सुषमा भारतीयों के लिए उतनी ही दूर थीं, जितना आपके हाथों से सोशल मीडिया

दुनिया में कहीं भी कोई भारतीय परेशानी में हो तो सुषमा स्वराज वो नेता थीं जो उसकी मदद के लिए सबसे पहले खड़ी दिखाई देती थीं.

Anil Rai | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 10:02 AM IST
सुषमा भारतीयों के लिए उतनी ही दूर थीं, जितना आपके हाथों से सोशल मीडिया
बीजेपी के अटल-आडवाणी युग में इन दोनों से बाद सुषमा स्वराज को सुनने के लिए ही भीड़ जमा होती थी. (फाइल फोटो)
Anil Rai
Anil Rai | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 10:02 AM IST
सुषमा स्वराज! ये वो नाम है जो पिछले पांच वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद विदेशों में बसे भारतीयों के बीच सबसे लोकप्रिय रहा है. दुनिया के किसी हिस्से में कोई भारतीय परेशानी में हो तो पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सिर्फ उससे उतनी ही दूर थीं जितना कि उसके हाथ से सोशल मीडिया. सुषमा देश की उन महिला राजनेताओं में से थीं, जिन्होंने अपने पति के साथ राजनीति से लेकर वकालत तक हर जगह बराबरी का मुकाम हासिल किया. यानी परिवार और राजनीति दोनों पर बराबर की पकड़. राजनीति में ऐसी कम ही जोड़ियां होंगी जिनके नाम राजनीतिक रिकॉर्ड दर्ज हों और वो भी अपने-अपने पदों पर सबसे युवा चेहरा होने का.

25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनीं
70 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़ने वाली सुषमा स्वराज शादी के बाद अपने पति स्वराज कौशल के प्रभाव में जार्ज फर्नांडिस की टीम का हिस्सा बन गईं. आपातकाल में सुषमा ने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, 1977 में उन्होंने अंबाला छावनी विधानसभा क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा के लिए विधायक का चुनाव जीता और चौधरी देवीलाल की सरकार में 1977 से 79 के बीच श्रम मंत्री बनीं और 25 साल की उम्र में कैबिनेट में जगह पाने का रिकॉर्ड बनाया. 1979 में तब 27 वर्ष की स्वराज हरियाणा राज्य में जनता पार्टी की राज्य ईकाई की अध्यक्ष भी रहीं.

उनको सुनने के लिए जमा होती थी भीड़

सुषमा स्वराज की राजनीति के शुरुआती दिनों को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय बताते हैं कि 1978 में बिहार के समस्तीपुर लोकसभा सीट के चुनाव के दौरान उन्होंने पहली बार सुषमा स्वराज को सुना. वो यहां जनता पार्टी के उम्मीदवार अजीत कुमार मेहता का चुनाव प्रचार करने पहुंची थीं. यहां मेहता का मुकाबला कांग्रेस की दिग्गज नेता तारकेश्वरी सिन्हा से था. सहाय बताते हैं कि उस दौर में उन्होंने पहली बार कांग्रेस को छोड़ किसी दूसरी पार्टी में इतनी प्रखर और युवा महिला नेता को सुना था जिनकी भाषा और शैली दोनों पर इतनी मजबूत पकड़ हो. बीजेपी के अटल-आडवाणी युग में इन दोनों से बाद सुषमा स्वराज को सुनने के लिए ही भीड़ जमा होती थी.

क्या पता था दुनिया से ही विदा ले लेंगी
सुषमा स्वराज ने पिछले साल नवंबर में चुनाव न लड़ने का ऐलान कर साफ कर दिया था कि वो सक्रिय राजनीति से दूर होना चाहती हैं. इसके बाद अटकलों का बाजार गर्म हो गया. हालांकि, बाद में उनके पति स्वराज कौशल ने कहा कि 'एक समय के बाद मिल्खा सिंह ने भी दौड़ना बंद कर दिया था. आप तो पिछले 41 साल से चुनाव लड़ रही हैं.' इशारा साफ था कि सुषमा किसी और कारण से नहीं बल्कि निजी कारणों से राजनीति से दूर होना चाहती थीं. सुषमा ने जब निजी कारणों से चुनाव लड़ने से इनकार किया तो किसी को क्या पता था लोगों के दिलों पर राज करने वाली ये नेता इतनी जल्दी दुनिया से विदा ले लेंगी.
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First published: August 7, 2019, 8:24 AM IST
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