केजरीवाल की लोकलुभावन घोषणाएं क्या फिर से दिल्ली में AAP की खोई साख वापस ला पाएंगी?

केजरीवाल (Arvind Kejriwal) अपनी कमजोर पड़ रही राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए लोकलुभावन फैसले ले रहे हैं. इतना ही नहीं महिलाओं के लिए फ्री मेट्रो सेवा (Free ride in metro) का ऐलान कर केजरीवाल अपने अधिकार क्षेत्र से भी बाहर चले गए.

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: August 30, 2019, 3:09 PM IST
केजरीवाल की लोकलुभावन घोषणाएं क्या फिर से दिल्ली में AAP की खोई साख वापस ला पाएंगी?
आम आदमी पार्टी को खोई साख दिला पाएंगी केजरीवाल की घोषणाएं?
Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: August 30, 2019, 3:09 PM IST
दिल्ली में चुनाव की तारीख घोषित होने में अभी वक्त है लेकिन आचार संहिता के दायरे में आने से पहले एक के बाद एक कई सब्सिडी (Subsidy) आधारित सुविधाओं की घोषणाएं कर अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) अपना राजनीतिक हित साधने में जुट गए हैं. आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सब्सिडी आधारित सुविधाएं मुहैया कराना वेलफेयर स्टेट (कल्याणकारी राज्य ) का कर्तव्य होता है, लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Election) से ठीक पहले एक के बाद एक कई सब्सिडी आधारित घोषणाएं केजरीवाल को क्या सत्ता की दहलीज पर लाकर खड़ा करेंगी यह तो भविष्य बताएगा. लेकिन इसको लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गया है.

सब्सिडी आधारित घोषणाओं का क्या है मतलब ?
पानी की बकाया राशि को माफ करने से लेकर 200 यूनिट तक की बिजली बिल्कुल मुफ्त करने की घोषणा और महिलाओं के लिए फ्री डीटीसी बस सेवा, जो भैया दूज की तारीख 29 अक्टूबर से लागू होंगी, साफ बयां करता है कि केजरीवाल अपनी कमजोर पड़ रही राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए लोकलुभावन फैसले ले रहे हैं. गौरतलब है कि 200 से 400 यूनिट बिजली के बिल की रकम पहले की तरह आधी ही वसूली जाएगी. जबकि एक तय मात्रा में पानी का वितरण भी मुफ्त होता रहेगा.

इतना ही नहीं महिलाओं के लिए फ्री मेट्रो सेवा का ऐलान कर केजरीवाल अपने अधिकार क्षेत्र से भी बाहर चले गए. जबकि मेट्रो में फ्री सेवा मुहैया केंद्र की मदद के बगैर संभव नहीं. ज़ाहिर है ऐसा कर केजरीवाल खुद को दिल्ली की जनता का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं. इन फैसलों से अरविंद केजरीवाल 80 फीसदी दिल्लीवासियों को सीधे प्रभावित करना चाह रहे हैं जो उन्हें दिल्ली की कुर्सी पर फिर से बैठा सकते हैं.

हालांकि केजरीवाल सरकार की तरफ से मुहल्ला क्लिनिक जैसी सुविधाएं पहले से ही चल रही हैं. महिलाओं के लिए फ्री बस सेवा, 200 यूनिट तक फ्री बिजली और पानी का बकाया बिल माफ कर केजरीवाल एक अलग वोट बैंक तैयार करने की फिराक में हैं जो वापस उन्हें दिल्ली में विजय पथ पर आगे बढा सके.

दूसरी ओर इस बार दिल्ली में केजरीवाल से सत्ता छीनने को बेताब बीजेपी केजरीवाल को घेरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती. दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता हरीश खुराना न्यूज 18 से बात करते हुए कहते हैं, 'ऐसा करके केजरीवाल 5000 करोड़ पब्लिक एक्सचेकर का बर्बाद करेंगे जबकि 1800 करोड़ पहले से बर्बाद कर रहे हैं और इसका खामियाजा दिल्ली की भोली- भाली जनता भुगतेगी.'

हरीश खुराना आगे कहते हैं कि सरकार चुनाव से पहले इस तरह का वादा तभी करती है जब वो पिछले चुनाव में किए हुए वादे को पूरा कर पाने में नाकामयाब रहती है.
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उधर, कांग्रेस भी इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री केजरीवाल को घेरने में लगी हुई है. दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता जेपी अग्रवाल न्यूज 18 से बात करते हुए कहते हैं कि, 'केजरीवाल पांच साल तक कुछ कर नहीं पाए इसलिए वो अपनी असफलता छुपाने के लिए अंधेरे में तीर चला रहे हैं. अगर उन्हें इतना कुछ फ्री देना था तो साढ़े चार साल तक केजरीवाल ने दिया क्यों नहीं.'

ज़ाहिर है बीजेपी और कांग्रेस कई ऐसी रिपोर्ट का हवाला दे रही है जिसमें ये कहा गया था कि साल दर साल डीटीसी बसों में इज़ाफा नहीं हुआ तो 2025 तक एक भी बस सड़कों पर चल पाने में कारगर नहीं होगी.

इतना ही नहीं अस्पताल में 30 हजार बेड बढ़ाने से लेकर फ्री वाईफाई सेवा देने तक की बात कह विरोधी पार्टियां उन्हें घेर रही हैं. लेकिन अरविंद केजरीवाल को इस बात का अंदाजा पहले से है कि विरोधी उन्हें घेरने की पूरी कोशिश करेंगे. लिहाजा केजरीवाल ने इन घोषणाओं के बाद ट्वीट कर साफ कर दिया था कि पहले बिजली और पानी जनता को नहीं मिलता था पर बिल जरूर आता था लेकिन अब बिजली और पानी मिल रहा है पर बिल नहीं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात सीटों में से पांच सीट पर जमानत जब्त होने के बाद अरविंद केजरीवाल के लिए आम आदमी पार्टी को वापस चुनाव जिताना किसी गंभीर चुनौती से कम नहीं है. ज़ाहिर है इसके लिए ताबड़तोड़ सब्सिडी आधारित घोषणाएं उन्हें जनता के बीच स्थापित करने में मददगार साबित हो सकती हैं. ऐसा पार्टी को भरोसा हो रहा है.

आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में आम आदमी पार्टी को 54 फीसदी मत प्राप्त हुए थे और आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में आम आदमी को वोट देने वालों की संख्या 65 फीसदी बताई गई.
वैसे मिडिल क्लास और अपर क्लास में कमजोर जनाधार को देखते हुए आप की सरकार ने लगभग 1400 छोटी-बड़ी कॉलोनी को रेगुलराइज करने की पहल की है. जिससे लगभग 60 लाख मतदाताओं पर प्रभाव पड़ सके. ऐसे में इन तमाम लोकलुभावन फैसलों के पीछे आम आदमी पार्टी का मकसद कांग्रेस को हाशिए पर धकेलने का भी है जो लोकसभा चुनाव में आप से बेहतर परफॉर्म कर चुकी है.
 
लोकलुभावन फैसलों का इतिहास रहा है पुराना
हाल के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले किसानों को सालाना 6 हजार रुपये देने की घोषणा केन्द्र सरकार द्वारा किया जाना और मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले स्मार्ट फोन दिए जाने की घोषणा करना लोकलुभावन फैसलों में ही शुमार है. इन घोषणाओं का फायदा भी कई बार मिला है.
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ और तमिलनाडू में जयललिता द्वारा कई स्कीम अम्मा के नाम से चलाई गईं जो उन्हें सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में मददगार साबित हुईं. इतना ही नहीं एन टी रामाराव की 2 रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा उन्हें सत्ता में लाने में मददगार रही. यह अलग बात है कि वो 2 रुपये प्रति किलो चावल देने में कामयाब नहीं हो पाए थे.

मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए अपनाए गए ऐसे हथकंडे पुराने हैं जिनको लेकर आवाज उठती रही है. लेकिन अदालत या चुनाव आयोग इसको लेकर कोई ठोस फैसला देने से बचता रहा है. ऐसे में जनता की अदालत ही अपने विवेक से फैसला कर सकती है कि कल्याणकारी राज्य की आड़ में सब्सिडी आधारित घोषणाएं अवाम की बेहतरी के लिए हैं या सियासी पार्टियों को सत्ता तक पहुंचाने के लिए.

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First published: August 30, 2019, 3:03 PM IST
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