BJP ने क्यों चला था SC/ST एक्ट का दांव, क्या है चुनावी गणित!

सरकार नहीं चाहती कि उसकी इमेज एससी/एसटी विरोधी बने क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में 24 प्रतिशत दलितों ने बीजेपी के लिए मतदान किया था.

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 1:57 PM IST
BJP ने क्यों चला था SC/ST एक्ट का दांव, क्या है चुनावी गणित!
क्या संख्याबल की वजह से राजनीति में महत्वपूर्ण हैं एससी/एसटी?
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 1:57 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी/एसटी एक्ट में जो बदलाव किया, उसे मोदी सरकार ने बिल लाकर बेअसर कर दिया. सवाल ये है कि सवर्णों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने आखिर अनुसूचित जातियों के लिए इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? क्या इस कदम के पीछे पार्टी की बड़ी राजनीतिक मंशा है? या फिर वो वाकई दलित हितैषी है? जो भी हो, अब सरकार अपने इस दांव में घिरती नजर आ रही है. क्योंकि उसके खिलाफ सवर्णों ने मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने भारत बंद का आह्रवान किया है.

सरकार के लिए मुश्किल ये है कि एससी/एसटी की संख्या अच्छी खासी है. इसीलिए ये समाज बड़ी सियासी ताकत है. जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता. 150 से ज्यादा संसदीय सीटों पर एससी/एसटी का प्रभाव माना जाता है. देश की कुल जनसंख्या का 25.2 फीसदी यही वर्ग है. सियासत में संख्याबल बहुत महत्वपूर्ण होता है. इसी की वजह से एससी/एसटी बीजेपी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं. इसमें पैठ बनाने के लिए बीजेपी डॉ. भीमराव आंबेडकर का सहारा ले रही है. क्योंकि इसी वोटबैंक के सहारे मायावती चार बार यूपी की सीएम रह चुकी हैं. रामबिलास पासवान,  रामदास अठावले, प्रकाश आंबेडकर और उदित राज जैसे नेताओं का उदय हुआ है.

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बीजेपी यह मिथक तोड़ने की कोशिश में भी है कि एससी/एसटी वोटों पर सिर्फ बसपा जैसी पार्टियों का ही हक है. इसमें काफी हद तक वो कामयाब भी दिखती है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के एक सर्वे के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनावों में 24 प्रतिशत दलितों ने बीजेपी के लिए मतदान किया था. इस परिणाम के बाद बीजेपी लगातार इस वोटबैंक की तरफ फोकस किए हुए हैं.

बीजेपी सांसद अशोक दोहरे  ने सवर्णों के आंदोलन पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि एससी/एसटी एक्ट में कुछ भी बदला नहीं है. इसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा गया है, फिर सवर्ण क्यों विरोध कर रहे हैं? दोहरे ने कहा “मोदी सरकार ने 2015 में इस एक्ट को और मजबूत किया था. इसमें 25 तरह के और कार्यों को भी अपराध के दायरे में लाया गया था. पहले सिर्फ 22 मामलों में यह एक्ट लगता था. तब भी इसका कोई विरोध नहीं हुआ था. अनुसूचित जाति के लोगों ने मोदी सरकार के इस फैसले की सराहना की. सरकार और पार्टी पर इस विरोध का कोई असर नहीं पड़ेगा बल्कि पार्टी इससे मजबूत होगी.”

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एसएस/एसटी उत्पीड़न को लेकर बीजेपी सांसदों सावित्री बाई फुले, छोटेलाल खरवार, उदित राज, यशवंत सिंह और अशोक दोहरे आदि लगातार आवाज उठाते रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा. एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एनडीए के घटक दलों के नेता राम विलास पासवान, चिराग पासवान, रामदास अठावले और बीजेपी के एससी/एसटी सांसदों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बीजेपी किसी भी सूरत में यह नहीं चाहती कि उसकी इमेज एससी/एसटी विरोधी बने. इसलिए उसने न सिर्फ इस एक्ट को मजबूत किया बल्कि इस पर सुप्रीम कोर्ट के संशोधन को सबसे बड़ी पंचायत में बिल लाकर बेअसर भी कर दिया. दलित चिंतक मानते हैं कि  भीमा कोरेगांव, सहारनपुर और मेरठ जैसी घटनाओं से बीजेपी की छवि दलित विरोधी बनती नजर आई, जिसकी वजह से वह एससी/एसटी एक्ट पर संजीदा दिखी. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि सिर्फ बीजेपी नहीं एनडीए में शामिल दूसरी पार्टियों की वजह से भी एक्ट दोबारा मजबूत किया गया.

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चुनावी विश्लेषक बताते हैं कि दलित और ओबीसी वोटों में सेंधमारी के बिना बीजेपी सिर्फ अपने कोर वोटरों (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) के सहारे सत्ता तक नहीं पहुंच सकती. इसीलिए बीजेपी जम्मू-कश्मीर के उन दलितों का भी मुद्दा उठा रही है जिन्हें अनुच्छेद 35ए की वजह से अब तक वहां की नागरिकता नहीं मिल पाई.

गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा के उपचुनावों में गठबंधन की वजह से दलित-मुस्लिम एकता देखने को मिली थी. यह बीजेपी के लिए बड़ी चिंता का विषय हैं.भीम आर्मी जैसे संगठन गतिविधियां बढ़ा रहे हैं. एससी/एसटी में मायावती की पकड़ अभी भी मजबूत मानी जा रही है. इसलिए इस वोट बैंक को लेकर बीजेपी चुप नहीं बैठने वाली है.

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यही वजह है कि बीजेपी  ने पहले मेरठ की रहने वाली कांता कर्दम को राज्यसभा भेजा. आगरा की रहने वाली बेबीरानी मौर्य को उत्तराखंड का राज्यपाल बना दिया है. ये दोनों महिला होने के साथ-साथ जाटव बिरादरी से आती हैं. मायावती भी जाटव बिरादरी से हैं.  इसे जाटवों में पैठ बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 21 प्रतिशत है.  उनमें लगभग 66 उप-जातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बंटी हुई हैं. यूपी की दलित जनसंख्या में जाटव 52 से 55 प्रतिशत बताए गए हैं.

हालांकि, 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं "बीजेपी उसी समय दलितों में सेंध लगा सकती है जब दलितों को यह लगे कि मायावती जीत नहीं सकतीं. फिलहाल बसपा-सपा गठबंधन के बाद उसे लग रहा है कि मायावती चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं."

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