लोकसभा चुनाव 2019: राहुल गांधी-अखिलेश यादव के बीच क्यों नहीं बन पा रही सहमति?

क्या अखिलेश यादव को राहुल गांधी का साथ पसंद नहीं है या फिर वो यूपी में कांग्रेस की सियासी हैसियत याद दिला रहे हैं

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: August 8, 2018, 3:20 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019: राहुल गांधी-अखिलेश यादव के बीच क्यों नहीं बन पा रही सहमति?
एसपी, बीएसपी, आरएलडी से बची सीटें ही कांग्रेस को क्यों देना चाहते हैं अखिलेश? (File photo)
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: August 8, 2018, 3:20 PM IST
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस ज्यादा की उम्मीद न करे. मंगलवार को अखिलेश ने न्यूज18 इंडिया की ‘बैठक’ में 'महागठबंधन का नायक कौन?' सत्र में सीटों के बंटवारे पर अपना रुख स्पष्ट किया. अखिलेश ने कहा, यूपी में फिलहाल एसपी, बीएसपी और आरएलडी एक साथ हैं. जो सीटें बचेंगी उसमें से कांग्रेस को भी सीटें मिलेंगी.' ऐसे में सवाल ये है कि यूपी के लड़कों के बीच आखिर सहमित क्यों नहीं बन पा रही. क्या अखिलेश यादव को राहुल गांधी का साथ पसंद नहीं है या फिर वो अपने बयानों से यूपी में कांग्रेस की सियासी हैसियत याद दिला रहे हैं?

कांग्रेस यूपी में वापसी के लिए 28 साल से इंतजार कर रही है. इस साल मार्च में हुए गोरखपुर और फूलपुर उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई. कांग्रेस को लोगों ने बुरी तरह से नकार दिया. जबकि सपा और बसपा ने मिलकर बीजेपी से उसकी यह सीटें छीन लीं. इसके बाद तय हो गया कि अब कम से कम यूपी में कांग्रेस भाजपा विरोधी दलों को लीड करने की हैसियत में नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस परिणाम के बाद कांग्रेस की सीट बारगेनिंग पावर खत्म हो गई है. जबकि सपा, बसपा इसी परिणाम के आधार पर खुद को तौल रहे हैं.



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दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार का मानना है कि सपा-बसपा यूपी की दो बड़ी पार्टियां हैं, रिजल्ट के मामले में उनके सामने कांग्रेस यूपी में कहीं नहीं ठहरती. इसलिए सपा, बसपा, आरएलडी का गठबंधन कांग्रेस को उनकी दो-तीन पारंपरिक सीटें ही देना चाहती है. हो सकता है कि कम सीट मिलने की वजह से कांग्रेस अलग लड़े, लेकिन गठबंधन में शामिल न होने का मतलब ये नहीं रहेगा कि कांग्रेस सपा, बसपा और आरएलडी की दुश्मन हो जाएगी.

दरअसल, इस समय सच्चाई तो यही है कि मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस और  उसके अध्यक्ष राहुल गांधी इस स्थिति में नहीं दिख रहे हैं कि उनके नेतृत्व में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का मुकाबला किया जा सके. 2014 के लोकसभा चुनावों से लेकर अब तक सिर्फ पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया है. कांग्रेस सिर्फ अमेठी और रायबरेली के अपने गढ़ में सिमटी हुई है, इसलिए अखिलेश यादव उसे ज्यादा तवज्जो नहीं देना चाहते.

राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने का ख्वाब देख रही कांग्रेस पर न सिर्फ सपा प्रमुख अखिलेश यादव दबाव बनाते दिख रहे हैं बल्कि अन्य छोटी-छोटी पार्टियों ने भी इसी तरह की प्रेक्टिस शुरू कर दी है. लगातार चुनाव हारती कांग्रेस अब यूपी में तो छोटी पार्टियों के सामने भी बौनी नजर आ रही है. सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के साथ आने से बीजेपी के घोर विरोधी दल भी परहेज करने लगे हैं. ममता बनर्जी, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू, अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेता थर्ड फ्रंट को मजबूती से आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं और कांग्रेस को इग्नोर कर रहे हैं.

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कांग्रेस के साथ पार्टी और पार्टी अध्यक्ष की इमेज से भी जुड़े सवाल हैं. दरअसल, बीजेपी सबसे ज्यादा कांग्रेस को टारगेट करती है तो इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है. भाजपा में ही कुछ लोग यह मानते हैं कि जब तक कांग्रेस के पास राहुल गांधी जैसा नेतृत्व रहेगा, तब तक हमारे लिए कांग्रेस का मुकाबला करना बेहद आसान रहेगा.

राजनीति के कई जानकार नरेंद्र मोदी की इतनी बड़ी छवि के लिए राजनीतिक तौर पर उनके सामने खड़े राहुल गांधी की कमजोर छवि को जिम्मेदार बताते हैं. बीजेपी अन्य पार्टियों के मुकाबले बहुत आसानी से भ्रष्टाचार एवं अन्य मसलों पर कांग्रेस को घेर लेती है. बीजेपी ने राहुल गांधी की इमेज अभी नौसिखिए की बनाई हुई है. इसलिए कांग्रेस से दूरी बनाकर मोदी के सामने खड़े होने की कोशिश हो रही है.
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