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Bhishma Ashtami 2020: आज इस शुभ मुहूर्त पर मनाएं भीष्म अष्टमी का पर्व, जानें कथा

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Updated: February 2, 2020, 6:01 AM IST
Bhishma Ashtami 2020: आज इस शुभ मुहूर्त पर मनाएं भीष्म अष्टमी का पर्व, जानें कथा
भीष्म अष्टमी पितामह भीष्म की याद में ही मनाई जाती है.

भीष्म अष्टमी २०२० (Bhishma Ashtami 2020): भीष्म अष्टमी के दिन ही भीष्म पितामह को सद्गति (स्वर्ग) की प्राप्ति हुई थी. शर शैया (तीरों के बिस्तर) पर लेटे भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्याग किया था.

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  • Last Updated: February 2, 2020, 6:01 AM IST
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भीष्म अष्टमी २०२० (Bhishma Ashtami 2020): आज 2 फरवरी को भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami 2020) मनाई जा रही है. महाभारत काल के भीष्म को भीष्म पितामह भी कहा जाता है. भीष्म अष्टमी पितामह भीष्म की याद में ही मनाई जाती है. कई लोग भीष्म अष्टमी के दिन उपवास भी रखते हैं. मान्यता है कि भीष्म अष्टमी के दिन ही भीष्म पितामह को सद्गति (स्वर्ग) की प्राप्ति हुई थी. शर शैया (तीरों के बिस्तर) पर लेटे भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्याग किया था. कई जगहों पर भीष्म अष्टमी काफी धूमधाम से मनाई जाती है...

भीष्म अष्टमी का शुभ मुहूर्त:
भीष्म अष्टमी की शुरुआत 01 फरवरी 2020 की शाम 6 बजे से लग चुकी है. लेकिन हिंदू धर्म में सूर्यास्त के बाद का मुहूर्त शुभ नहीं माना जाता है. ऐसे में आज 2 फ़रवरी को सुबह से लेकर रात 8 बजे तक भीष्म अष्टमी रहेगी.

 भीष्म पितामह ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया


भीष्म पितामह ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया


भीष्म अष्टमी कथा:
भीष्म अष्टमी की पौराणिक कथा के मुताबिक़, राजा शांतनु और देवी गंगा के आठवें पुत्र थे देवव्रत. देवव्रत ही आगे जाकर भीष्म पितामह के नाम से प्रसिद्ध हुए. देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया. मां गंगा ने ही देवव्रत को पालपोष कर बड़ा किया और महर्षि परशुराम ने उन्हें अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान दिया. शुक्राचार्य ने भी उन्हें युद्ध के कौशल सिखाये. इसके बाद भीष्म यानी कि देवव्रत युद्ध में अपराजित हो गए.शिक्षा दीक्षा जब पूरी हो गई तब मां गंगा देवव्रत को लेकर उनके पिता राजा शांतनु के पास पहुंचीं. इसके बाद देवव्रत को हस्तिनापुर का राजकुमार बना दिया गया. लेकिन इसी बीच राजा शांतनु को सत्यवती से प्रेम हो गया और वो उनसे शादी करना चाहते थे. सत्यवती के पिता ने इस शर्त पर अपनी पुत्री का विवाह शांतनु से करने के लिए राजी हुए कि आने वाले समय में उनका नाती यानी कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा.

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जब देवव्रत को ये प्रसंग पता चला तो पिता की ख़ुशी के लिए उन्होंने अपना पद और अधिकार दोनों छोड़कर आजीवन विवाह ना करने का संकल्प लिया. उनके इस महान त्याग की वजह से उनका नाम भीष्म पड़ा. आजीवन विवाह न करने की उनकी प्रतिज्ञा को 'भीष्म प्रतिज्ञा' कहा गया. राजा शांतनु देवव्रत 'भीष्म के इस त्याग से काफी प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया कि जब तुम चाहोगे तभी तुम्हारी मृत्यु होगी.

भीष्म पितामह ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया. लेकिन जब शिखंडी सामने आया तो उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए क्योंकि 'शिखंडी' न स्त्री थे न पुरुष. ठीक उसी समय अर्जुन ने ठीक शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पर तीरों की बौछार कर दी. इस अप्रत्याशित हमले से भीष्म घायल होकर बाणों की शय्या पर गिर पड़े.

लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भीष्म पितामह ने उत्तरायण के दिन त्यागी. ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण के दिन देह का त्याग करता है वह सीधा स्वर्ग जाता है. लेकिन इससे पहले भीषय पितामह घायल अवस्था में ही बाणों की शैय्या पर लेटे रहे थे. जिस दिन भीष्म पितामह ने देह त्याग किया उस दिन अष्टमी थी. तभी से भीष्म अष्टमी मनाए जाने का प्रचलन शुरू हुआ.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: February 2, 2020, 6:01 AM IST
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