2019 की जंग: राहुल गांधी से कन्नी क्यों काट रही हैं ये राजनीतिक पार्टियां!

बड़ा सवाल ये है कि जब देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने का ख्वाब देख रही है तो महागठबंधन की सपा, बसपा और आरएलडी जैसी पार्टियों क्यों कांग्रेस को कमजोर देखना चाहती हैं.

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 18, 2018, 2:37 PM IST
2019 की जंग: राहुल गांधी से कन्नी क्यों काट रही हैं ये राजनीतिक पार्टियां!
क्या 2019 में मोदी के सामने टिक पाएंगे राहुल गांधी?
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 18, 2018, 2:37 PM IST
भारत बंद के दौरान बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को जैसा समर्थन मिला वैसा राजनीति के सबसे बड़े अखाड़े यूपी में नहीं दिखा. महागठबंधन की पार्टियां ही यहां एक दूसरे की टांग खींचते नजर आईं. यहां कांग्रेस को सपा, बसपा, आरएलडी का समर्थन नहीं मिला. बड़ा सवाल ये है कि जब देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने का ख्वाब देख रही है तो महागठबंधन की सपा, बसपा और आरएलडी जैसी पार्टियों क्यों कांग्रेस को कमजोर देखना चाहती हैं. यूपी ही नहीं अन्य राज्यों में भी मोदी विरोधी कई पार्टियां राहुल गांधी से क्यों कन्नी काट रहीं हैं. क्यों कांग्रेस के साथ मंच शेयर करने से बचना चाहती हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दूसरी पार्टियों के मुकाबले कांग्रेस पर बीजेपी ज्यादा हमलावर होती है. इन रीजनल पार्टियों का वोटर कभी कांग्रेस का ही वोटर रहा है, इसलिए वे ये तो चाहती हैं कि बीजेपी कमजोर हो लेकिन इस शर्त पर नहीं कि कांग्रेस आगे बढ़े. कमजोर कांग्रेस में ही उनकी पार्टी उभर सकती है, ऐसा मानने की वजह से ही सपा, बसपा जैसी पार्टियां उससे दूरी बनाए रखना चाहती हैं. यूपी जैसा राज्य जहां 28 साल से कांग्रेस बाहर है और सपा, बसपा राज करते रहे हैं, ऐसे में वे क्यों चाहेंगे कि कांग्रेस की वापसी हो? कांग्रेस की वापसी उनके लिए बीजेपी जैसी ही मुश्किल खड़ा कर सकती है.

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बसपा प्रमुख मायावती ने तेल के बढ़े दाम पर बीजेपी के साथ कांग्रेस पर भी निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की गलत आर्थिक नीतियों को मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया, जिसकी वजह से आज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बेतहाशा इजाफा हुआ है.

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'24 अकबर रोड' नामक किताब लिखने वाले रशीद किदवई कहते हैं "क्षेत्रीय पार्टियां का जन्‍म कांग्रेस से ही हुआ है इसलिए वो नहीं चाहती हैं कि कांग्रेस आगे बढ़े. कांग्रेस मजबूत होगी तो वो कमजोर होंगी. क्षेत्रीय दलों की ताजपोशी कमजोर कांग्रेस ही कर सकती है. अभी क्षेत्रीय पार्टियां ऐसा माहौल बनाना चाहती हैं कि कांग्रेस मजबूरी में उनका समर्थन कर दे. वो आगे की जगह हाशिए पर रहे. उन्‍हें राहुल की ताजपोशी करने में कोई दिलचस्‍पी नहीं है. उनका स्‍वार्थ अपना किला मजबूत करने का है."

वरिष्‍ठ पत्रकार किदवई के मुताबिक "कांग्रेस राहुल गांधी को पीएम बनवाने के लिए छटपटा रही है, इससे विपक्षी पार्टियों को दिक्‍कत है. सियासत में अगर आप मजबूत होंगे तो ही आपका मान सम्‍मान होगा. कांग्रेस इस समय बहुत कमजोर है इसलिए ऐसी बातें हो रही हैं. राहुल गांधी को ऐसी कोई जीत नहीं मिल रही है कि उनकी धाक जमे. इसीलिए छोटी-छोटी पार्टियों उन पर दबाव बना रही हैं.”
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पिछले कुछ घटनाक्रमों को देखिए तो कई बार छोटी पार्टियों के सामने कांग्रेस बौनी नजर आती है. सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के साथ आने से भाजपा के घोर विरोधी दल भी परहेज करने लगे हैं. अखिलेश, मायावती, ममता बनर्जी, चंद्रशेखर राव और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता थर्ड फ्रंट को मजबूती से आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं और कांग्रेस को इग्नोर कर रहे हैं तो ऐसा करने के पीछे उनकी सोची समझी रणनीति काम कर रही है.

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हालांकि, राहुल गांधी यह एलान कर चुके हैं कि ‘उनकी पार्टी सभी राज्यों के प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा रखती है. वह इसके लिए पूरी तरह से तैयार हैं. कांग्रेस के लिए कोई भी अछूत नहीं है.’

ममता, अखिलेश, नायडू के ट्वीट और राहुल गांधी
याद कीजिए, बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और चंद्रबाबू नायडू ने जो ट्वीट किए, उसमें इन नेताओं ने कर्नाटक में बीजेपी पर मिली विपक्ष की सियासी कामयाबी का सेहरा राहुल गांधी के सिर नहीं बांधा. बनर्जी ने जीत का श्रेय पहले कर्नाटक की जनता को दिया, फिर एचडी देवगौड़ा, कुमारस्वामी और अंत में कांग्रेस को. लेकिन उसमें राहुल गांधी का जिक्र नहीं किया. अखिलेश यादव और चंद्रबाबू नायडू ने भी अपने ट्वीट में न तो कांग्रेस को श्रेय दिया और न ही राहुल गांधी को.







सियासी जानकारों का कहना है कि ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और चंद्रबाबू नायडू सहित कई क्षेत्रीय पार्टियों के नेता 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष के प्रत्याशी के तौर पर राहुल गांधी को नकारते नजर आ रहे हैं. वे नहीं चाहते कि राहुल गांधी का सियासी कद बढ़े.

क्या कांग्रेस को इसलिए किनारे कर रहीं पार्टियां?
यूपीए की कमान कांग्रेस के हाथ में है. लेकिन उसमें सिर्फ 10 पार्टियां रह गई हैं. संसद सदस्य सिर्फ 52 हैं. लोकसभा इलेक्शन के सबसे बड़े रणक्षेत्र उत्तर प्रदेश में हुए गोरखपुर और फूलपुर उप चुनावों में कांग्रेस का कहीं अता-पता नहीं था. जबकि सपा और बसपा ने मिलकर बीजेपी से उसकी यह सीटें छीन लीं. इसके बाद तय हो गया कि अब कम से कम यूपी में कांग्रेस भाजपा विरोधी दलों को लीड करने की हैसियत में नहीं है. हिमाचल और गुजरात चुनाव में मायावती कांग्रेस के साथ समझौता करके सीट चाहती थीं लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया. उधर, ममता बनर्जी और कांग्रेस की पुरानी सियासी खटपट है.

कांग्रेस से परहेज के पीछे क्या ये है रणनीति?
कांग्रेस के साथ पार्टी और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की इमेज से भी जुड़े सवाल हैं. दरअसल, बीजेपी सबसे ज्यादा कांग्रेस को टारगेट करती है तो इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है. भाजपा में ही कुछ लोग यह मानते हैं कि जब तक कांग्रेस के पास राहुल गांधी जैसा नेतृत्व रहेगा, तब तक हमारे लिए कांग्रेस का मुकाबला करना बेहद आसान रहेगा.

राजनीति के कई जानकार नरेंद्र मोदी की इतनी बड़ी छवि के लिए राजनीतिक तौर पर उनके सामने खड़े राहुल गांधी की कमजोर छवि को जिम्मेदार बताते हैं. बीजेपी अन्य पार्टियों के मुकाबले बहुत आसानी से भ्रष्टाचार एवं अन्य मसलों पर कांग्रेस को घेर लेती है. बीजेपी ने राहुल गांधी की इमेज अभी नौसिखिए की बनाई हुई है. इसलिए कांग्रेस से दूरी बनाकर मोदी के सामने खड़े होने की कोशिश हो रही है.

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अभी भाजपा विरोधी दलों के स्‍वीकार्य नेता नहीं हैं राहुल गांधी!
राजनीतिक विश्‍लेषक आलोक भदौरिया कहते हैं "राहुल गांधी अभी भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों के स्‍वीकार्य नेता नहीं हैं, लेकिन अगर मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मजबूत हुई तो क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ आ जाएंगे. लोकसभा चुनाव में असली रणक्षेत्र यूपी है, जहां उसे छोटा सहयोगी बनना स्‍वीकार करना पड़ेगा. क्‍योंकि वहां पार्टी की क्‍या हालत है यह बात राहुल गांधी अच्‍छी तरह से जानते हैं."

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