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सिर्फ पंजाब-हरियाणा में ही ‘जल’ और ‘वायु’ दोनों के लिए क्यों संकट बन रही धान की खेती?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 6, 2019, 3:01 PM IST
सिर्फ पंजाब-हरियाणा में ही ‘जल’ और ‘वायु’ दोनों के लिए क्यों संकट बन रही धान की खेती?
दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में धान की फसल (Photo: Om Prakash)

पराली, प्रदूषण और पॉलिटिक्स: हरियाणा और पंजाब मेंं ही पराली (Parali) क्यों संकट बन रही है. आखिर मध्य प्रदेश, बिहार और पूर्वी यूपी में क्यों इसे जलाया नहीं जाता? धान की फसल (Paddy Crop) गर्मी में जल संकट और ठंड शुरू होते ही प्रदूषण (Pollution) पैदा कर रही है तो इसे कैसे रोका जा सकता है.

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  • Last Updated: November 6, 2019, 3:01 PM IST
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नई दिल्ली. कभी हरियाणा की पहचान बनाने वाला धान (Paddy Crop) अब इस प्रदेश के लिए संकट बनता जा रहा है. यह गर्मी में जल संकट बढ़ा रहा है तो सर्दी आते ही वायु प्रदूषण (Pollution). पराली जलाने की यह समस्या हरियाणा, पंजाब (Punjab) और पश्चिमी यूपी (UP) में ही क्यों है? बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बंगाल और पूर्वी यूपी में आज भी पराली (पुआल) लोगों के जीवन का हिस्सा है. ठंड के मौसम में इसका बिस्तर के रूप में इस्तेमाल करने से लेकर पशुओं के लिए चारा बनाने तक का काम होता है. कुछ लोग इसकी रस्सी बनाकर जीवनयापन करते हैं. तो यही पराली हरियाणा और पंजाब के लिए समस्या क्यों बन गई? कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक हरियाणा और पंजाब के किसानों के पास यूपी के मुकाबले खेती अधिक है. यहां धान की कटाई मजदूरों से करवाने की बजाय मशीनों से करवाई जाती है. इसलिए धान के पौधे का एक हिस्सा खेत में खड़ा रह जाता है, जिसे किसान जला देते हैं. जबकि यूपी में अब भी ज्यादातर स्थानों पर धान की कटाई मजदूरों से करवाई जाती है. उसे जड़ से काटा जाता है.

देखते ही देखते पराली पॉलिटिक्स का हथियार बन गई है. हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी पराली समस्या बन ही गई है तो फिर इसका समाधान क्या है. इससे जुड़ी पानी और हवा की समस्या कैसे खत्म होगी? ऐसे कई सवाल लोगों के मन में हैं. हरियाणा सरकार (Haryana Government) ने इसका एक समाधान तलाशने की कोशिश की है. लेकिन पंजाब और यूपी ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया. हरियाणा एकमात्र राज्य है जहां दोनों संकटों से उबरने के लिए धान की खेती को हतोत्साहित करने वाली योजना शुरू की गई है.

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मशीन की मदद से धान की कटाई से बढ़ी है पराली की समस्या


जो किसान (Farmers) इसकी खेती छोड़ रहा है उसको बदले में सरकार पैसा और दूसरी फसल के लिए कई सहूलियतें दे रही है. न्यूज18 हिंदी से बातचीत में यहां के कृषि महानिदेशक अजीत बाला जोशी ने दावा किया कि इस स्कीम से 10 हजार हेक्टेयर में धान के बदले दूसरी फसलें उगाई गईं हैं.

तो क्या पराली जलना भी कम हो गया?

केंद्रीय कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) के अधिकारियों के मुताबिक हरियाणा में इस साल 1 अक्टूबर से 3 नवंबर तक पराली (Parali) जलाने के 4414 केस सामने आए हैं. जबकि पंजाब में 25366 मामले सामने आए हैं. हरियाणा के कृषि विभाग का दावा है कि इस साल पराली जलाने की घटनाओं में 6.5 फीसदी की कमी आई है. यह घटनाएं जागरूकता से कम हुई हैं या फिर धान की फसल कम होने से, इस मसले पर विभाग अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है.

सरकार आर्थिक सहयोग दे तो नहीं जलेगी पराली
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कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का कहना है कि किसान जान बूझकर पराली नहीं जला रहा. वो सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें इसके निस्तारण के लिए 200 रुपये प्रति क्विंटल दिया जाए. हम बिना जलाए इसका मैनेजमेंट कर लेंगे. तो फिर किसान की सपोर्ट करने के लिए सरकारें क्यों नहीं आगे आ रही हैं. पंजाब, हरियाणा और यूपी में कुल मिलाकर इसके लिए 3000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा और समाधान हो जाएगा. सरकारें मशीनों के लिए सब्सिडी देने का तैयार हैं लेकिन किसानों को पराली निस्तारण के लिए पैसा नहीं देना चाहतीं.

दूसरे राज्यों में भी शुरू हो ऐसी स्कीम

कृषि विशेषज्ञ और राजीव गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी अरुणाचल प्रदेश के वाइस चांसलर प्रो. साकेत कुशवाहा कहते हैं "एक किलो चावल पैदा होने में करीब 3000 लीटर पानी खर्च होता है. इसलिए धान के बदले मक्का, दलहन व तिलहन पर जोर देने की जरूरत है. हरियाणा की तरह पंजाब को भी स्कीम बनाना चाहिए." चूंकि बासमती चावल (Basmati Rice) हरियाणा की स्ट्रेंथ और पहचान है इसलिए सरकार गैर बासमती धान को डिस्करेज करना चाहती है.

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हरियाणा में खेत में किसानों के पराली जलाने पर रोक लागू है (प्रतीकात्मक तस्वीर)


दरअसल, हरियाणा सरकार ऐसा करने के लिए इसलिए मजबूर हुई है क्योंकि अत्याधिक जल दोहन की वजह से यहां के नौ जिले डार्क जोन में शामिल हो गए हैं. इसलिए पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पहले चरण में यह योजना प्रदेश के सात जिलों के सात ब्लाकों में लागू की गई है. पिछले दिनों केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस योजना की संसद में तारीफ की थी.

इन जिलों में शुरू की गई है योजना

इनमें यमुनानगर का रादौर, सोनीपत का गन्नौर, करनाल का असंध, कुरुक्षेत्र का थानेसर, अंबाला का अंबाला-1, कैथल का पूंडरी और जींद का नरवाना ब्लॉक शामिल है. इन सात ब्लॉकों में 1,95,357 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की फसल होती है, जिसमें से 87,900 हेक्टेयर में गैर बासमती धान होता है. कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि 1970 के दशक में मक्का और दलहन हरियाणा की प्रमुख फसलें होती थीं, जिनकी जगह अब धान ने ले लिया है.

ये है योजना, कितनी मिलती है सहायता

>>इन सात ब्लॉकों में धान के बदले मक्का, दलहन, तिलहन के इच्छुक किसानों का कृषि विभाग के पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन किया जाएगा. इच्छुक किसानों को मुफ्त में बीज उपलब्ध करवाया जाएगा. जिसकी कीमत 1200 से 2000 रुपये प्रति एकड़ होगी.

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प्रदूषण और प्रदर्शन: क्या दिल्ली में प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली ही जिम्मेदार है (File Photo)


>>प्रति एकड़ 2000 रुपये की आर्थिक मदद की जाएगी. यह पैसा दो चरणों में मिलेगा. इसमें 200 रुपए तो पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन के समय और शेष 1800 रुपए बिजाई किए गए क्षेत्र के वेरीफिकेशन के बाद किसान के बैंक खाते डाले जाएंगे.

>>हालांकि कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि धान की फसल को डिस्करेज करने की योजना तब तक सफल नहीं होगी जब तक कि फसल छोड़ने पर 5000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन नहीं मिलेगा.

>>धान की जगह मक्का और अरहर उगाने पर फसल बीमा करवाएंगे. 766 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से प्रीमियम भी हरियाणा सरकार देगी. मक्का और अरहर तैयार होने पर हैफेड व खाद्य एवं आपूर्ति विभाग उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर से खरीदेंगे.

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First published: November 6, 2019, 2:58 PM IST
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