चाणक्य नीति: दुष्ट के साथ दुष्टता नहीं है पाप, जानें आचार्य चाणक्‍य ने क्‍यों कही ये बात

Chanakya Niti: आचार्य चाणक्‍य के अनुसार जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही व्‍यवहार करें.

Chanakya Niti: आचार्य चाणक्‍य के अनुसार जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही व्‍यवहार करें.

Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) के अनुसार वह चीज जो दूर है, वह असंभव दिखाई देती है. मगर जो चीज हमारी पहुंच से बाहर है, वह भी आसानी से हासिल हो सकती है, अगर हम तप करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 2, 2021, 11:08 AM IST
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Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) की कुशाग्र बुद्धि और तार्किकता से सभी लोग प्रभावित थे. यही वजह है कि वह कौटिल्य (Kautilya) कहे जाने लगे. वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में विख्‍यात हुए. उन्‍होंने नीति शास्त्र की रचना की और इसके माध्‍यम से अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर कई महत्‍वपूर्ण बातें बताई हैं. उन्‍होंने मित्र-भेद से लेकर दुश्मन की पहचान, राजा का कर्तव्य और जनता के अधिकारों के बारे में बताया है. आचार्य चाणक्‍य कहते हैं कि जिसका ह्रदय शुद्ध है उसे तीर्थ यात्रा की क्या जरूरत है. अगर स्वभाव अच्छा है तो और किस गुण की जरूरत है. अगर कीर्ति है तो अलंकार की क्या जरूरत है. अगर ज्ञान है तो दौलत की क्या जरूरत है और अगर अपमान हुआ है तो मृत्यु से भयंकर नहीं है क्या. आप भी जानिए चाणक्‍य नीति की यह महत्‍वपूर्ण बातें-

हमें जो मिला उसे लौटाना चाहिए

चाणक्‍य नीति कहती है कि जो दूसरे आपके साथ करें वैसा ही व्‍यवहार आपको उनके साथ करना चाहिए. वह कहते हैं कि हमें दूसरों से जो मदद प्राप्त हुई है, उसे हमें लौटाना चाहिए. इसी प्रकार अगर किसी ने हमसे दुष्टता की है, तो हमें भी उससे दुष्टता करनी चाहिए. ऐसा करने में कोई पाप नहीं है.

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दूर से चीज असंभव दिखती है

आचार्य चाणक्‍य के अनुसार वह चीज जो दूर दिखाई देती है, जो असंभव दिखाई देती है, जो हमारी पहुंच से बाहर दिखाई देती है, वह भी आसानी से हासिल हो सकती है, अगर हम तप करते है. क्योंकि तप से ऊपर कुछ नहीं.

लोभ से बड़ा दुर्गुण कोई नहीं



चाणक्‍य नीति कहती है कि लोभ से बड़ा दुर्गुण क्या हो सकता है. पर निंदा से बड़ा पाप क्या है. जो सत्य में प्रस्थापित है उसे तप करने की क्या जरूरत है. जिसका ह्रदय शुद्ध है, उसे तीर्थ यात्रा की क्या जरूरत है. अगर स्वभाव अच्छा है तो और किस गुण की जरूरत है. अगर कीर्ति है, तो अलंकार की क्या जरूरत है, अगर व्यवहार ज्ञान है, तो दौलत की क्या जरूरत है और अगर अपमान हुआ है तो यह मृत्यु से भी भयंकर है.

दौलत नहीं तो रह जाता है अकेला

आचार्य चाणक्‍य के अनुसार जिस व्‍यक्ति के पास दौलत नहीं होती, वह अकेला रह जाता है. बीमारी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति ईश्‍वर के करीब हो जाता है, क्‍योंकि उसके पास कोई रास्‍ता नहीं बचता.

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हाथ की शोभा दान देने से है

चाणक्‍य नीति कहती है कि हाथ की शोभा गहनों से नहीं, दान देने से होती है. चन्दन का लेप लगाने से नहीं, जल से नहाने से निर्मलता आती है. एक व्यक्ति भोजन खिलाने से नहीं, सम्मान देने से संतुष्ट होता है. मुक्ति खुद को सजाने से नहीं होती, अध्यात्मिक ज्ञान को जगाने से होती है. साभार/हिंदी साहित्‍य दर्पण (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)
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