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दिल्ली को गैस चैंबर बनने से बचाना है तो करें ये 10 काम

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 15, 2019, 1:21 PM IST
दिल्ली को गैस चैंबर बनने से बचाना है तो करें ये 10 काम
दिल्ली-एनसीआर में जहरीली हवा बढ़ रही है

यदि आप मान रहे हैं कि मुंह पर एक मॉस्क लगाने भर से आप इस प्रदूषण (Air Pollution) से बच जाएंगे तो यह गलत है. हमारी एंटी नेचर गतिविधियों से सबकुछ तहस-नहस हो रहा है. यदि इस शहर को जहरीली गैस का चैंबर बनने से बचाना है तो आप और हमें मिलकर कुछ करना होगा.

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  • Last Updated: October 15, 2019, 1:21 PM IST
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नई दिल्ली. राजधानी दिल्ली (Delhi) और इसके आसपास के शहर एक बार फिर प्रदूषण संकट से जूझ रहे हैं. जिम्मेदार पंजाब (Punjab) और हरियाणा (Haryana) में जलाई जा रही पराली (Stubble) को ठहराया जा रहा है. इससे निपटने के लिए सरकार कागजों में आदेश पर आदेश जारी कर रही है लेकिन ग्राउंड पर इनका कोई असर नजर नहीं आ रहा. क्योंकि इस जंग से निपटने के लिए अभी तक आप नहीं जुड़े हैं. यदि आप मान रहे हैं कि मुंह पर एक मॉस्क लगाने भर से आप इस प्रदूषण (Air Pollution) से बच जाएंगे तो यह गलत है. इसके लिए एक सामूहिक जंग लड़नी पड़ेगी, ताकि इस समस्या की जड़ें खत्म हों.

बेहताशा बढ़ते वाहन और पंजाब-हरियाणा में जलाई जा रही पराली तो प्रदूषण के कारण हैं ही, लेकिन इस हालत के लिए सिर्फ इन्हीं को गुनाहगार मानना ठीक नहीं हैं. गुनाहगार आप और हम सभी हैं. हमारी एंटी नेचर गतिविधियों से सबकुछ तहस-नहस हो रहा है. यदि इस शहर को जहरीली गैस का चैंबर बनने से बचाना है तो आप और हमें मिलकर काम करना होगा. इस बारे में डॉक्टरों, पर्यावरणविदों और अरावली को बचाने की जंग लड़ने वालों ये सलाह दी है.

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सिर्फ मास्क लगाना समाधान नहीं है (फाइल फोटो)


>>ऑड-ईवन फॉर्मूले को सपोर्ट करें. इसमें कोई प्रिविलेज लेकर उसे तोड़ने की कोशिश न करें . 4 नवंबर से यह अभियान शुरू हो रहा है. वाहन शेयरिंग को बढ़ावा दिया जाए.

>>आईआईटी, कानपुर की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़कों पर उड़ने वाली धूल से हो रहा है. इसलिए आरब्ल्यूए और सामाजिक संगठन नगर निगमों पर धूल उठाने का दबाव बनाएं. इससे आपको क्षेत्र धूल का चैंबर बनने से बच जाएगा. सोसाइटी, नगर निगम से आधुनिक तरीके से धूल को उठाने वाली मशीन मंगाने की मांग करें.

>>दिल्ली में प्रदूषण का दूसरा बड़ा कारण है वाहनों से निकलने वाला धुआं. तो अच्छा ये है कि डीजल की जगह सीएनजी का इस्तेमाल करें. अपनी गाड़ियों में सीएनजी फिट करवाएं.

>>कुछ उद्योगपति प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को घूस देना तो मंजूर कर लेते हैं लेकिन ग्रीन एनर्जी का प्लांट नहीं लगवाते. ऐसी मानसिकता को बदलने की जरूरत है. क्योंकि इसी वातावरण में उन्हें भी रहना है. गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, और नोएडा के उद्योगों में पारंपरिक ईंधनों का इस्तेमाल जारी है. अडानी गैस के वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग) बातिश ढोलकिया के मुताबिक फरनेस ऑयल और पेटकोक पर प्रतिबंध के बावजूद उद्योगों में इसका इस्तेमाल जारी है. उद्योगपति खर्च बढ़ने का रोना रोकर ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल करने के लिए तैयार नहीं हो रहे. औद्योगिक नगरी फरीदाबाद के 17 हजार उद्योगों में से सिर्फ 360 ही गैस से चल रहे हैं.
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>>दिल्ली सरकार प्रदूषण कम करने के मकसद से 4 नवंबर से वाहनों का ऑड-ईवन फार्मूला लागू करने जा रही है. ये अच्छी बात है. साथ ही सरकार को टूटी फूटी सड़कें भी ठीक करवाने की जरूरत है. इससे धूल का गुबार उठता है. दिल्ली-एनसीआर में जहां-जहां भी सड़कें टूटी हुई हैं वहां-वहां के नागरिक नेताओं और नगर निगमों पर इन्हें ठीक कराने के लिए आगे बढ़ने की जरूरत है.

>>दिल्ली और उसके आसपास नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे निर्माण कार्य से निकलने वाली धूल भी इसके लिए जिम्मेदार है. ज्यादातर जगहों पर धूल से बचाने के लिए ग्रीन नेट नहीं लगाई जाती. इसका इस्तेमाल करिए. सरकार ऐसा न करने वालों पर भारी जुर्माना लगाए. अगर आपके आस पास इसका उल्लंघन हो रहा है तो इसकी उपयुक्त फोरम पर शिकायत करें.

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खेतों में पराली जलाने पर रोक लगाई गई है. (Demo Pic)


>>कोई पौधा तुरंत तो पेड़ नहीं बनेगा, लेकिन यह कोशिश जरूर करिए. पौधा लगाने का अभियान चलाएं. पेड़ कट रहा हो तो उसका पुरजोर विरोध करिए. विकास की दौड़ में पर्यावरण की चिंता को हमने पीछे छोड़ दिया है. दिल्ली के पास गुड़गांव का पिछले एक दशक में तेजी से विकास हुआ है. इस दौड़ में कितने पेड़-पौधों की बलि ली गई, क्या किसी को अंदाजा है. अकेले फरीदाबाद में मेट्रो और सिक्स लेन के लिए करीब 20 हजार पेड़ काट दिए गए, लेकिन उसके बदले पेड़ कहां लगाए सरकार नहीं बता रही है. जबकि एक पेड़ काटने के बदले दो पौधे लगाने का प्रावधान है.

>>पर्यावरणविद् एन. शिवकुमार के मुताबिक हर परिवार कम से कम एक पेड़ की धुलाई करवाने की जिम्मेदारी ले. अपने घर के सामने पार्क के एक पेड़ पर लिपटी धूल की पानी से सफाई करें. इससे पेड़ों में प्रदूषण सहने की शक्ति बढ़ेगी. पत्ते साफ रहेंगे तो धूल और धुआं आप पर कम असर करेगा.

>>सेव अरावली के एक्टिविस्ट जितेंद्र भड़ाना कहते हैं कि पौधारोपण के नाम पर सिर्फ गिनती न करें, जिन पौधों को लगाएं उन्हें मुड़कर भी देखें. कोई भी पौधा लगाने की जगह पीपल और नीम के पौधे लगाएं. पेड़ों की सुरक्षा के प्रति सजग रहें, सरकार को भी पेड़ काटने पर जुर्माना और सजा सख्त करने की जरूरत है. साथ ही पेड़ काटने की जगह उसके ट्रांसप्लांटेशन पर जोर दिया जाना चाहिए.

>>कंस्‍ट्रक्‍शन (Construction) पर मॉनिटरिंग बढ़ाई जाए. हो सके तो कुछ दिन के लिए इस पर रोक लगाई जाए. नागरिक सड़कों पर रोजना पानी छिड़कने का नगर निगमों पर दबाव बनाएं. जिससे धूल के कण नीचे बैठे रहें.

शॉर्ट टर्म-लांग टर्म प्लानिंग

प्रदूषण से आम जन जीवन पर पड़ने वाले दुष्‍प्रभाव को लेकर कई सर्वे कर चुके गुड़गांव के पुल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. हिमांशु गर्ग कहते हैं कि पूरी दुनिया के बड़े शहरों में सिविक चैलेंजेज (नागरिक चुनौतियां) एक सी हैं. हमारे और उनमें अंतर यह है हमने प्रदूषण से संबंधित चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया. इसका असर सब लोग देख रहे हैं. उसका समाधान कैसे हो इसके लिए परेशान हैं. लेकिन कहीं से कोई सामूहिक प्रयास नहीं दिख रहा. इसकी एक शॉर्ट टर्म और एक लांग टर्म प्‍लानिंग होनी चाहिए, वरना प्रदूषण की भयावहता के कारण इन शहरों से लोगों का पलायन होने लगेगा.

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First published: October 15, 2019, 1:15 PM IST
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