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चुनावी नतीजों ने साबित किया कांग्रेस को युवा नहीं तजुर्बेकार लीडरशिप चाहिए

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 5:49 PM IST
चुनावी नतीजों ने साबित किया कांग्रेस को युवा नहीं तजुर्बेकार लीडरशिप चाहिए
ये रिजल्ट इशारा कर रहे हैं कि युवा राहुल की टीम को अभी कांग्रेसी तर्जुबेकार नेताओं से राजनीतिक गुर सीखने पड़ेंगे तभी वो बीजेपी जैसी पार्टी से सामना करने में सफल हो पाएंगे.

हरियाणा (Haryana) और महाराष्ट्र (Maharashtra) विधानसभा चुनावों (Assembly Election) के परिणाम बता रहे हैं कि कांग्रेस जमीनी नेताओं को तवज्जो देगी तो उसका चुनावी प्रदर्शन सुधर सकता है.

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  • Last Updated: October 24, 2019, 5:49 PM IST
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नई दिल्ली. हरियाणा (Haryana) और महाराष्ट्र (Maharashtra) विधानसभा चुनावों (Assembly Election) के परिणाम बता रहे हैं कि कांग्रेस जमीनी नेताओं को तवज्जो देगी तो उसका चुनावी प्रदर्शन सुधर सकता है. पोल पंडित और तमाम सर्वे एजेंसियों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों पर नजर डालें तो ज्यादातर ने दो राज्यों में हो रहे चुनाव को एक तरफा बताया था. लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम से साफ है कि लोग उन नेताओं को पसंद कर रहे हैं, जिनका जमीन से जुड़ाव है. भले ही वो बुजुर्गों की श्रेणी में डाले जाने के कारण कुछ समय के लिए हाशिए पर धकेल दिए गए थे.

हरियाणा चुनाव में टिकट बांटे जाने को लेकर अशोक तंवर ने सीधा-सीधा हमला पार्टी के शीर्ष नेताओं पर किया था और अंत में पार्टी छोड़कर अशोक तंवर दुष्यंत चौटाला की जेजेपी में शामिल हो गए. यही हालत कमोबेश महाराष्ट्र में भी दिखे जहां संजय निरूपम ने ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि राहुल के चहेते युवा नेतृत्व को पार्टी में दरकिनार किया जा रहा है.

बुजुर्ग नेताओं को तवज्जो ज्यादा दी जा रही है. गौरतलब बात यह है कि संजय निरूपम हों यो अशोक तंवर ये दोनों युवा नेता राहुल गांधी के करीबी बताए जाते रहे हैं लेकिन राहुल के नेतृत्व छोड़ने के बाद पार्टी में उपेक्षित महसूस किए जाने को लेकर अशोक तंवर ने पार्टी छोड़ना उचित समझा वहीं संजय निरूपम ने प्रचार न करने की धमकी देते हुए कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बयानबाजी जारी रखी.

मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके संजय निरूपम ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.
मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके संजय निरूपम ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.


निरूपम ने सोनिया समेत पार्टी के दिग्गज नेता खड़गे के खिलाफ भी तीखी बयानबाजी की थी. खड़गे ने राफेल के ऊपर 'ऊं' लिखे जाने को लेकर टिप्पणी की थी. महाराष्ट्र में कांग्रेस ने एक तरह से चुनाव प्रचार में शरद पवार को आगे रखा. वक्त की नजाकत को समझते पार्टी गठबंधन में बड़े भाई-छोटे भाई की बहस से दूर रही. जाहिर है अस्सी पार कर चुके शरद पवार पिछले चार दशक से महाराष्ट्र की राजनीति की अहम धुरी हैं, इसलिए ऐसी हालत में भी कांग्रेस और एनसीपी 90 से ज्यादा सीटें जीत पाने में सफल रहे हैं.

गौरतलब है कि कांग्रेस और एनसीपी के कई दिग्गज नेता, जिनमें कृपाशंकर सिंह, संजय अहिर, उदयराजे भोसले, गणेश नाइक, हर्षवर्धन पाटिल, कालिदास कोलांबकर शामिल हैं, ने कांग्रेस और एनसीपी का साथ इसलिए छोड़ दिया कि पार्टी की स्थिति पिछले चुनाव 2014 से भी खराब रहने वाली है और 50 का आंकड़ा भी छूना उनके लिए मुश्किल होगा.


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चुनाव से ठीक पहले एनसीपी नेता शरद पवार और अजीत पवार पर ईडी के बढ़ते शिकंजे को देखकर लगने लगा कि जब पार्टी के मुख्य नेता की स्थिति ऐसी है तो कमजोर और बिखरा विपक्ष बीजेपी-शिवसेना के सामने कहां टिक पाएगा. लेकिन महाराष्ट्र में शरद पवार और हरियाणा में कांग्रेस के भूपेन्द्र सिंह हुडा के नेतृत्व ने साफ कर दिया कि कांग्रेस अगर जमीनी नेताओं को आगे रखकर मैदान में उतरे तो वो बीजेपी को चुनौती देने का माद्दा रखती है.

हरियाणा में कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला कांटे का रहा है, वहीं महाराष्ट्र में भी मुकाबला कांग्रेस और एनसीपी गठजोड़ और बीजेपी शिवसेना के बीच उम्मीदों से विपरीत रहा है जो इस बात की तस्दीक करता है कि चुनाव में युवा होना जरूरी नहीं बल्कि जमीन पर पकड़ रखना ज्यादा जरूरी होता है.



कांग्रेस और एनसीपी का प्रदर्शन इशारा करता है कि मध्य प्रदेश हो या राजस्थान या फिर छत्तीसगढ़ तजुर्बेकार नेतृत्व के सामने युवा नेतृत्व कमजोर दिखाई पड़ा है. जाहिर है ये रिजल्ट इशारा कर रहे हैं कि युवा राहुल की टीम को अभी कांग्रेसी तर्जुबेकार नेताओं से राजनीतिक गुर सीखने पड़ेंगे तभी वो बीजेपी जैसी पार्टी से सामना करने में सफल हो पाएंगे.
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First published: October 24, 2019, 5:42 PM IST
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