक्सर के जेल की रस्सी
बक्सर के जेल की रस्सी की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि क्योंकि बक्सर जेल गंगा के किनारे है. वहां विशेष वातावरण होता है, जिसमें रस्सी के रेशे काफी पक जाते हैं फिर उसे बट दिया जाता है. यह रस्सी मुलायम होती है. अगर नॉर्मल रस्सी प्रयोग करेंगे तो फांसी पर लटकने वाला शख्स गिर सकता है, रस्सी टूट सकती है. एक केस में फांसी के वक्त दोषी का गला टूट गया था. बाकी मरने वाले की अंतिम इच्छा फिल्मी बातें हैं. जेल मैन्युअल में ऐसा कुछ नहीं है कि मरने वाले की अंतिम इच्छा पूछी जाती है.

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First published: December 10, 2019, 5:38 PM IST
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