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Opinion: बड़े काम की है पुलिस को पेशेवर बनाने की गृहमंत्री अमित शाह की बात

News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 3:10 PM IST
Opinion: बड़े काम की है पुलिस को पेशेवर बनाने की गृहमंत्री अमित शाह की बात
अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए पुलिस के संबंध में गृ‍हमंत्री अमित शाह ने कही बड़ी बात.

पुलिस को पेशेवर बनाने, काम काज में जरूरी सुधार के लिए अपराधशास्त्र (Criminology) और फॉरेंसिक साइंस (Forensic science) में और अधिक रिसर्च के जरिए ही सही अपराधी को पकड़ने और उसे सजा दिलाने की पूरी व्यवस्था हो सकती है.

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  • Last Updated: August 29, 2019, 3:10 PM IST
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सुधीर जैन

देश के गृहमंत्री ने अपराध नियंत्रण के मामले में एक बहुत ही पेशेवर नुक्ते की तरफ ध्यान दिलाया है. उन्होंने कहा कि अपराधियों को अदालत में गुनहगार साबित करने के लिए फॉरेंसिक विज्ञानियों की भूमिका बढ़नी चाहिए. गृहमंत्री के सुझाव का लुब्बोलुआब यह है कि फॉरेंसिक सबूतों के अभाव में अपराधी सज़ा पाने से बच निकलते हैं. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट के एक आयोजन में पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए गृहमंत्री ने बुधवार को यह बात कही है. उनकी यह बात इस मायने में बड़ी खास है क्योंकि पुलिस के कामकाज में पेशेवर हुनर को बढ़ाने की जरूरत तो हमेशा ही बताई जाती है लेकिन कैसे बढ़ाई जाए? इस पर ज्यादा कुछ हो नहीं पाता. हो सकता है कि इस बार कुछ होने के आसार बढ़ जाएं.

बात में खास क्या है?
खास बात यह है कि इतनी प्रोफेशनल बात देश के गृहमंत्री ने कही है. वरना अपराधिक न्याय प्रणाली के दिग्गज अधिकारी और प्राधिकारी ऐसी बातें कॉन्फ्रेंस-सेमिनारों में कहते रहते हैं और उम्मीद करते रहते हैं कि पुलिस को ज्यादा पेशेवर यानी प्रोफेशनल बनाने के लिए सरकार कुछ करेगी. अब चूंकि खुद सरकार ने यह सुझाव दिया है तो पूरी उम्मीद की जानी चाहिए कि कुछ न कुछ जरूर होगा.

क्या है ये मसला
मसला ये है कि अपराधी सबूतों के अभाव में छूट जाते हैं. गृहमंत्री ने अपने भाषण में इसका जिक्र दोष सिद्धि की दर कम होने की समस्या के तौर पर किया है और इसका कारण यह बताया है कि अपराधियों के खिलाफ आरोप दायर करते समय उसके साथ फॉरेंसिक सबूतों की कमी रहती है. इसी आधार पर सुझाव बना है कि पुलिस को फॉरेंसिक सबूतों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. अब सवाल है कि यह काम बढ़ाया कैसे जाए?

अमित शाह ने पुलिस को प्रोफेशनल बनाने की बात कही है. अमित शाह ने पुलिस को प्रोफेशनल बनाने की बात कही है.
अमित शाह ने पुलिस को प्रोफेशनल बनाने की बात कही है.

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है क्या फॉरेंसिक विज्ञान
जब इतने ऊंचे स्तर से बात उठी है तो मानकर चलना चाहिए कि बात दूर तक जा सकती है. इसलिए लगे हाथ फॉरेंसिक साइंस के मायने भी जान लेना चाहिए. आमतौर पर फारेंसिक साइंस से हमारा मतलब हर उस विज्ञान से होता है जो अदालती कमरे में इस्तेमाल किया जाता है. गोली बंदूक का मामला हो तो उसकी जांच पड़ताल के लिए भौतिक विज्ञान की विशेषज्ञता की जरूरत पड़ती है. तब उस भौतिक विज्ञानी को बैलिस्टिक एक्सपर्ट कहने लगते हैं. जब वह भौतिक विज्ञानी एक विशेषज्ञ के तौर पर अदालत के कमरे में बुलाया जाता है तो वह फॉरेंसिक विशेषज्ञ कहलाता है. इसी तरह खून की जांच या पोस्टमार्टम वगैरह का काम चिकित्सा विज्ञानियों का काम है सो उन्हें फॉरेंसिक मेडिसिन विशेषज्ञ कहते हैं.

इसी तरह रसायनशास्त्र, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, एंथ्रोपोलोजी या किसी भी सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञ की जरूरत न्यायालय में पड़ती है तो वे सभी फॉरेंसिक एक्सपर्ट के नाम से ही पुकारे जाने लगते हैं. वैसे देश में पचास साल पहले फॉरेंसिक साइंस की अलग से पढ़ाई का इंतजाम शुरू किया गया था. इक्का दुक्का विश्वविद्यालय में क्रिमिनॉलजी एंड फॉरेंसिक साइंस के पाठयक्रम शुरू भी हुए. लेकिन एक साधारण स्नातक को दो साल में फारेंसिक साइंस का कुशल परास्नातक बनाने का काम कितना आसान या मुश्किल हो सकता है इसे भी आसानी से समझा जा सकता है. इसीलिए फॉरेंसिक साइंस के परास्नातक होने के बाद शोधकार्य की दरकार बनी रही.

ये सब जानते हैं कि देश में शोधकार्यों की क्या स्थिति रही. न सिर्फ अपराधशास्त्र और फॉरेंसिक साइंस के क्षेत्र में बल्कि दूसरे शुद्ध विज्ञानों के क्षेत्रों में हमेशा से ही गुणवत्तापूर्ण शोधकार्य का अभाव बना रहा. अब अगर गृहमंत्री ने अपराध के मामलों में फॉरेंसिक साइंस का इस्तेमाल बढ़ाने की बात कह दी है तो माना जाना चाहिए कि देश में क्रिमिनॉलजी एंड फॉरेंसिक साइंस के क्षेत्र में शोध कार्यक्रम बढ़ाने का माहौल बनेगा.

खुद गृहमंत्री ने कहा है कि आपराधिक मामलों में थर्ड डिग्री मैथड यानी संदिग्ध आरोपी को यातना देने जैसे तरीकों से काम नहीं चलेगा.
खुद गृहमंत्री ने कहा है कि आपराधिक मामलों में थर्ड डिग्री मैथड यानी संदिग्ध आरोपी को यातना देने जैसे तरीकों से काम नहीं चलेगा.


अपराधशास्त्र का भी जिक्र    
गृहमंत्री के भाषण में अपराध विज्ञान का जिक्र भी आया. अपराधशास्त्र या क्रिमिनाॅलजी दरअसल फॉरेंसिक साइंस से कुछ अलग किस्म का विषय है. यह अपराध की रोकथाम के लिए अपराध के कारणों को जानने, अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस विज्ञान के नुक्तों को जानने और अपराधियों को सुधारने के उपायों को बताने वाला विज्ञान है. अपने देश में पुलिस के कामकाज में अपराधशास्त्र के इस्तेमाल के भी ज्यादा मौके नहीं बन पाए हैं. लेकिन जब गृहमंत्री ने अपराध विज्ञान का भी जिक्र कर दिया है तो इसके साफ मायने हैं कि सरकार आपराधिक न्याय प्रणाली को ज्यादा पेशेवर बनाने की सोच रही है. आपराधिक न्याय प्रणाली पुलिस, न्यायालय और जेल से मिलकर बनती है. और इसमें पुलिस की सबसे बड़ी भूमिका होती है.

सवाल पुलिस को प्रोफेशनल यानी पेशेवर बनाने का
खुद गृहमंत्री ने कहा है कि आपराधिक मामलों में थर्ड डिग्री मैथड यानी संदिग्ध आरोपी को यातना देने जैसे तरीकों से काम नहीं चलेगा. इसका मतलब है कि वे पुलिस को पेशेवर बनने की सलाह दे रहे हैं. आमतौर पर पेशेवर होने का मतलब यह लगाया जाता है कि किसी को प्रशिक्षण के जरिए हुनरमंद बनाया गया हो. इस लिहाज से भारतीय पुलिस प्रशिक्षण व्यवस्था की समीक्षा जरूर कर लेनी चाहिए. बाकी का तो ज्यादा कहना, भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती के बाद पुलिस अधिकारी के लिए हम पुलिस विज्ञान या अपराधशास्त्र या न्यायालिक विज्ञान के प्रशिक्षण का कितना इंतजाम कर पाए हैं? इस पर भी गौर किया जाना चाहिए.

वैसे लगता है कि गृहमंत्री के भाषण के बाद इस पर ध्यान जाना जरूर शुरू होगा. जिस आयोजन स्थल पर गृहमंत्री ने इतनी महत्वपूर्ण बात कही है वह ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट जैसी दिग्गज संस्था है. बीपीआरडी का काम ही पुलिस तंत्र से संबधित शोध और नीतियां सुझाना है. सो वीपीआरडी को इस अवसर का फायदा उठाने से चूकना नहीं चाहिए. बीपीआरडी चाहेगी तो पुलिस प्रशिक्षण की चुनौतियों पर विचार विमर्श फौरन से पेश्तर शुरू करवा सकती है. ऐसे विमर्शों के निष्कर्ष बड़े काम के होंगे.

जरा बड़ा है काम
बड़ा इसलिए है क्योंकि बात पुलिस के आधुनिकीकरण तक पहुंचेगी. पुलिस में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ाने का लक्ष्य बनाना पड़ेगा. प्रौद्योगिकी महंगी चीज़ है. सिर्फ साजो सामान ही मंहगा नहीं होता बल्कि उसे बरतने का प्रशिक्षण देने वाले भी महंगे होते हैं. पुलिस में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए प्रबंधन प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों की जरूरत पड़ेगी. खासतौर पर वे विशेषज्ञ जो चेंज मैनेजमेंट के प्रशिक्षित विशेषज्ञ हों. इन विशेषज्ञों को पुलिस के कामकाज को अलग से समझना पड़ेगा. इस तरह के शोधकार्य पर अलग से खर्चा होगा. खर्चा ही नहीं समय और मेहनत भी लगेगी. ये सब करने के लिए क्या हम न्यूनतम संसाधन जुटाने को भी तैयार हैं.

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First published: August 29, 2019, 3:05 PM IST
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