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ANALYSIS: हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में छोटे झटकों से चौकस होगा BJP नेतृत्व!

अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: October 25, 2019, 10:01 PM IST
ANALYSIS: हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में छोटे झटकों से चौकस होगा BJP नेतृत्व!
पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व गृहमंत्री अमित शाह (File Photo)

हरियाणा (Haryana) में बीजेपी (BJP) को 41 सीट मिली और महाराष्ट्र (Maharashtra) में भी शिवसेना (Shiv Sena) के कंधे का सहारा जरूरी होगा. आखिर ऐसा क्या हुआ कि सारे आकलन फेल हो गए?

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  • Last Updated: October 25, 2019, 10:01 PM IST
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नई दिल्ली. लोकसभा चुनावों के खत्म होते ही हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा (Assembly Election 2019) चुनावों की तैयारियां शुरू हो गई थीं. आलम यह है कि हरियाणा (Haryana Assembly Election 2019) में मिशन 75 और महाराष्ट्र में अपने दम पर सरकार बनाने के लिए बीजेपी (BJP) ताल ठोक रही थी. पीएम मोदी का नाम और काम था, राष्ट्रीयाता से जुड़े मुद्दे थे और साथ ही राज्य सरकारों का बेहतर काम काज था. ऐसे में हार तो क्या कम सीटों की उम्मीद भी बीजेपी से जुड़े किसी नेता को नहीं थी. लेकिन परिणाम इसके ठीक उलट आया. हरियाणा में बीजेपी को 40 सीट मिली और महाराष्ट्र में भी शिवसेना के कंधे का सहारा जरूरी होगा. आखिर ऐसा क्या हुआ कि सारे आकलन फेल हो गए? क्या एक बार फिर कार्यकर्ता और नेता फील गुड में फंसते चले गए थे. आइए, हम एक-एक कर उन मुद्दों से परतें हटाने की कोशिश करते हैं.

हाई बेंच मार्क सेट करना
ऐसा नहीं है कि बीजेपी ने बहुत खराब प्रदर्शन किया. 5 साल सरकार चलाने के बाद दोबारा जनादेश पाना किसी भी पार्टी या सरकार के लिए आसान नहीं होता है. फिर भी महाराष्ट्र में सहयोगी के साथ मिलकर पूर्ण बहुमत तक पहुंच गए और हरियाणा में बहुमत के बिल्कुल करीब तक पहुंचकर सिर्फ पांच सीटों से रह गए.

हरियाणा में अब जोड़तोड़ से सरकार चलानी है और महाराष्ट्र में शिवसेना को भी संभालना पड़ेगा क्योंकि बीजेपी के कमजोर होने की आहट पाते ही उनके तेवर कड़े हो गए हैं. बहरहाल सरकार बनाने का फैसला हो ही गया है. चुनावों के पहले ही मौजूदा मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में ही आगे बढ़ने का ऐलान आलाकमान ने कर दिया था. लिहाजा, अब बहुत बड़े परिवर्तन की उम्मीद करना गलत होगा. दोनों मुख्यमंत्रियों ने ईमानदारी और काबिलियत से काम किया और आलाकमान की नजरों मे अच्छे भी बने रहे है. फिर, मुश्किल कहां आयी?

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हरियाणा और महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और मनोहर खट्टर को ही पार्टी ने सीएम पद के लिए चुना है. (File Photo)


पीएम मोदी और अमित शाह लक्ष्य को धीरे-धीरे उंचा उठाते हैं
पीएम मोदी और अमित शाह की एक कॉमन खासियत यह है कि वे चुनावों में अपने लक्ष्य को धीरे-धीरे ऊंचा उठाते हैं. एक बार बड़ा लक्ष्य सेट कर दिया तो कार्यकर्ता और जनता तक संदेश जाना शुरू हो जाता है. आपने हाई जंप का खेल तो देखा है ना. खिलाड़ी धीरे-धीरे रस्सी ऊंची करते जाते हैं जब तक कि पांव उससे टकरा ना जाएं. हरियाणा में विपक्ष बंटा था, कांग्रेस खुद ही अंदरूनी झगड़े से डूबने के कगार पर थी. चौटाला परिवार का कोई नंबर देने को तैयार नहीं था. ऐसे में आलाकमान ने अपनी हाई जंप का स्‍तर तय ही कर दिया कि हरियाणा में मिशन 75 होगा. अब सीटें आ जातीं तो चर्चा करने की जरूरत नहीं थी. लेकिन सच तो यही है कि इस बार हाई जंप में बीजेपी के पांव टकरा ही गए. बीजेपी जिस जाट बनाम गैर जाट की राजनीति कर रहे थी, वो जाट एकजुट हो गए.
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जाट वोट ने कांग्रेस की डूबती नैया बचाई
भूपिन्दर सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा ने जाटों का सहारा लिया और उन्होने कांग्रेस की डूबती नैया को किनारे तक तो पहुंचा ही दिया. खिलाड़ियों को टिकट देना भी लगता है जनता को रास नहीं आया. उधर टिकट बंटवारे में आला नेताओं के रिश्तेदारों और बच्चों को दरकिनार करना भी पार्टी के भीतर कलह बढ़ा गया. यहां तक कि टिकटों के बंटवारे में खरीद फरोख्त के आरोप लगे, लेकिन आलाकमान को भरोसा था कि नैया पार लग ही जाएगी.

शरद पवार ने चुनाव को ​मराठा बनाम दिल्ली बना दिया
उधर महाराष्ट्र में भी बीजेपी अपने दम पर ही बहुमत की बात कर रही थी. शिवसेना से गठबंधन तो किया लेकिन मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा ये साफ भी कर दिया. जीत के लिए इतने आश्वस्त थे कि कई दिग्गजों के टिकट काट दिए. ये बात और है कि आला नेता दबी जुबान से मानते रहे कि बागी काम खराब कर रहे हैं और 15-20 सीटों का नुकसान भी कर सकते हैं. और हुआ भी वही. चुनावों के ठीक पहले बैंक का घोटाला सामने आया. आम जनता अपने पैसों के लिए सड़कों पर रो रही थी. गड़बड़ी भले ही पिछली सरकारों की थी लेकिन इसका थोड़ा असर तो होना ही था कि थोड़ा वोट बैंक खिसका.

किसानों की समस्या ने शायद विदर्भ इलाके में बीजेपी को क्लीन स्वीप से रोक दिया
किसानों की समस्या ने शायद विदर्भ इलाके में बीजेपी को क्लीन स्वीप से रोक दिया और चुनावों के ठीक पहले शरद पवार को ईडी का नोटिस जिसने पवार को खुली जंग के लिए सामने ला खड़ा किया. पवार ने कहा ये लड़ाई मराठा बनाम दिल्ली की है. ऐसे में पश्चिमी महाराष्ट्र में एनसीपी को जबरदस्त जनादेश मिल गया और वो कांग्रेस से बड़ी पार्टी बन गयी. अब भले ही राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा हो लेकिन छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों ने कहीं ना कहीं गड़बड तो की, इसका मंथन आलाकमान तो करेगा ही. कुल मिलाकर सबक नंबर एक यही है कि बार उतना ही बढ़ाओ जो सच्चाई से परे ना हो और पीएम मोदी के हाई बेंच मार्क सेट करने के बाद पार्टी को भी उसी स्तर पर मेहनत करनी होगी तभी काम आसान होगा.

क्या कोर्स करेक्शन की जरूरत है
पीएम मोदी की कार्यशैली, उनकी लोकप्रियता, ऊपर से अमित शाह का 24 घंटे संगठन के हर पहिए को फीट रखना कहीं से नहीं जताता कि कोई कमी बचती होगी. पीएम मोदी और अमित शाह ने इस जीत के बाद बीजेपी मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए साफ कर दिया कि जनादेश उन्हे मिला है और एंटी इन्कंबेंसी के बावजूद भी मिला. ये जीत दोनों मुख्यमंत्रियों और पार्टी की जीत है. लेकिन जब सब ठीक ठाक चल रहा हो और थोड़ा झटका लग जाए तो जाहिर है आलाकमान को सोचना ही पड़ेगा. पार्टी आलाकमान को कोर्स करेक्शन से ज्यादा जरूरत है, सही लोगों को सही जगह पर काम पर लगाने की.

उपचुनावों से मिले झटकों ने बीजेपी को चौकस किया होगा
सिर्फ यूपी को छोड़ दें तो कई राज्यों में हुए उपचुनावों में मिले झटके ने बीजेपी आलाकमान को चौकस जरूर कर दिया होगा. खासकर बिहार में मिला झटका तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले कोर्स करेक्शन के लिए मजबूर जरूर कर देगा. लोकसभा चुनावों में पीएम मोदी का नाम और काम तो वोटरों के बीच बंपर हिट रहा, लेकिन इस बार लगता है स्थानीय स्तर पर राष्ट्रीय मुद्दे कई स्थानों पर नहीं चले, इसलिए राज्य के नेतृत्व को पीएम मोदी के नाम पर फील गुड होने के बजाए स्थानीय समस्याओं के लिए चौकस रहने की जरूरत है. आलाकमान को भी ऐसे प्रभारी नियुक्त करने चाहिए जो चौकस भी रहें और सच्चाई भी बताएं. और आलाकमान को तो हरियाणा, महाराष्ट्र के झटके ने चौकस जरूर कर दिया होगा.

तभी तो पीएम मोदी ने बीजेपी मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं को कहा कि अब दोनो सरकारों को अगले पांच साल पहले बीते पांच साल की तुलना में ज्यादा मेहनत करनी होगी. जनता ने संदेश दे दिया और पीएम मोदी ने पार्टी को. यानि अब तो आने वाले दिनों में लगता है कि बीजेपी नेताओं का वक्त जनता के बीच ही बीतने वाला है.

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First published: October 25, 2019, 1:17 PM IST
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