...जब बेबसी में कांग्रेस को हर बार नजर आईं शीला दीक्षित

Shiela Dikshit Dies at the Age of 81: जब दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए, तो शीला दीक्षित ने हर किसी को गलत साबित किया.

News18Hindi
Updated: July 21, 2019, 3:54 AM IST
...जब बेबसी में कांग्रेस को हर बार नजर आईं शीला दीक्षित
Shiela Dikshit Dies at the Age of 81: जब दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए, तो शीला दीक्षित ने हर किसी को गलत साबित किया.
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Updated: July 21, 2019, 3:54 AM IST
1998 का साल था. कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने एक चौंकाने वाली घोषणा की. शीला दीक्षित को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर सामने लाया गया. कुछ महीनों में चुनाव होने थे. हालांकि लगभग पूरी जिंदगी वो देश की राजधानी में ही रही थीं. राजीव गांधी की सरकार में राज्यमंत्री थीं. इसके बावजूद दिल्ली राजनीति के लिए वो अनजान चेहरा थीं.

दिल्ली राजनीति से उनकी पहचान महज इतनी थी कि उन्होंने पूर्वी दिल्ली क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और उसमें वो नाकाम रही थीं. पार्टी के भीतर और बाहर, उनके आलोचकों ने उन्हें एक लाइन में खारिज करते हुए कहा था- काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती. कांग्रेस के भीतर उनके विपक्षियों के मुताबिक उनकी एकमात्र 'योग्यता' गांधी-नेहरू परिवार का करीबी होना था. साथ ही, यह भी कि वो उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता उमाशंकर दीक्षित की बहू थीं.

जब शीला दीक्षित के सामने थी सबसे बड़ी चुनौती

कांग्रेस के लिए वो मुश्किल वक्त था. केंद्रीय नेतृत्व बिखरा हुआ था. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए की सरकार थी. दिल्ली में उनकी प्रमुख नेता सुषमा स्वराज थीं, जिन्हें साहिब सिंह वर्मा की जगह लाया गया था. शीला दीक्षित के लिए इससे मुश्किल चुनौती नहीं हो सकती थी.

जब दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए, तो शीला दीक्षित ने हर किसी को गलत साबित किया. कांग्रेस जीती और वो मुख्यमंत्री बनीं. कई मायनों में उनका जीतना राजधानी के बदलाव का प्रतीक था. वो पंजाबी खत्री परिवार से थीं, जिन्होंने दिल्ली में जीवन बिताया. लेकिन उनकी राजनीतिक विचारधारा उमा शंकर दीक्षित के साथ जुड़ती थी. दिल्‍ली में उन्‍होंने एक किस्‍म से पंजाबियत और पूर्वांचली का समन्वय किया.

कभी गुस्‍साती तो कभी मातृत्‍व भाव से मोह लेतीं

बीजेपी के मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा, वीके मल्होत्रा या कांग्रेस के जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार, मुकेश खन्ना या जेपी अग्रवाल के सामने वो एक नई उम्मीदें लेकर आईं. उनके साथ अतीत का कोई 'बैगेज' नहीं जुड़ा था. वो मृदुभाषी, पढ़ी-लिखी, शिष्ट, बहुत अच्छी तरह अपनी बात रखने वाली नेता थीं. हिंदी और अंग्रेजी पर उनकी समान रूप से पकड़ थी. मेहमानों को अपने गर्माहट भरे स्वभाव और मातृत्व भाव से मोह लेती थीं.
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उन्हें इसकी परवाह नहीं होती थी कि उनके खिलाफ किस तरह की बातें या साजिश की जा रही है. उन्हें पता था कि इसमें किसी को कामयाबी नहीं मिलेगी. कांग्रेस के प्रथम परिवार का उन्हें पूरा साथ हासिल था. इसलिए वो सरकार चलाने पर ध्यान देती थीं. उन्हें कई बातों का श्रेय जाता है. हालांकि मेट्रो योजना बीजेपी सरकार के वक्त बनाई गई थी. लेकिन, उनके वक्त दिल्ली को मेट्रो का तोहफा मिला.

बीजेपी सरकार में भी कभी LG से नहीं ठनी

शीला दीक्षित ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ बेहतर सामंजस्य सुनिश्चित किया. दिल्ली के लोगों के लिए जितना वो कर सकती थीं, किया. दिल्ली में फ्लाइओवर का जो जाल दिखाई देता है, उसमें शीला दीक्षित का बड़ा योगदान है. यमुना के किनारे कांच की खूबसूरत इमारत भी उनकी योजनाओं की वजह से है, जहां आज मुख्यमंत्री और सरकार का मुख्यालय है. एस्थेटिक सेंस या सौंदर्य और स्टाइल को लेकर उनकी समझ दिल्ली सरकार के मुख्यालय में दिखाई देती है.

शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं. इस दौरान केंद्र में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों सरकारें देखीं. लेकिन ऐसी एक भी घटना याद नहीं आती, जब मुख्यमंत्री और एलजी के बीच तनातनी हुई हो. केंद्र और राज्य सरकार के बीच पावर को लेकर भी कोई तनातनी नहीं हुई.

शीला ने भुगता मनमोहन के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का खामियाजा

इसका आकलन करना हमेशा मुश्किल रहा है कि वो विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कैसे हारीं. 15 साल सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी. उनके वक्‍त में दिल्‍ली में काफी काम हुआ, इसके बावजूद ऐसा हुआ. यकीनन उन्हें केंद्र में मनमोहन सिंह के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का खामियाजा भुगतना पड़ा.

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हार के बावजूद उनके और उनके समर्थकों के लिए एक बात अच्छी रही कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी का भरोसा उन पर बना रहा. 80 की उम्र में उन्हें यूपी में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया. हालांकि बाद में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में समझौता होने के बाद फैसला बदल लिया गया. लेकिन उन्हें फिर दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर लाया गया. उन्होंने ही तय किया कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ समझौता न हो.

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कुछ दिन पहले तक कांग्रेस में उनके विपक्षी लोग उनकी बीमारी को लेकर व्यंग्य कसते थे. उनके हर कदम का विरोध कर रहे थे, भले ही खुलेआम नहीं. उन्हें आज 81 साल की महिला की जीवटता को सलाम करना चाहिए. जिन्होंने तबीयत ठीक न होने के बावजूद अपनी क्षमता के मुताबिक श्रेष्ठतम देने की कोशिश की, ताकि पार्टी एक साथ हो और उसे दोबारा खड़ा किया जा सके. शीला दीक्षित अपने पीछे पार्टी और समर्थकों के लिए एक बड़ी विरासत छोड़कर गई हैं.
First published: July 21, 2019, 3:50 AM IST
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