UP Election Result 2018: रंग लाई अखिलेश-मायावती की सियासी दोस्ती!

गोरखपुर और फूलपुर दोनों लोकसभा क्षेत्रों में जातीय समीकरण हावी दिखा है. यह भी साफ हो रहा है कि सपा-बसपा मिल जाएं तो बीजेपी को हराना बहुत आसान है

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 6:01 PM IST
UP Election Result 2018: रंग लाई अखिलेश-मायावती की सियासी दोस्ती!
गोरखपुर का चुनाव परिणाम बड़ा सियासी संदेश देंगे
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 6:01 PM IST
मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम...! 1993 में कांशीराम-मुलायम सिंह की दोस्ती के बाद यह नारा लगा था. नजीता यह हुआ था कि दलित और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी से सपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उप चुनाव में भी सपा और बसपा की दोस्ती रंग लाई.बीजेपी को हराने में मुलायम-कांशीराम वाला पुराना फार्मूला काम आया.

फूलपुर में समाजवादी पार्टी के नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने बीजेपी प्रत्याशी कौशलेंद्र पटेल को हरा दिया है. गोरखपुर में सपा के प्रवीण निषाद ने भी चुनाव जीत लिया है. यह सीट 28 साल (1989) से लगातार मंदिर के पास थी. आदित्यनाथ 1998 से लगातार बीजेपी की टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. लेकिन उनके सीएम बनने के बाद पहली बार गोरखनाथ मठ से बाहर वाले व्यक्ति को बीजेपी ने टिकट दिया था.

सियासी जानकारों का कहना है कि दोनों जगहों पर सपा को बसपा के समर्थन का असर साफ दिखाई दे रहा है. इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2019 में दोनों पार्टियां मंच साझा करेंगी. क्योंकि इस दोस्ती से यदि योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र में बीजेपी का तिलिस्म टूट गया है तो दूसरी जगहों पर तो यह और कारगर साबित हो सकता है. सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने कहा है कि बीएसपी का गठबंधन काम कर रहा है. ऐसा नहीं होता तो परिणाम इतना अच्छा नहीं होता.

गोरखपुर बीजेपी की पारंपरिक सीट मानी जाती रही है वहीं फूलपुर में कांग्रेस और समाजवादियों का कब्‍जा रहा है. 2014 की मोदी लहर में पहली बार फूलपुर में बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने फूल खिलाया था. लेकिन इस बार सपा को बसपा का समर्थन मिलने के बाद स्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं.

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गोरखपुर और फूलपुर में सत्‍तारूढ़ पार्टी ने इसलिए ताकत झोंकी हुई थी क्‍योंकि यहां पर हार का संदेश बहुत गलत जाएगा. विरोधियों को यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पर सवाल उठाने का मौका मिलेगा. इसलिए न सिर्फ मुख्‍यमंत्री बल्‍कि अलग-अलग समाजों से आने वाले मंत्रियों को अपनी-अपनी जाति के मतदाताओं को बीजेपी के पक्ष में गोलबंद करने के काम में लगाया गया था. सीएम आदित्यनाथ गोरखपुर में और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर में सपा व उसके सहयोगियों के सामने संघर्ष करते नजर आए. दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में ताबड़तोड़ सभाएं कीं लेकिन जनता के मूड को भांप नहीं सके.

पिछले दो चुनावों का विश्लेषण करें तो गोरखपुर में योगी को कोई टक्कर देने वाला नहीं था. लेकिन, इस बार न तो योगी खुद खड़े थे और न ही मंदिर से जुड़ा कोई व्यक्ति. सपा ने यहां निषाद कार्ड खेला. सपा यहां निषाद-यादव-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही. दलित गठजोड़ से उसे और मजबूती मिल गई.

फूलपुर में क्यों हारती नजर आ रही है बीजेपी?

अखिलेश यादव के प्रत्याशी नागेंद्र सिंह पटेल को मायावती के समर्थन के बाद ही यहां उलटफेर की संभावना बन गई थी. बीजेपी के लिए मुश्किल यह थी कि यह उसकी पारंपरिक सीट नहीं थी. केशव प्रसाद खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे न तो उनके परिवार का कोई मैदान में था. इसलिए उनकी बिरादरी के वोट बंटे गए. सपा अध्यक्ष ने योगी सरकार में केशव प्रसाद मौर्य की हैसियत बताकर मौर्य, कुशवाहा वोटों को अपनी ओर करने की पूरी कोशिश की.

यहां सबसे ज्यादा पटेल वोट हैं. इसलिए सपा, भाजपा दोनों ने पटेल उम्मीदवार खड़े किए. इससे पटेल वोटों का विभाजन हो गया. कांग्रेस ने ब्राह्मण जाति से मनीष मिश्रा को उतारा, कहीं न कहीं इस दांव से बीजेपी का वोट कटा क्योंकि ब्राह्मण बीजेपी का कोर वोटर माना जाता रहा है. इस क्षेत्र में करीब एक लाख दलित वोट हैं. बसपा के समर्थन के बाद इसका फायदा सपा को मिला.

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बसपा प्रमुख मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं " सपा से दोस्ती के लिए न सिर्फ मायावती खुद सोच रही थीं बल्कि उनके कार्यकर्ताओं के बीच से भी आवाज आ रही थी. अब तक आए रुझानों को देखते हुए यही लगता है कि इस दोस्ती का परिणाम सपा के लिए सुखद रहा है और इससे 2019 में गठबंधन होने की संभावना बढ़ेगी. दोनों ने देख लिया है कि यदि वे एक हो जाएं तो फिर बीजेपी को हराना कोई बड़ा काम नहीं."

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