अयोध्या मामला: निर्मोही अखाड़ा ने कहा- ‘राम लला’ के दावे का विरोध नहीं कर रहा

भाषा
Updated: August 27, 2019, 10:34 PM IST
अयोध्या मामला: निर्मोही अखाड़ा ने कहा- ‘राम लला’ के दावे का विरोध नहीं कर रहा
सुनवाई करने वाली पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं. (File Photo)

निर्मोही अखाड़े (Nirmohi Akhada) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि (Ram Janam Bhumi) के स्वामित्व के लिए ‘राम लला’ के दावे का विरोध नहीं कर रहा है.

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अयोध्या मामले (Ayodhya Case) में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court Of India) में आज यानी मंगलवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़े (Nirmohi Akhada) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि (Ram Janam Bhumi) के स्वामित्व के लिए ‘राम लला’ के दावे का विरोध नहीं कर रहा है. अखाड़ा ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को इस रुख के बारे में बताया. उससे पूछा गया था कि क्या वह इस तथ्य के आलोक में राम लला की याचिका का विरोध कर रहा है कि ‘शबैत’ (उपासक) के तौर पर संपत्ति पर उसका अधिकार तभी हो सकता है जब ‘राम लला विराजमान’ के वाद को विचारार्थ स्वीकार किया जाए.

निर्मोही अखाड़े की ओर से वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने पीठ से कहा, ‘कल आपने जो कहा, उसके जवाब में निर्मोही अखाड़ा का रुख यह है कि वह वाद संख्या 5 (देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से देवता द्वारा दाखिल) की विचारणीयता के मुद्दे पर जोर नहीं देगा. बशर्ते कि देवता के वकील भी अखाड़ा के शबैत अधिकारों को चुनौती नहीं दें.’

पीठ ने अखाड़ा को उसका रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया
पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं. पीठ ने जैन के इस लगातार दिए जा रहे रुख से इत्तेफाक नहीं जताया कि देवता का मुकदमा विचारणीय नहीं है क्योंकि शबैत के रूप में केवल अखाड़ा को देवता की तरफ से मुकदमा दायर करने का हक है. पीठ ने अखाड़ा को उसका रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया.

दशकों पुराने संवेदनशील मामले की 13वें दिन की सुनवाई में दलीलें पेश करते हुए जैन ने कहा कि 1934 से किसी मुस्लिम ने नियमित नमाज अदा करने के लिए विवादित इमारत में प्रवेश नहीं किया है और यह स्थान अखाड़े के कब्जे वाला मंदिर है. पीठ ने कहा, ‘आपने यह सब कल ही पढ़ा है. आप जो पढ़ चुके हैं, उसके आगे की बात करिए. दोहराइए मत.’

राजस्व रिकॉर्ड अखाड़े का कब्जा दिखाते हैं
जैन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की इस दलील को नहीं माना जा सकता कि 1934 में सांप्रदायिक दंगे के बाद विवादित ढांचे की मरम्मत के लिए एक ठेकेदार को कहा गया था. इस बात पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड अखाड़े का कब्जा दिखाते हैं. इस पर वरिष्ठ वकील ने कहा कि मामले में मुस्लिम पक्षों का वाद निर्धारित कालावधि से बहुत बाद का है क्योंकि उन्होंने वाद के लिए कारण सामने आने के बाद समय पर अदालत का रुख नहीं किया. उन्होंने कहा कि वाद का पहला कारण 1855 में सामने आया था, जब एक दंगा भड़का था. जिसके बाद मुसलमानों ने इस जगह पर कब्जा ले लिया और बाद में कुछ समय पश्चात हिंदुओं का कब्जा हो गया.
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वकील ने कहा कि फिर 1934 में मुसलमानों को दंगों के बाद नमाज अदा करने से रोका गया और 12 साल गुजरने के बाद भी उन्होंने मुकदमा दायर नहीं किया. जैन ने दलीलें समाप्त करते हुए कहा कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ ने 1961 में मामला दाखिल किया था, जिसे निर्धारित कालावधि पर नहीं होने की वजह से खारिज कर दिया गया.

अखिल भारतीय श्री राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने ‘स्कंद पुराण’ और ‘अयोध्या महात्म्य’ जैसे शास्त्रों एवं अन्य उल्लेखों के आधार पर दलीलें शुरू कीं. यह समिति एक मुस्लिम पक्ष द्वारा दाखिल पक्ष में प्रतिवादी हैं.

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First published: August 27, 2019, 10:34 PM IST
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