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RTI के लिए 11 साल में 65 लोगों ने गवांई अपनी जान

नासिर हुसैन | News18Hindi
Updated: October 12, 2017, 7:32 PM IST
RTI के लिए 11 साल में 65 लोगों ने गवांई अपनी जान
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नासिर हुसैन | News18Hindi
Updated: October 12, 2017, 7:32 PM IST
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में औजार बना जनसूचना का अधिकार- 2005 अब आरटीआई कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न और हत्या की वजह बनता जा रहा है. 11 साल में 65 आरटीआई कार्यकर्ता सूचना का अधिकार इस्तेमाल करने के चलते अपनी जान गवां चुके हैं. वहीं 400 कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जिन पर सिर्फ इसलिए हमले किए गए कि उन्होंने किसी के खिलाफ सूचना मांगी थी.

कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) और सामाजिक संस्था ‘येश्वर्याज’ द्वारा जारी किए गए सर्वे के आंकड़ों को मानें तो 11 वर्षो में देशभर में 400 से ज्यादा आरटीआई कार्यकर्ता प्राणघातक हमले या गंभीर उत्पीड़न का शिकार हो चुके हैं.

यही नहीं 65 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है.  इन हमलों और हत्या के मामले में जहां महाराष्ट्र अव्वल है, वहीं गुजरात और मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश एक साथ दूसरे स्थान पर काबिज हैं.

दिल्ली का नंबर तीसरा

बकौल येश्वर्याज की सचिव उर्वशी लगभग 100 हमलों के साथ महाराष्ट्र देश में पहले स्थान पर है. लगभग 70-70 ऐसे मामलों के साथ उत्तर प्रदेश और गुजरात दूसरे स्थान पर हैं तो वहीं दिल्ली का नंबर तीसरा है. हमलों के मामलों में कर्नाटक चौथे, आंध्र प्रदेश पांचवें, बिहार और हरियाणा छठे स्थान, ओडिशा सातवें, पंजाब आठवें तथा तमिलनाडु नौवें स्थान पर है.

गुजरात का दूसरा स्थान
उर्वशी ने बताया, “उपलब्ध सूचना के अनुसार, हाल के 11 वर्षो में देश में 65 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है.  महाराष्ट्र में सर्वाधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या में इसके बाद उप्र और गुजरात का दूसरा स्थान है.”

क्या घट रही है आरटीआई कार्यकर्ताओं की संख्या

ऐसा लगता है कि इन हमलों से लोग सूचना मांगने से डरने लगे हैं क्योंकि आरटीआई आवेदकों की संख्या घटती जा रही है. राज्यसभा में इस बाबत दी गई सूचना के अनुसार 2014-15 में आरटीआई आवेदकों की संख्या घटकर 7,55,247 हो गई जो उसके पिछले साल 8,34,183 थी. हालांकि सरकार का दावा है कि चूंकि विभिन्न विभाग और मंत्रालय अपने कामकाज के बारे में स्वयं ही वेबसाइट पर जानकारी डाल देते हैं इसलिये लोगों को आरटीआई दायर करने की जरूरत ही कम पड़ती है. लेकिन इसे हास्यास्पद तर्क ही कहा जा सकता है क्योंकि जानकारी सार्वजनिक कर देने भर से भ्रष्टाचार के मामलों में कमी नहीं आ जाती है.

मुरैना में आरटीआई कार्यकता मुकेश दुबे की हत्या

मध्य प्रदेश के मुरैना में 35 वर्षीय आरटीआई कार्यकर्ता की अपहरण करने के बाद पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. पुलिस ने आरटीआई कार्यकर्ता मुकेश दुबे की लाश मटकोरा जंगल से बरामद की है. मृतक कार्यकर्ता के परिजन ने आरोप है कि उसको जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. इस बारे में पुलिस को सूचित किया गया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. एसडीओपी आरकेएस राठौर ने बताया कि सुमावली निवासी आमुकेश दुबे कुछ समय से अपने दूसरे घर मुरैना के विक्रमनगर में रह रहा था. सुमावली पंचायत के कई मामलों की सूचना प्राप्त कर दुबे ने पंचायत पदाधिकारियों के खिलाफ अनेक शिकायतें की थी. इस कारण कई लोगों से उसकी रंजिश चल रही थी.

मांगी थी अवैध खनन पर जानकारी लेकिन मिली मौत

उड़ीसा के रंगपार गांव में महेंद्र करसान का पूरा परिवार ही आरटीआई पर काम कर रहा था. इसमें से एक आरटीआई कार्यकर्ता रत्न जा आला दृष्टिहीन था. रत्न जा के अनुसार उसके पिता महेन्द्र करसान की हत्या सिर्फ इस लिए कर दी गई कि उन्होंने अवैध खनन पर जानकारी मांगी थी. मृतक करसान के बेटे का आरोप है कि उसके भाई काला ने भी अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाई थी। उसने इलाके में होने वाले अवैध खनन के बारे में आरटीआई दायर कर जानकारी मांगी थी।
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