क्यों 26 साल पहले बर्खास्त की गई थीं बीजेपी की चार राज्य सरकारें?

अयोध्या की वजह से अपनी चार राज्यों की सरकार को बर्खास्त करने के मुद्दे को बीजेपी ने हवा दी… लेकिन क्या इसका फायदा मिला?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 12:49 PM IST
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 12:49 PM IST
अयोध्या में आज के ही दिन 1992 में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का ढांचा तोड़ दिया था. इसके बाद देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई. खासतौर पर मुस्लिम समाज में. तमाम शहरों में प्रदर्शन हुए, दंगे शुरू हो गए. हालात बिगड़ते देख केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने बीजेपी शासन वाली चार राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया. हवाला कानून व्यवस्‍था बिगड़ने का दिया गया. देश में इस तरह की राजनीतिक घटना पहली बार हुई थी. (इसे भी पढ़ें: अयोध्या: हिंदुत्व का चेहरा बने डीएम, पहुंचे लोकसभा, ड्राइवर भी बना विधायक)

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफ़ेसर सुबोध कुमार के मुताबिक़, “नरसिम्हा राव सरकार ने क़ानून व्यवस्‍था के मुद्दे पर यूपी की कल्याण सिंह सरकार, हिमाचल प्रदेश की शांता कुमार, राजस्‍थान की भैरों सिंह शेखावत और एमपी की सुंदर लाल पटवा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया था.” लेकिन, क्या बीजेपी बर्खास्तगी का राजनीतिक लाभ ले सकी?

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कुमार के मुताबिक बीजेपी ने अपनी चार राज्यों की सरकार को बर्खास्त करने और राम मंदिर के बहाने हिंदुत्व के मुद्दे को हवा दी. इसके बावजूद हिमाचल, यूपी, एमपी जहां बीजेपी की सरकारें बर्खास्त की गई थीं वहां उसे अगले चुनावों में झटका लगा. मध्य प्रदेश, हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बनी. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने सरकार बनाई. हालांकि बीजेपी राजस्थान में वापसी करने में कामयाब रही. (ये भी पढ़ें: इतिहास के आइने में मंदिर-मस्जिद विवाद: क्या बाबर अयोध्या गया था?)

प्रो. कुमार के मुताबिक, “1995 के बाद हुए आम चुनावों में बीजेपी ने हिंदुत्व के सहारे पकड़ बनानी शुरू कर दी थी. मंदिर मसले पर ही पहली बार बीजेपी केंद्र में सत्ता तक पहुंची. 1996 में हुए आम चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार उसने केंद्र में सरकार बनाई. ये अलग बात है कि बहुमत साबित न कर पाने के कारण सरकार मात्र 13 दिन ही चली. दो साल बाद 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी ने वापसी की और वाजपेयी दोबारा पीएम बने.”

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