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Dev Deepawali 2020: देव दिवाली पर पूजा का शुभ मुहूर्त जानें, क्या दीपदान से है कोई कनेक्शन?

देव दिवाली पर पूजा का शुभ मुहूर्त जानें
देव दिवाली पर पूजा का शुभ मुहूर्त जानें

Dev Deepawali 2020: कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से पाप कर्मों का नाश होता है और मनुष्य के चित्त की शुद्धि होती है. देव दिवाली के दिन पूजा करने और दीपदान करने का विशेष महत्व है. आइए जानते हैं....

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 30, 2020, 1:19 PM IST
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Dev Deepawali 2020 : आज कार्तिक मास की पूर्णिमा की रात्रि देव दिवाली मनाई जा रही है. बता दें कि गत 29 नवंबर को दोपहर 12:47 बजे से ही कार्तिक पूर्णिमा लग चुकी है और आज 30 नवंबर को रात्रि 2:59 बजे इसका समापन होगा. दरअसल, कल उदया तिथि लग चुकी थी इस वजह से कई जगहों पर देव दिवाली आज मनाई जाएगी. हालांकि कुछ जगहों पर देव दिवाली बीते कल यानी कि 29 नवंबर को मनाई जा चुकी है. हिंदू धर्म शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा की बहुत महिमा बतायी गई है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्वर्ग से देवता आकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दिवाली मनाते हैं. इसके अलावा यह भी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से पाप कर्मों का नाश होता है और मनुष्य के चित्त की शुद्धि होती है. देव दिवाली के दिन पूजा करने और दीपदान करने का विशेष महत्व है. आइए जानते हैं....

देव दीवाली का शुभ मुहूर्त:

देव दीवाली आज 30 नवंबर 2020 को प्रातःकाल से शुरू होकर रात 02 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगी. देव दिवाली पर पूजा करने का शुभ मुहूर्त  30 नवंबर को शाम के समय 05.08 बजे से लेकर 07.47 बजे तक है. देव दिवाली पर भी प्रदोष काल में पूजा की जाती है.



देव दीवाली पर दीपदान का महत्व जानें ?
देवदिवाली के दिन पवित्र जल से स्नान कर घाट किनारे दीपदान का विशेष महत्व है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देव दीवाली के दिन मिट्टी के दिए दान करने से जातक के जीवन पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद बना रहता है. ऐसा करने से जीवन में सुख, ऐश्वर्य, खुशहाली और धन, वैभव बना रहता है. लेकिन कभी भी खाली मिट्टी के दिए का दान नहीं करना चाहिए अपितु घी में रुई की बाती और घी डालकर ही मंदिर में दीपदान करना श्रेष्ठ माना गया है. हालांकि लोग तालाब में और पवित्र पेड़ के नीचे भी दीपदान करते हैं. शास्त्रों में नदी के किनारे दीपदान का जिक्र है लेकिन इसका देव दीवाली से कोई सम्बन्ध नहीं बताया गया है. हालांकि काशी में लंबे समय से ऐसा होता आ रहा है ऐसे में ये लोकाचार का एक रिवाज बन चुका है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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