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बेवजह नहीं है बढ़ती आबादी पर पीएम नरेंद्र मोदी की चिंता

Sudhir Jain | News18Hindi
Updated: August 17, 2019, 11:45 PM IST
बेवजह नहीं है बढ़ती आबादी पर पीएम नरेंद्र मोदी की चिंता
यह अंदाजा अभी नहीं लगाया जा सकता कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए नया क्या होने वाला है.

देश की बड़ी चिंताओं में अचानक बढ़ती आबादी (Population Explosion) भी शामिल हो गई है. हालांकि ये कोई नई चिंता नहीं है. साठ के दशक में छोटा परिवार (Small Family) से लेकर सत्तर के दशक (1960-1970) में परिवार नियोजन (Family Planning) की युद्धस्तरीय मुहिम भविष्य में आबादी की चिंता को लेकर ही चली थी. लेकिन, युद्धस्तरीय मुहिम का विरोध हो गया था.

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  • Last Updated: August 17, 2019, 11:45 PM IST
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देश की बड़ी चिंताओं में अचानक बढ़ती आबादी (Population Explosion) भी शामिल हो गई है. हालांकि ये कोई नई चिंता नहीं है. साठ के दशक में छोटा परिवार (Small Family) से लेकर सत्तर के दशक (1960 to 1970)  में परिवार नियोजन (Family Planning) की युद्धस्तरीय मुहिम भविष्य में आबादी की चिंता को लेकर ही चली थी. लेकिन, युद्धस्तरीय मुहिम का विरोध हो गया था. इतना विरोध हो गया था कि योजनाकारों को परिवार नियोजन का नाम हटाकर परिवार कल्याण का नाम देना पड़ा था. तबसे जनसंख्या की मुहिम ठंडी पड़ी चल रही थी. अब अचानक लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण में जनसंख्या विस्फोट के जिक्र ने यह मसला अचानक सुर्खियों में ला दिया है. जाहिर है कि जनसंख्या पर चर्चा अब रुक नहीं पाएगी.

आखिर होगा क्या
यह अंदाजा अभी नहीं लगाया जा सकता कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए नया क्या होने वाला है. लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में गंभीरता से विमर्श जरूर होंगे. सबसे पहले यह देखा जाएगा कि यह समस्या कितनी बड़ी है और इसके समाधान के लिए नई परिस्थिति में क्या काम किए जा सकते हैं. ये विद्धानों का काम है कि वे सोच विचार के सुझाएं कि यह समस्या किस तरह की है और इसका निरापद उपाय क्या है.

लालकिले के प्राचीन से प्रधानमंत्री के भाषण में जनसंख्या विस्फोट के जिक्र ने यह मसला अचानक सुर्खियों में ला दिया है


हालांकि, देश में ये काम भी पहले से हो रहा है. देश के 17 प्रदेशों में 18 जगह पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर बहुत पहले से चालू हैं. छह जनसंख्या शोध केंद्र तो देश के छह विश्वविद्यालयों में ही चल रहे हैं. प्रधानमंत्री के भाषण में जनसंख्या के जिक्र के बाद इन शोध केंद्रों में अचानक हलचल बढ़ जाना तय है.

जनसंख्या की समस्या की नापतोल
हर समस्या की नापतोल करना ही सबसे मुश्किल काम होता है. जनसंख्या के मामले में तो यह कुछ ज्यादा ही मुश्किल है. वैसे यह काम मुश्किल होना नहीं चाहिए. क्योंकि हर दस साल में देश में बिना नागा जनगणना होती है. और दस साल में जनसंख्या के आंकड़ों का विश्लेषण करने का मौका मिलता है. हर दस साल में हमें पता चल जाता है कि हमारी आबादी किस रफ्तार से बढ़ रही है. बहरहाल प्रधानमंत्री के जरिए नई हलचल के बाद याद करने का मौका आया है कि आजादी के फौरन बाद ही योजना आयोग अपनी योजनाएं बनाने में आबादी को अपनी नजर में रखता था.
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हालांकि, योजना आयोग कुछ ही समय पहले खत्म कर दिया गया है. योजनाएं सुझाने का काम अब नए बने नीति आयोग का है. लेकिन अगली जनगणना सन् 2021 में होनी है. सो जनसंख्या के पक्के आंकड़े दो साल बाद ही पता चलेंगे. फिर भी प्रौद्योगिकी के इस युग में दुनियाभर में तमाम जनसंख्या घड़ियां चल रही हैं. ये घड़ियां हर सेकेंड बताती चल रहीं है कि इस पल दुनिया की और हमारी कितनी है. संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं भी इस मामले में हर देश पर लगातार नज़र रखती हैं. उनके मुताबिक अपने देश की आबादी 133 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुकी है.

गैरसरकारी आकलन में भारत की मौजूदा आबादी का आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है


जबकि, पिछली जनगणना यानी सन् 2011 में यह 121 करोड़ थी. गैरसरकारी आकलन में भारत की मौजूदा आबादी का आंकड़ा ज्यादा भी हो सकता है लेकिन हमें यह मानकर चलना चाहिए कि पिछले आठ साल में हमारी आबादी 12 से 15 करोड़ तो बढ़ ही गई है. इतनी आबादी तो दुनिया के किसी औसत आकार के देश की आबादी से भी ज्यादा है. यही हमारी चिंता है. खासतौर पर यह चिंता कि क्या इतनी आबादी के लिए हमारे पास संसाधन हैं.

मसला संसाधनों का
जो लोग हर बात में बहस के आदी हैं उनका आदतन तर्क हो सकता है कि आबादी बढ़ रही है तो क्या ? देश में संसाधन बढा लिए जाएं. सुनने में यह तर्क सही लग सकता है. लेकिन इसका जवाब देने वाले विद्धान भी मौजूद हैं. उनका जवाब है कि संसाधनों की एक सीमा है. और खासतौर पर कुछ प्राकृतिक संसाधन स्थिर हैं. मसलन जमीन और उस पर गिरने वाला बारिश का पानी. देश के पास आजादी के समय 32 करोड़ हैक्टेएर जमीन थी और सात दशकों बाद उतनी ही है.

देश के पास आजादी के समय 32 करोड़ हैक्टेएर जमीन थी और सात दशकों बाद उतनी ही है.


आजादी के समय हमें प्रकृति से 4000 अरब घनमीटर पानी बारिश से मिलता था और उतना ही पानी आज भी मिल रहा है. लेकिन इस बीच हमारी आबादी 36 करोड़ से बढ़कर 133 करोड़ को पार कर गई. यानी आबादी पौने चार गुनी बढ़ गई और दो प्रमुख संसाधन यानी जमीन और जल जहां की तहां हैं. समस्या की तीव्रता को समझने के लिए और ज्यादा बारीकी की जरूरत बचती नहीं है.

जमीन और जल की उपलब्धता पर नज़र
बहसबाज लोग भारतीय जमीन पर करोड़ों खेतों और बड़े बड़े जंगलों की तस्वीरें दिखा सकते हैं. वे बारिश के दौरान नदियों में भलभल करके बहते पानी को दिखा सकते हैं. वे बता सकते हैं कि फिलहाल आबादी कोई बड़ी समस्या नहीं है. लेकिन ये तस्वीर हकीकत नहीं बताती. तथ्य ये हैं कि अपने देश में आजादी के समय प्रतिव्यक्ति 5000 घनमीटर पानी उपलब्ध था. लेकिन आजादी के बाद अबतक पौने चार गुनी आबादी बढ़ने से आज पानी की उपलब्धता लगभग एक चौथाई यानी लगभग 1300 घनमीटर प्रतिव्यक्ति ही बची है.

2021 में एक बार फिर से जनगणना होने वाली है


हालांकि, जलविज्ञान के वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह उपलब्धता और भी कम निकलेगी. लेकिन मोटे हिसाब से ही देश में प्रतिव्यक्ति उपलब्ध पानी अतंरराष्ट्रीय मानदंड के हिसाब से सिर्फ दो तिहाई बैठ रहा है. अंतरराष्ट्रीय मानदंड के मुताबिक पृथ्वी पर हर व्यक्ति की न्यूनतम जरूरत दो हजार घनमीटर प्रतिवर्ष है. एक व्यक्ति के खाने के लिए जो भी उगाया जाता है या पशु पालन किया जाता है या लोगों को ओढ़ने बिछाने के लिए जो कुछ पैदा किया जाता है या रहने के लिए जो मकान बनता है और भी दूसरे निस्तार के लिए हर साल प्रतिव्यक्ति कम से कम दो हजार घनमीटर पानी की जरूरत पड़ती है.

लेकिन, भारत में प्रतिव्यक्ति उपलब्ध पानी का आंकड़ा सिर्फ 1300 घनमीटर बचा है. यानी न्यूनतम जरूरत का सिर्फ दो तिहाई. इसीलिए अतंरराष्ट्रीय मानदंडों के हिसाब से देश का दर्जा एक प्रकार से जलन्यून देश का हो चुका है. इसका एक और सिर्फ एक कारण आबादी ही है. और सिर्फ इसी सबसे बड़े आधार पर हमें बढ़ती आबादी को लेकर चिंतित हो उठना चाहिए.

सवाल कि चिंता अब तक क्यों नहीं की?
यह सवाल सही नहीं है. इतिहास बताता है कि आबादी की चिंता देश के आजाद होते ही शुरू कर दी गई थी. साठ और सत्तर के दशक में इस कोशिश का हवाला दिया जा चुका है. कोई यह सवाल भी कर सकता है कि फिर आज आबादी की समस्या इतनी बेकाबू क्यों हो गई. वे लोग तभी युद्ध स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण का काम नहीं होने का मलाल करते हैं. उन्हें याद दिलाया जा सकता है कि सत्तर के दशक में देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए युद्धस्तर की मुहिम चलाई गई थी लेकिन उसका उल्टा असर पड़ गया था.

हालांकि, उसके बाद भी यह काम लगातार चलता जरूर रहा. नतीजतन आजादी के फौरन बाद हमारी आबादी बढ़ने की जो रफ्तार औसतन ढाई फीसद थी वह घटकर आज एक दशमलव एक फीसद रह गई है. वरना आबादी के मामले में इस समय हम चीन से भी आगे निकल चुके होते. फिर भी चीन के मुकाबले हमारी आबादी बढ़ने की रफ्तार आज भी दोगुनी है. जापान और रूस की तुलना में हमारी जनसंख्या वृद्धिदर 11 गुनी है. बहरहाल चीन से दोगुनी जनसंख्या वृद्धि दर होने के कारण यह अंदेशा सामने खड़ा है कि आने वाले पांच-सात साल में हम चीन से ज्यादा आबादी वाले देश बन सकते हैं. यानी दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश.

अबतक तो किसी तरह संसाधनों का प्रबंध करते रहे
आज हम अपनी इतनी बड़ी आबादी के लिए 27 करोड़ टन अनाज उगा ही रहे हैं. देश के पांच हजार छोटे बड़े बांध बारिश के उतने पानी को रोककर रख ही लेते हैं जिससे किसी तरह काम चल जाए. जरूरत से आधे पानी मिलने के बाबजूद यह काम अबतक चलता जरूर दिख रहा है लेकिन इसे और आगे खींचना संभव नहीं दिखता. संकट इस मुकाम पर है कि अब दो चार साल ठहरने की भी गुंजाइश नहीं बची. बढ़ती आबादी के चलते हमें कृषि उत्पादन बढ़ाते रहना पड़ेगा. उन खेतों तक पानी पहुंचाना पड़ेगा जिन खेतों तक सिंचाई की सुविधा नहीं है.

आज हम अपनी इतनी बड़ी आबादी के लिए 27 करोड़ टन अनाज उगा ही रहे हैं


लेकिन, हमारे पास इतना पानी उपलब्ध ही नहीं है कि देश के आधे से ज्यादा खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचा सके. उद्योग, आवास और दूसरी गतिविधियां बढ़ाने के लिए भी पानी नहीं है. गौरतलब है कि पानी और अर्थव्यवस्था के बीच भी समानुपाती संबंध है. बारिश कम होने पर अर्थशास्त्री आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान फौरन घटा देते हैं. यानी सिर्फ एक ही तरीका बचता है कि अपनी तेज रफ्तार से बढ़ती आबादी को काबू में करने के काम पर लग जाएं.

दबाव सिर्फ जल प्रबंधन पर ही नहीं
भले ही पानी के संकट के पीछे आबादी सबसे बड़ा कारण साबित होता हो. लेकिन आबादी के सवाल ने हमारे सामने तमाम दूसरी समस्याएं भी खड़ी कर दी हैं. खासतौर पर बेरोज़गारी पर सोचने बैठते हैं तो कोई सिरा पकड़ में नहीं आता कि देश में करोड़ों बेरोजगारों को काम पर लगाने के लिए क्या करें. हमारी माली हालत इतनी ऊंची नहीं हो पाई है कि अपना औद्योगिक बढ़ाने के काम पर लग सकें. कृषि विकास लगभग संतृप्त स्थिति पर पहुंचता नज़र आ रहा है. इधर विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की वृद्धिदर भी उतार या स्थिरता की हालत में है. शहरों में आवास और वाहनों की भीड़ के लिए जमीन की मांग बढ़ रही है.

बढ़ती आबादी के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रबंध के लिए कृछ नहीं सूझ रहा है कि संसाधन कहां से जुटाएं. भले ही आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाने के बारे में सोचा जाने लगा हो लेकिन इस तथ्य को भी लेखे में लेने का यह सही वक्त है कि आर्थिक विकास की भी एक सीमा होती है. आखिर में योजनाकार यही जनसंख्या नीति सुझा पाएंगे कि तेंते पांव पसारिए. देखते हैं कि देश के छह विश्वविद्यालय में चल रहे जनसंख्या शोध केंद्र सोचकर क्या तरीका लाते हैं?

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First published: August 17, 2019, 5:09 PM IST
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