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ये मतदाता तय करेंगे लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम!

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किसानों की आय दोगुनी करने के लिए मोदी मंत्र

किसानों की आय दोगुनी करने के लिए मोदी मंत्र

हर राजनीतिक दल की नजर किसानों की तरफ लगी हुई है. पार्टियों के लिए किसान जरूरी हैं या मजबूरी?

    सरकार के खिलाफ  'गांव बंद'  अभियान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को पहली बार नमो ऐप के जरिए देशभर के किसानों से रूबरू हुए. 2014 में सरकार बनने के बाद पीएम मोदी ने किसानों के मसलों को सबसे ऊपर रखा था. लेकिन अब खेती-किसानी से जुड़े सवालों पर ही विपक्ष सरकार को घेर रहा है. कांग्रेस ने एक 'विश्वासघात' बुकलेट जारी की है उसमें किसानों से जुड़ी परेशानियों को सबसे पहले जगह दी गई है. जाहिर है कांग्रेस और बीजेपी किसानों को अपने एजेंडे में ऊपर रख रहे हैं तो इसकी सियासी वजह भी है.

    देश में 9.2 करोड़ किसान परिवार हैं. इसका मतलब करीब 45 करोड़ लोग. वे लोग जो गांवों में रहते हैं और सबसे ज्यादा वोट करते हैं. इसीलिए मोदी सरकार ने फरवरी 2016 में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा. इसके लिए बाकायदा 13 अप्रैल 2016 को 'डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी' का गठन किया गया, जिसने बताया कि आखिर 2022 तक किसानों की आय दोगुना कैसे होगी. हालांकि, कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक दलवाई को पता नहीं है कि मोदी सरकार में किसानों की आय कितनी बढ़ी है?

    Prime Minister, Narendra Modi          प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नमो एप के जरिए किसानों से रुबरु हुए

    प्रधानमंत्री ने ऐप के जरिए किसानों से कहा "मुख्य रूप से चार मूल बिन्दुओं पर बल दिया जा रहा है. पहला, कच्चे माल की लागत कम से कम हो, दूसरा, उपज का उचित मूल्य मिले,  तीसरा,  उपज की बर्बादी रुके, और चौथा- आमदनी के वैकल्पिक स्रोत तैयार हों. हमारा प्रयास है कि किसानों को खेती की पूरी प्रक्रिया में हर कदम पर मदद मिले, यानि बुआई से पहले, बुआई के बाद और फसल कटाई के बाद. 2022 तक हमारे मेहनतकश किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाए, इसके लिए जहां भी जरूरत है उचित मदद दे रहे हैं."

    भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं "देश में इस समय 50 करोड़ से अधिक किसान हैं. संख्या बल की वजह से ही सरकारें इन पर अपना फोकस दिखाने की कोशिश करती हैं, ताकि उनकी यह कोशिश वोटों में बदल सके. हकीकत ये है कि किसानों को लेकर बनाई गईं सरकार की ज्यादातर योजनाएं जमीन पर नहीं उतरतीं."

    हालांकि, 'डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी' के चेयरमैन डॉ. अशोक दलवाई कहते हैं "पहले सिर्फ कृषि के बारे में सोचा जाता था लेकिन पहली बार किसानों के बारे में भी सोचा गया है, ताकि वह खुशहाल हों. कितनी उपज हुई इसके साथ-साथ यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसान को लाभ कितना मिला."

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    संसद में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक किसानों पर औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है. यह कृषि मंत्रालय का आंकड़ा है. एक सरकारी अनुमान के मुताबिक करीब 52 प्रतिशत कृषि परिवार ऋणग्रस्त हैं. इसलिए यह बड़ा सियासी मुद्दा भी है. केंद्र सरकार ने कर्जमाफी की कोई योजना लाने से साफ इनकार किया हुआ है. लेकिन कई राज्यों ने अपने बूते पर राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कर्जमाफी की है.

    उत्तर प्रदेश में एक साल पहले बंपर समर्थन के साथ सत्ता में आई बीजेपी को कृषि ऋण माफी का दांव खेलना पड़ा था. यूपी ने 36 हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया. हालांकि,  इस माफी पर किरकिरी अब तक हो रही है. किसी का एक पैसा तो किसी का नौ-दस पैसे का कर्ज माफ किया गया.

    महाराष्ट्र सरकार ने अपने किसानों का 30 हजार करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने की घोषणा की. कर्नाटक की नई सरकार ने भी किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा की हुई है. राजस्थान सरकार ने किसान कर्जमाफी की शुरुआत की है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने खरीफ और रबी में किसानों को चार-चार हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की है. यानी एक साल में प्रति एकड़ 8000 रुपये. किसानों पर मोदी सरकार के जोर और राज्यों की कर्जमाफी बताती है 2019 में किसान सियासत के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं.

    भ्रष्टाचार से कैसे पार पाएगी सरकार

    शिवराज सरकार ने मध्य प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना शुरू की है. इसका मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार भाव में अंतर की खाई  को पाटना है. लेकिन अब इस योजना में भ्रष्टाचार का दीमक लगना शुरू हो गया है. योजना के तहत घोटाले में पहली एफआईआर हुई है.

    शाजापुर जिले की शुजालपुर मंडी में इस योजना से जुड़ी गड़बड़ी का पता चलने के बाद दस मंडी कर्मचारियों और तीस व्यापरियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है. मिली भगत से दो लाख कट्टी लहसुन की फर्जी खरीद दिखाकर सरकार को लगभग 8 करोड़ रुपये की चपत लगाने की कोशिश की थी.

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    पिछले दिनों मेरे घर एक स्वायल कार्ड आया है, जबकि गांव में कहीं भी जमीन की जांच तक नहीं की गई. किसान नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि मिट्टी की का सैंपल लिए बिना ही कागजी रिपोर्ट दी जा रही है. कमोबेश किसानों के लिए की जाने वाली घोषणाओं की जमीनी हकीकत ऐसी ही है. जमीनी हकीकत ये है कि किसानों के नाम पर बात चाहे जितनी हो, वादे चाहे जितने हों लेकिन वो धरातल पर कम ही उतरते हैं. इसलिए सरकार कोई भी हो उसके लिए किसानों से जुड़े मसले गले की फांस बन जाते हैं. सरकार के दावों के बीच किसान आंदोलन हो रहे हैं.

    Tags: Farmer Agitation, NaMo App, Narendra modi

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