Lok Sabha Election Result 2019 : सपा-बसपा के एकजुट होने के बावजूद इन कारणों से हारा गठबंधन

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा की कथित एकजुटता के बावजूद गठबंधन कोई विशेष कमाल नहीं दिखा सका. खासकर सपा के लिए यह चुनाव पिछले लोकसभा चुनाव से भी खराब परिणाम वाला रहा.

Ramnath Rajesh | News18India
Updated: May 24, 2019, 9:19 PM IST
Lok Sabha Election Result 2019 : सपा-बसपा के एकजुट होने के बावजूद इन कारणों से हारा गठबंधन
फाइल फोटो
Ramnath Rajesh
Ramnath Rajesh | News18India
Updated: May 24, 2019, 9:19 PM IST
लोकसभा चुनाव के परिणाम आ गए. सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में निर्णायक माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में जो लोग बीजेपी को उखाड़ फेंकने की उम्मीद कर रहे थे, वे अब बगले झांकते नजर आ रहे हैं.  प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से बीजेपी विरोधी करिश्मे की उम्मीद लगाए बैठे थे. 'बुआ' और 'बबुआ' के इस कंबिनेशन को धारदार बनाने के लिए सपा ने अपने कोटे की एक सीट की कुर्बानी देकर इसमें राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) को शामिल कराया था ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट वोटरों को साधा जा सके, पर आरएलडी का खाता भी नहीं खुला और सपा की स्थिति पहले से भी खराब हो गई.

लोगों ने लगा ली थी ज्यादा उम्मीद


जब सपा नेता अखिलेश यादव और मायावती ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस करके मिलकर चुनाव लड़ने का एलान किया था तो राजनीतिक पंडित जातीय और सामुदायिक नजरिए से इसे जिताऊ गठबंधन मान रहे थे. इन दोनों ने 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी और कांग्रेस के लिए दो सीटों पर अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा करने का निर्णय लिया था. बाद में सपा ने प्रदेश की 80 सीटों में से दो सीटों का आरएलडी को ऑफर दिया, जब बात नहीं बनी तो एक सीट अखिलेश ने अपने कोटे की दे दी. इस तरह मायावती की बसपा 38 सीटों पर, सपा 37 सीटों पर और आरएलडी 3 सीटों पर एकजुट होकर लड़ी. इसके बावजूद सपा के लिए नतीजे अच्छे नहीं आए. सपा 2014 के संसदीय चुनाव में भी 5 सीटें जीती थी और इस बार भी संख्या वही रही. सपा के लिए दुखद यह हुआ कि अखिलेश यादव कन्नौज सीट से पत्नी डिंपल यादव को भी नहीं जिता पाए. भाई धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव भी हार गए.

खुश नहीं थे मुलायम

अखिलेश यादव के मायावती के साथ गठबंधन के फैसले से उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव खुश नहीं थे . उन्होंने मायावती को 38 सीटें देने पर कहा था कि आधी सीटें तो पहले ही हार गए.
मायावती को यह मालूम था कि मुस्लिम वोटरों पर मुलायम की वजह से सपा की अच्छी पकड़ है. यूपी में मुस्लिम आबादी 19 फीसदी है. वह बसपा के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल हो जाएगी. बसपा के पास प्रदेश के दलितों का 25 फीसदी जो वोट है वह उनके साथ है ही. ऐसे में जब 13 फीसदी यादव वोट जुड़ जाएगा तो जीत पक्की हो जाएगी. बीजेपी के परंपरागत अगड़ी जातियों के 16 फीसदी (ब्राह्मण 8, ठाकुर 5 और अन्य अगड़ी जातियां 3 प्रतिशत ) वोट उसे नहीं भी मिलेंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कुछ हद तक वे सफल भी रहीं और अपने कोटे की 38 सीटों में से 10 पर जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं.

सपा रही नाकाम
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इस गठबंधन से सपा दलिल वोटों को अपना मानकर चल रही थी लेकिन कहा जा रहा है कि दलित वोट सपा को इसलिए नहीं मिला क्योंकि सपा के शासनकाल में दलित अपने को घोर उपेक्षित महसूस करते रहे थे. मायावती के साथ सपा के कार्यकर्ताओं ने 2 जून 1995 को जो गेस्ट हाउस में कांड किया था उसे बसपा के नेता भूल नहीं पाए. हालांकि, अल्पसंख्यक मतदाता भी उस दौर को नहीं भूल पाए जब मायावती भाजपा के साथ गठबंधन कर राज्य की सत्ता पर काबिज थीं. इस तरह अल्पसंख्यक वोट सपा और कांग्रेस में बंट गया.

कार्यकर्ता नहीं स्वीकार कर पाए

एक सबसे बड़ी बात जो देखी गई वह यह कि ऊपरी स्तर पर भले ही सपा- बसपा के नेताओं ने गठबंधन कर लिया लेकिन यह जिला और प्रखंड के स्तर पर कार्यकर्ताओं को नहीं भाया. आधी सीटें दूसरे दल को देने से उस क्षेत्र विशेष में उस दल के जिला या प्रखंड स्तरीय नेताओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा जब उसके धुर विरोधी दल के नेता को इस समझौते के तहत संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया गया. इस तरह उन छोटे नेताओं ने अनुशासनहीनता तो नहीं दिखाई लेकिन यह भी नहीं चाहा कि गठबंधन का प्रत्याशी जीतकर उस क्षेत्र में उसके राजनीतिक भविष्य के रास्ते में अवरोध खड़ा कर दे. इसका असर यह हुआ वैसे छोटे नेताओं ने सक्रियता नहीं दिखाई.

 अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर ही कामयाबी

सपा की जिन पांच सीटों पर जीत हुई उसमें अखिलेश की आजमगढ़ की सीट और पिता मुलायम सिंह यादव की मैनपुरी की सीट को छोड़ दें तो शेष तीनों सीटें ( रामपुर से आजम खां, संभल से शफीक-उर-रहमान बारक और मुरादाबाद से एसटी हसन ) वैसी हैं जो अल्पसंख्यक बहुल थी. इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि बसपा का कैडर वोट अल्पसंख्यक सीटों पर तो सपा को मिलता दिखा लेकिन यादव बहुल संसदीय क्षेत्रों में नहीं.

बसपा ले लिए थी वजूद की लड़ाई

बसपा के वजूद का संकट था. पिछले चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई बसपा के कार्यकर्तओं के लिए करो या मरो वाली स्थिति थी. इसलिए बसपा के कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. सपा के मंच पर सपा नेताओं के मायावती के पैर छूने से बसपा कार्यकर्ताओं में एक उत्साह का संचार हुआ. दूसरी ओर सपा के कार्यकर्ताओं के एक वर्ग ने बसपा के लिए काम भी किया और परिणामस्वरूप बसपा संसदीय सीटों पर जीत के मामले में शून्य से दहाई अंक तक पहुंच गई.

सपा नेताओं की पारिवारिक कलह

मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्यों का आपसी टकराव भी इस मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार है. शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवाली पार्टी ने वोट के जरिए सपा को उतना नुकसान नहीं पहुंचाया जितना सपा के कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश देकर पहुंचाया कि पारिवारिक एकता बिखर चुकी है और सबकी राहें अलग हैं. यही कारण के अपने भाई रामगोपाल के बेटे अक्षय यादव की हार में शिवपाल को  अपनी जीत दिखी और दोनों हार गए. यह कहने की जरूरत नहीं है कि शिवपाल की सपा के कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. इस पारिवारिक लड़ाई से यादव वोटरों के एक बड़े वर्ग ने अपना वोट बर्बाद नहीं किया और उसका परिणाम सामने है.

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