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हमारे सालाना कैलेंडर में प्रदूषण 'तीन दिवसीय इवेंट' बन गया है, समस्या अभी और विकराल होगी

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: November 5, 2019, 10:00 PM IST
हमारे सालाना कैलेंडर में प्रदूषण 'तीन दिवसीय इवेंट' बन गया है, समस्या अभी और विकराल होगी
पिछले तीन-चार साल से हर बार दिवाली की अगली सुबह देश की राजधानी में एयर क्वालिटी इंडेक्स खतरनाक स्तर पार कर जाता है. लेकिन प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर दो दिन का शोर अगले 363 दिनों के लिए फिर खामोश भी हो जाता है.

प्रदूषण (Pollution) भारत के कई शहरों में गहरी जड़ें जमा चुका है. भारत के 14 शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों (Polluted Cities List) में सबसे आगे हैं.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 10:00 PM IST
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नई दिल्ली. प्रदूषण (Pollution) भारत के कई शहरों में गहरी जड़ें जमा चुका है. भारत के 14 शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों (Polluted Cities List) में सबसे आगे हैं. इन शहरों में PM 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से दस गुना तक ज्यादा है. कानपुर सबसे प्रदूषित शहरों में है और उसके बाद फरीदाबाद, वाराणसी, गया, पटना, दिल्ली, आगरा और लखनऊ का नंबर है. आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो साल में 9 लाख मौत प्रदूषण की वजह से हो रही है और दिन-ब-दिन प्रदूषण की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है.

भीषण प्रदूषण की चपेट में दिल्ली
प्रदूषण की चपेट में राजधानी दिल्ली इस कदर डूब चुकी है कि एक अनुमान के मुताबिक यहां के लोगों की औसत आयु 7 साल घट चुकी है. जाहिर है केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों द्वारा प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने की कवायद तो शुरू की जा चुकी है. लेकिन अन्य वजहों से जानलेवा बन चुका प्रदूषण लोगों के लिए गहरी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है.

विकास का बायप्रोडक्ट है प्रदूषण

इसमें कोई शक नहीं कि आने वाले समय में भारत दुनिया की दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले में ज्यादा तेज विकास दर हासिल करने जा रहा है. वहीं हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत साल 2025 तक 7.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर के साथ चीन की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ देगा. आंकड़ों के हिसाब से आर्थिक विकास आकर्षक दिखाई पड़ता है लेकिन विकास की तेज रफ्तार का दुष्परिणाम अनियंत्रित प्रदूषण के रूप में सामने आने लगा है.



तीन-चार सालों में हालत और खराब
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पिछले तीन-चार साल से हर बार दिवाली की अगली सुबह देश की राजधानी में एयर क्वालिटी इंडेक्स खतरनाक स्तर पार कर जाता है. लेकिन प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर दो दिन का शोर अगले 363 दिनों के लिए फिर खामोश भी हो जाता है. दिल्ली के प्रदूषण को लेकर हायतौबा मचाने वाली मीडिया, राजनीति करने वाली सियासी पार्टियां और प्रदूषण नियंत्रण का दावा करने वाली सरकारें साल के दो दिनों का इस्तेमाल सालाना उर्स की तरह करती हैं. दिल्ली की हवा खराब होने का आरोप पड़ोसी राज्यों पर मढ़ने के बाद केंद्र और दिल्ली सरकार की जवाबदेही क्या खत्म हो जाती है?

चीन से तुलना करना कितना सही ?
भारत की चुलना चीन के साथ विकास को लेकर की जाती है लेकिन बीजिंग की तर्ज पर दिल्ली के प्रदूषण को कम करने की कोशिश क्यों नहीं होती? पिछले कुछ सालों से धुंधला आसमान देखने के आदी पड़ चुके दिल्ली और आसपास के लोगों में प्रदूषण को लेकर चिंता तो बढ़ी है लेकिन इसको रोकने को लेकर कितनी सहभागिता है इसका अध्ययन तक नहीं हो पाया है?

चीन ने किए कई उपाय
चीन की सरकार ने बीजिंग में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर बेहद जोर दिया. बीजिंग में कोयला जलाने पर सख्त रोक लगाई गई. कोयले की खदानों को बंद किया गया तो साथ ही सीमेंट और स्टील उत्पादन में पूरी तरह पाबंदी लगाई गई. अगर दिल्ली की बात करें तो यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के प्रति जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है और जहां 10 हजार बसों की जरूरत है वहां तीन हजार बसें चलाकर कैसे प्रदूषण को कंट्रोल किया जा सकता है?



कब सुधरेगी दिल्ली
दिल्ली में कंस्ट्रक्शन की वजह से हवा में डस्ट पार्टिकल में सबसे ज्यादा इजाफा होता है. ऐसे में सवाल उठता है सड़क किनारे की धूल को उड़ने से रोकने के लिए वैक्यूम क्लीनिंग मशीनों की उपलब्धता कराई गई है? ऑड-ईवन फॉर्मूला और कंस्ट्रक्शन पर रोक लगा कर ही पॉल्यूशन पर कंट्रोल नहीं किया जा सकता है. दिल्ली में तकरीबन बीस हजार फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिनकी वजह से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है.

सबसे बड़ा सवाल आम जागरुकता का भी है. ऐसा लगता है कि लोगों की जिंदगी में प्रदूषण भी हवा-पानी की तरह हो गया है. सर्दियों के मौसम में जब रुकी हुई हवा के बीच प्रदूषण से दम घुटता है तब लोग प्रदूषण पर चिंता दिखाते हैं. यही वजह है कि प्रदूषण भी अब 12 महीने के कैलेंडर में तीन दिवसीय इवेंट सा हो गया है, जिस पर टीवी में बहस, चौराहों पर चर्चा, मंत्रिमंडल में बैठक और योजनाओं पर अधिकारियों का अखाड़ा लगता रहता है. उसके बाद पूरे साल प्रदूषण का मुद्दा पराली के धुएं में कहीं गुम हो जाता है.
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First published: November 5, 2019, 10:00 PM IST
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