BJP का कार्यकर्ता हो या नेता, सब सुषमा स्वराज को कहते थे दीदी

सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) पूरी पार्टी की दीदी थीं. पार्टी का बड़ा नेता हो, छोटा नेता या कार्यकर्ता, हर कोई उन्हें दीदी कहकर बुलाता था.

अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 6:15 AM IST
BJP का कार्यकर्ता हो या नेता, सब सुषमा स्वराज को कहते थे दीदी
उनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति थी (File Photo)
अमिताभ सिन्हा
अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 6:15 AM IST
सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) पूरी पार्टी की दीदी थीं. पार्टी का बड़ा नेता हो, छोटा नेता या कार्यकर्ता, हर कोई उन्हें दीदी कहकर बुलाता था. उनकी पहचान साफ-सुथरी राजनीति थी. वो ऐसी राजनेता थीं, जिनको कभी अपनी बात कहकर या बयान देकर उसे वापस नहीं लेना पड़ा. ये सब ऐसी खूबियां थीं, जो उन्हें बाकियों से अलग करती थीं. सुषमा स्वराज की कार्यकुशलता और संगठन संभालने की क्षमता के लालकृष्ण आडवाणी भी कायल थे.

जब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी शीर्ष पर थे, उस दौरान जो दूसरी पीढ़ी के नेता आगे आए, उनमें सुषमा जी थीं. उन नेताओं में सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार प्रमुख थे. इस तरह पांच-छह नेता थे, जिन्हें युवा तुर्क के रूप में जाना जाता था. जिनके हाथों में राजनीति की पूरी कमान आई थी. सुषमा स्वराज अब नहीं रहीं. अनंत कुमार भी अब नहीं रहे. नरेंद्र मोदी के हाथ में देश की कमान है. अटल बिहारी वाजपेयी के समय में ऐसी पीढ़ी तैयार हुई, जिसे आने वाली सदियां याद रखेंगी.

जेपी आंदोलन से बनी थीं नेता
सुषमा जी इमरजेंसी और जेपी आंदोलन से निकली नेता थीं. 1975 से 1977 जब कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं, तब इमरजेंसी लगी थी. उस दौरान उन्होंने काफी संघर्ष किया. जब बंसीलाल की सरकार बनी, तो 25 बरस की उम्र में विधायक चुनकर आई थीं और मंत्री भी बनीं. वो सबसे युवा विधायक और मंत्री थीं. उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. इसके बाद वो सांसद रहीं. 1998 में जब केंद्र में सरकार बनी तो उनको मंत्री बनाया गया.

चार-पांच सालों में पत्रकारों से मिलना लगभग बंद कर दिया था (File Photo)


हालांकि, उन्होंने पिछले चार-पांच सालों में पत्रकारों से मिलना लगभग बंद कर दिया था. उसके बावजूद मैं जब भी उनसे मिलता था तो कहता था कि आपने जो काम शुरू किया है, उससे आने वाले विदेश मंत्री खुश नहीं होंगे, क्योंकि आपने बहुत बड़ी लकीर खींच दी है. उन्होंने आयरन कर्टन के पीछे बंद विदेश मंत्रालय को आम जनता के लिए खोल दिया.

अप्रवासियों के बीच लोकप्रिय
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दुनिया भर में बसे अप्रवासी भारतीयों के लिए मंत्रालय का दरवाजा खोल दिया. उनके समय में पासपोर्ट के तमाम केंद्र बने. ऐसी चीजें उन्होंने कर दीं, जिससे विदेश मंत्रालय आम आदमी के घर पहुंच गया. अब न पासपोर्ट बनवाने में दिक्कत है, न विदेश मंत्रालय से संपर्क करने में.

एक ट्वीट करने पर सुषमा स्वराज मदद के लिए तैयार दिखाई देती थीं (File Photo)


आप दुनिया के किसी भी कोने में हो और मुश्किल में फंस गए हो, तो एक ट्वीट करने पर सुषमा स्वराज मदद के लिए तैयार दिखाई देती थीं. विदेश मंत्रालय उनकी मदद करता था. दुनिया भर में हमारे राजदूत उनका कॉल किसी भी समय आने के लिए तैयार रहते थे. वो बेहद सजग और अलर्ट मोड में आ गए थे. उन्होंने पूरी दुनिया में बसे भारतीयों के मन में भरोसा भरा.

यही नरेंद्र मोदी सरकार और सुषमा स्वराज की बड़ी उपलब्धि है कि दुनिया भर में भारतीयों का डंका बजने लगा. जब अपने दूतावास और प्रशासन पर यकीन होता है, तो आम आदमी विदेश में भी ताकतवर महसूस करने लगता है.

कोई मुश्किल में हो तो सुषमा जी हमेशा मदद करती थीं (File Photo)


अगर कोई मुश्किल में हो तो सुषमा जी हमेशा मदद करती थीं. लेकिन अगर उन्हें लग गया कि कोई ट्वीट करके उन्हें बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा है या गलत काम करवाना चाह रहा है, तो ट्विटर पर ही लताड़ देती थीं. इसका मतलब यही है कि सही और गलत की उन्हें बखूबी पहचान थी. हर सही व्यक्ति की, दुखियारे की मदद करती थीं.

विदिशा से दो बार जीतीं चुनाव
मैं उन्हें मध्य प्रदेश से ज्यादा दिल्ली की नेता के रूप में याद करना चाहूंगा. मध्य प्रदेश में विदिशा से वो दो बार चुनकर आईं. विदिशा से शिवराज सिंह चौहान और कभी अटल बिहारी वाजपेयी जीते. यह बीजेपी के लिए सुरक्षित सीट थी. वहां से जीतना सुषमा जी के लिए बहुत आसान रहा. लेकिन नई दिल्ली सीट से चुना जाना, केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर दिल्ली की मुख्यमंत्री बनना, मुख्यमंत्री बनने के बाद दो महीने में बीजेपी का कायाकल्प करने की कोशिश करना, ये सब खास है.

दिल्ली के नेता और कार्यकर्ता उन्हें हमेशा अपने करीब पाते थे (File Photo)


जब थीं दिल्ली की मुख्यमंत्री...
जब वो मुख्यमंत्री थीं, तो पूरी रात-रात भर दिल्ली का दौरा कर सड़क का हाल जानती थीं. जनता का हाल जानती थीं. क्राइम रोकने की कोशिश करती थीं. ये सारी चीजें थीं. जो उन्हें दिल्ली से करीब रखती थीं. दिल्ली के नेता और कार्यकर्ता उन्हें हमेशा अपने करीब पाते थे. तभी यह कहा जाता था कि अगर शीला दीक्षित के सामने सुषमा स्वराज को खड़ा कर दिया जाए, तभी बीजेपी का भला होगा. लेकिन शायद सुषमा जी को केंद्र की राजनीति ज्यादा भाती थी. उनका कद केंद्र की राजनीति के लिए ही था. इसी के अऩुरूप उन्हें विदेश मंत्रालय मिला, जिसका काम उन्होंने इस तरह निभाया, जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी.

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First published: August 7, 2019, 5:24 AM IST
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