Navratri 2021 7th Day: नवरात्रि में आज पढ़ें मां कालरात्रि का कवच और कथा, मिलेगा मां का आशीर्वाद

मां कालरात्रि निडरता और निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं.

मां कालरात्रि निडरता और निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं.

Chaitra Navratri 2021 7th Day Worship Maa Kalratri Kavach And Katha- मां कालरात्रि शक्ति का रौद्र रूप हैं. मां कालरात्रि का प्रिय पुष्प रातरानी है. मां कालरात्रि की पूजा तांत्रिक विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए निशा काल यानी कि रात्रि के समय करते हैं. मां कालरात्रि निडरता और निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं.

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  • Last Updated: April 19, 2021, 10:17 AM IST
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Chaitra Navratri 2021 7th Day Worship Maa Kalratri Kavach And Katha - आज नवरात्रि की सप्तमी पर भक्तों ने मां दुर्गा के सातवें स्वरुप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि श्याम वर्ण की हैं. इसलिए उनका नाम कालरात्रि है. मां का वाहन गर्दभ है. मां कालरात्रि शक्ति का रौद्र रूप हैं. मां कालरात्रि का प्रिय पुष्प रातरानी है. मां कालरात्रि की पूजा तांत्रिक विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए निशा काल यानी कि रात्रि के समय करते हैं. मां कालरात्रि निडरता और निर्भयता का आशीर्वाद देती हैं. आज सप्तमी पर शाम को मां कालरात्रि की पूजा अर्चना के बाद पढ़ें कथा और कवच...

मां कालरात्रि की कथा:

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बहुत बड़ा राक्षस रक्तबीज था. इस दानव ने लोगों के साथ देवताओं को भी परेशान कर रखा था. रक्तबीज दानव की विशेषता यह थी कि जब उसके खून की बूंद (रक्त) धरती पर गिरती थी तो बिलकुल उसके जैसा दानव बन जाता था. दानव की शिकायत लेकर सभी भगवान शिव के पास पहुंचे. भगवान शिव जानते थे कि इस दानव का अंत माता पार्वती कर सकती हैं.

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भगवान शिव ने माता से अनुरोध किया. इसके बाद मां पार्वती ने स्वंय शक्ति संधान किया. इस तेज ने मां कालरात्रि को उत्पन्न किया. इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का अंत किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया. इस तरह से देवी मां ने सबका गला काटते हुए दानव रक्तबीज का अंत किया. रक्तबीज का वध करने वाला माता पार्वती का यह रूप कालरात्रि कहलाया.

कालरात्रि कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।



ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।

कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।

तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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