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BLOG: फांसी आदिम सोच है, आधुनिक नहीं

News18Hindi
Updated: January 16, 2020, 8:54 PM IST
BLOG: फांसी आदिम सोच है, आधुनिक नहीं

क्या वाकई अपराधी को जेल के सन्नाटे, दुनिया के उजाले और समाज से दूर रखकर फांसी जैसी सजा दी जा सकती है?

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  • Last Updated: January 16, 2020, 8:54 PM IST
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नई दिल्ली. फिलहाल तो यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि निर्भया के चारों दोषियों को 22 जनवरी को फांसी दी जा सकेगी या नहीं? चारों अपराधी अपने वकीलों के जरिए हर वह दरवाजा खटखटा रहे हैं कि जहां से उन्हें फांसी टलवाने की उम्मीद दिख रही है. कुछ दिन टल भले जाए, पर लगता नहीं कि यह फांसी रुकेगी. दिल्ली सरकार और जेल अधिकारियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस मनमोहन और जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की अदालत को बताया है कि नियमों के तहत डेथ वारंट पर कार्रवाई करने से पहले दया याचिका पर निर्णय आना जरूरी है.

 22 जनवरी को फांसी संभव नहीं! 
दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा, ‘किसी भी सूरत में निर्भया के दोषियों को 22 जनवरी को फांसी संभव नहीं है. 21 जनवरी को दोपहर को हम ट्रायल कोर्ट का रुख करेंगे, अगर दया याचिका खारिज होती है तो भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अभियुक्तों को 14 दिन की मोहलत वाला नया डेथ वारंट जारी करना होगा.’

दरअसल, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ किया है कि दया याचिका खारिज होने के बाद भी अभियुक्तों को कम से कम 14 दिनों की मोहलत मिलना जरूरी है. फिलहाल तो मुकेश ने अपने डेथ वॉरंट को लोअर कोर्ट में चुनौती दी है, जिसपर आज सुनवाई होनी है.

यह दौर सचमुच बेहद खतरनाक
यह दौर सचमुच बेहद खतरनाक है. मीडिया की संवेदना में अब बड़ी से बड़ी वारदात महज घटना बन कर रह गई हैं और ढेर सारे अवसर उसके लिए कभी ‘हॉट केक’ बनते हैं, तो कभी सुलगती हुई खबर. बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि दृष्टि देने वाले मीडिया की जमात में से अधिकतर अब सनसनी फैलाने के काम में जुटे हैं.

इन दिनों निर्भया के दोषियों को फांसी दिए जाने का मामला भी उनके लिए बिकाऊ खबर है. उनकी नजर पवन जल्लाद पर टिकी है. वे बता रहे हैं कि आज तिहाड़ में केले मंगवाए गए... डमी को फांसी दी गई... और न जाने क्या-क्या.
...अपराधियों को फांसी दी जाएगी
दरअसल, ऐसी खबरें पाठकों के बीच उद्दीपक का काम करती हैं. उन्हें एक तरह की उम्मीद देती हैं कि चिंता न करें, अपराधियों को फांसी दी जाएगी. ऐसे ही उद्दीपकों का नतीजा था हैदराबाद एनकाउंटर. आज जब देश की बहुसंख्य आबादी निर्भया मामले के चारों दोषियों को फांसी पर लटकाए जाने का इंतजार कर रही है, ऐसे समय में फांसी के खिलाफ खड़ा होना बेहद जोखिम भरा है. यह बात समझते हुए भी यह जोखिम उठाना होगा. कहना जरूरी लगता है कि सजा के तौर पर फांसी देना आदिम सभ्यता की ओर लौटने जैसा है. भारतीय न्याय प्रक्रिया में भावनाओं से ज्यादा तर्कों को महत्व दिया गया है. इसी की प्रतीक हैं भारतीय न्याय की देवी जिनकी आंखों पर पट्टी बंधी है और हाथ में है संतुलित तराजू.

जेल क्यों बनाई गई?
गौर करें कि जेल क्यों बनाई गई? जेल बनाए जाने का मकसद क्या है? दरअसल, जेलें एक तरह का सुधार गृह होती हैं. जेल में रखे जाने की जो सजा है, उसका तर्क है कि अपराधी को उसके घर-परिवार और समाज से कुछ दिनों के लिए दूर कर दो. दूर इस उम्मीद में किया जाता है कि जेल के सन्नाटे और अपने अकेलेपन में अपराधी को शायद अपने किए पर विचार करने का अवसर मिलेगा, शायद उसे अपने अपराध का बोध होगा और कमजोर ही सही लेकिन एक उम्मीद रहती है कि अपराधी में सुधार होगा. सामान्य जेल में अगर अपराधी के व्यवहार में सुधार दिखता है, तो फिर उसे खुली जेल में रखा जाता है और भविष्य में समाज की मुख्यधारा से उन्हें फिर से जोड़ दिया जाता है. यह अलग बात है कि व्यवस्थागत दोषों की वजह से जेलें फिलहाल अपने मकसद में खरा नहीं उतर पा रहीं.

अपराधी को फांसी दिए जाने का मकसद
किसी अपराधी को फांसी दिए जाने का मकसद क्या है? उसके जीवन को खत्म कर देना या फिर बदले जैसी प्रवृति को तुष्ट करना? या इस फांसी के जरिए समाज में छुपे दूसरे अपराधियों में डर पैदा करना? दरअसल, ये तीनों तर्क हमारे आदिम होने को पुष्ट करते हैं. वैसे ये बिल्कुल साफ है कि फांसी से अपराधियों में कोई डर पैदा नहीं होता. ऐसा नहीं कि फांसी की सजा अपने देश में कोई पहली बार होने जा रही. इससे पहले भी फांसी की सजा दी जा चुकी है, लेकिन क्या उस फांसी के बाद उस तरह के दूसरे अपराध नहीं हुए? तर्क की बात यह है कि किसी भी व्यक्ति या समाज को ‘डरा’ कर सिखाने के बजाए, ‘समझा’ कर सिखाना बेहतर होता है. किसी भटके हुए शख्स को समझाना किसी एक व्यक्ति का दायित्व नहीं होता, वह तो पूरे समाज की जिम्मेवारी होती है.

फांसी की सजा के बाद न्याय या सुधार के सारे रास्ते बंद
किसी अपराध के लिए फांसी दिए जाने का एक दूसरा खतरा है. मुमकिन है फांसी से बचने के लिए अपराधियों में एक टेंडेंसी यह पैदा हो कि गवाह को जिंदा मत छोड़ो. क्योंकि पीड़ित या गवाहों के बयान किसी अपराधी को फांसी के फंदे तक पहुंचा सकते हैं. सबसे बड़ी बात कि फांसी की सजा के बाद न्याय या सुधार के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. फांसी मिल जाने के बाद अपराधी की वह मानसिक यातना खत्म हो जाती है, जो जिंदा रहने की स्थिति में वह पल-पल झेलता. फांसी देकर मुक्त कर देने से बेहतर होता, उसे घुटते हुए अपनी मौत का इंतजार कर पल-पल मरने देना.जाहिर है कि फांसी किसी भी अपराधी को मुक्ति देती है. यह सजा हमारी आदिम सोच है, आधुनिक नहीं. फांसी के जरिए हम उस सजा की संभावना भी खत्म कर देते हैं, जो अपराधी जीवित रहते हर पल झेलता.

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First published: January 16, 2020, 8:44 PM IST
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