तो इसलिए देश में खत्म हो रही है विरोध की राजनीति

2014 में जहां मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, मायावती, लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नेता विपक्ष का चेहरा थे, वहीं 2019 में अगर ममता बनर्जी को छोड़ दें तो विपक्ष के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसकी पकड़ जनता में हो.

Anil Rai | News18Hindi
Updated: August 21, 2019, 11:12 AM IST
तो इसलिए देश में खत्म हो रही है विरोध की राजनीति
लगातार कमजोर पड़ता विपक्ष (फाइल फोटो)
Anil Rai
Anil Rai | News18Hindi
Updated: August 21, 2019, 11:12 AM IST
2019 के लोकसभा चुनावों के बाद देश में विपक्ष खत्म होता दिख रहा है. जिस तरह राज्यसभा में अल्पमत के होने के बावजूद सरकार अपना हर बिल आसानी से पास कराने में सफल रही है, उससे एक बात तो तय है कि विपक्ष बटा हुआ है. साथ ही विपक्ष में बैठे लोग सत्ता के खिलाफ सीधे-सीधे बगवाती तेवर आजमाने से डर रहे हैं. आजादी के बाद की सरकारों और उसके लोकसभा और राज्यसभा के आकड़ों पर नजर डाले तो कई बार ऐसा मौके आए हैं जब सरकार सत्ता पक्ष के आकड़े वर्तमान मोदी सरकार के आकड़ों से बड़े रहे हैं, लेकिन फिर भी विपक्ष कभी इतना डरा और सहमा नहीं दिखा. ऐसे में सवाल ये है कि क्या विपक्ष ने सत्ता पक्ष से समझौता कर लिया है या विपक्ष के पास वो मुद्दे और वो नेता नहीं है जिससे वो सरकार का विरोध कर सके.

कांग्रेस नहीं कर पा रही है विपक्ष का नेतृत्व
35ए और 370 में जिस तरह विपक्ष में फूट पड़ी उससे साफ है सराकर के विरोध में बैठे नेता ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर सरकार का विरोध कहां करना है कहां नहीं. इन मुद्दों पर विपक्ष में बैठी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस तो दो खेमों में बटती हुई साफ नजर आई. अब तक कांग्रेस के नेता ये तय नहीं कर पाए हैं कि 370 हटाना सही कदम था या गलत. जहां गुलाम नबीं आजाद और अधीर रंजन चौधरी जैसे नेता जो अल्पसंख्यक वोटरों के इलाके से आते हैं 370 हटाने को गलत बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता सरकार के इस फैसले के साथ हैं. साफ है कांग्रेस जब इस तरह के मुद्दे पर अपनी पार्टी एक नहीं रख पा रही है तो विपक्ष को एक रखना उसके बस की बात नहीं हैं.

सड़क पर उतरने से क्यों बच रहा है विपक्ष

विपक्ष मोदी सरकार में लगातार बेरोजगारी बढ़ने, आर्थिक स्थिति के खराब होने के दावे कर रहा है लेकिन विपक्ष का ये विरोध सोशल मीडिया से आगे बढ़ता नहीं दिख रहा है.  इसी तरह विपक्ष के नेता उत्तर प्रदेश में ट्विटर और फेसबुक पर तो प्रदेश के कानून व्यवस्था पर जमकर हंगामा काटते हैं लेकिन सोनभद्र जैसे बड़े मामले पर विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाया. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाढरा का आंदोलन भी सोनभद्र से आगे लखनऊ तक नहीं पहुंच पाया.

आखिर इसके पीछे कारण क्या है, इस मामले की तह तक  जाएं तो एक बात साफ है कि विपक्षी पार्टियों ने सिर्फ चुनाव नहीं हारा है बल्कि उनका राजनीतिक कैडर भी धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है. चाहें कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी हो या पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी. एसपी सुप्रीमों अखिलेश यादव हो या वीएसपी अध्यक्ष मायावती या एनसपी प्रमुख शरद पवार. इन बड़े नेताओं के पीछले पांच साल के ग्राफ को देखे तो अलग-अलग कारणों से ये नेता अपनी पार्टी के मूल कैडर और आम जनता से कटते गए हैं और इस बात का अंदाजा इन सबकों है और यही वो कारण है जिसके कारण ये सरकार के खिलफ सड़क पर उतरने से बचते नजर आते हैं.

ममता को छोड़ विपक्ष में नहीं बचा कोई चेहरा
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2014 में जहां मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, मायावती, लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नेता विपक्ष का चेहरा थे, वहीं 2019 में अगर ममता बनर्जी को छोड़ दे तो विपक्ष के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसकी पकड़ जनता में हो. कांग्रेस जहां अपनी अंदरुनी राजनीतिक से उबर नहीं पा रही है, वहीं लागातर 2 चुनाव हारने के बाद ये दिग्गज नेता अब सरकार के विरोध में खुलकर सामने आने का सहस भी नहीं कर पा रहे हैं. या यूं कहें कि ये दिग्गज अब जनता का नब्ज नहीं समझा पा रहे हैं.

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First published: August 21, 2019, 11:04 AM IST
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