Chaitra Navratri 2021: भीलवाड़ा के टीले की खुदाई में निकलीं धनोप माता, ऐसे होती है इनकी विशेष पूजा

देवी शीतला माता (देवी दुर्गा) को समर्पित धनोप माता मंदिर की वास्तुकला भी काफी आकर्षक है.

देवी शीतला माता (देवी दुर्गा) को समर्पित धनोप माता मंदिर की वास्तुकला भी काफी आकर्षक है.

धनोप माता मंदिर (Dhanop Mata Mandir) लगभग 11वीं शताब्दी पुराना है. इस मंदिर में विक्रम संवत 912 का शिलालेख भी है जिससे मंदिर के ऐतिहासिक होने की पुष्टि होती है.

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  • Last Updated: April 19, 2021, 3:10 PM IST
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ऐतिहासिक पर्यटन के साथ-साथ राजस्थान (Rajasthan) में धार्मिक पर्यटन की भी काफी अधिक संभावनाएं हैं. बड़े-बड़े प्रसिद्ध मंदिरों के अलावा देवी मां के ऐसे कई मंदिर हैं, जहां वर्षभर तो श्रद्धालु आते ही हैं लेकिन नवरात्रियों में यहां विशेष मेलों में माता के भक्तों का सैलाब उमड़ता है. एक हजार साल से ज्यादा पुराना ऐसा ही एक मंदिर भीलवाड़ा जिले में धनोप माता का मंदिर. यह राज्य के प्रमुख देवी मंदिर में से एक है जहां हर साल बड़ी संख्या में हिन्दू भक्त शीतला माता के दर्शन के लिए आते हैं. हालांकि कोरोना के बढ़ते मामलों को देखकर अभी इस मंदिर में जानें से बचें.

मंदिर निर्माण का इतिहास

प्राचीन काल में यह नगर राजा धुंध की नगरी थी, जिसे ताम्बवती नगरी भी बोला जाता था. राजा धुन्ध जिनका किला खारी नदी के किनारे पर प्राचीन काल से बना हुआ था, वह आज भी विद्यमान है. वे जगन्नाथपुरी में श्री जगन्नाथजी के दर्शनार्थ गये थे. जिस समय वे कलकत्ता शहर में पहुंचे तो देवी मां ने स्वप्र में आकर कहा कि तुम यहीं से वापस लौट जाओ. मैं तुम्हारे गांव में बालू रेत के टीले में दबी हुई हूं. टीले का स्थान भी बताया किन्तु राजा हठधर्मिता के चलते एक सप्ताह तक श्री जगन्नाथपुरी जाने की जिद करते रहे, जैसे ही वे कलकत्ता से बाहर निकले अंधे हो गए. दोबारा लौटकर कलकत्ता आने पर आखों में रोशनी आई. तब राजा कलकत्ता से ही जगन्नाथ यात्रा का समापन कर वापस आ गए.

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अपने गांव में शीघ्रताशीघ्र पहुंच गाजे-बाजे और ग्रामवासियों के साथ निर्धारित टीले पर पहुंचकर टीले की खुदाई करवाना प्रारंभ किया. जनश्रुति है कि 90 फीट उंचे और 100 फीट चौड़े वर्गाकार टीले से रेत हटाते ही मां भगवती अपनी 7 बहिनों के साथ प्रकट हुईं, जिनमें श्री अष्टभुजाजी, अन्नपूर्णाजी, चामुण्डाजी, महिषासुर मर्दिनी व श्री कालका जी हैं. इन पांचों मूर्तियो के दर्शन श्रृंगार होने पर होते हैं.

11वीं शताब्दी से ज्यादा पुराना है मंदिर

धनोप माता मंदिर लगभग 11वीं शताब्दी पुराना है. इस मंदिर में विक्रम संवत 912 का शिलालेख भी है जिससे मंदिर के ऐतिहासिक होने की पुष्टि होती है. एक उंचे टीले पर बना मंदिर बेहद प्राचीन संरचना है. शीतला माता का मंदिर भीलवाड़ा जिले के धनोप गांव में स्थित है, जिसकी वजह से इस मंदिर को धनोप माता मंदिर कहा जाता है. माना जाता है कि प्राचीन काल में धनोप एक समृद्ध नगर था जिसमें कई सुंदर मंदिर, भवन, बावड़ियां, कुण्ड बने थे. इस नगर में दोनों तरफ मानसी और खारी नदी बहती थी जो आज भी यहां है.



मनोकामना पूरी होने पर करते हैं सवामणी

यह राजस्थान के प्रमुख लोकतीर्थों में से भी एक है. धनोप माता के मंदिर पर वैसे तो सालभर भक्त मनौतियां मनाने आते रहते है और इच्छित फल पाते हैं. नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तजनों की संख्या काफी बढ़ जाती है. राजस्थान के कई जिलों सहित काफी दूर-दूर से भक्त यहां अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए आते हैं जिसके फलस्वरूप नवरात्रि में यह स्थान मेले का रूप धारण कर लेता है और भक्तगण यहां झूमकर धनोप माता के भजन गाते है. मनोकामना पूरी होने पर लोग यहां सवामणी कर माता रानी के भोग लगाते हैं.

धनोप है कई सम्प्रदायों का उपासना स्थल

मां भगवती और धनोप मंदिर में आस्था रखने के कारण कई भक्तों ने इसके चारों ओर अनेक निर्माण कार्य करवाए हैं. यहां एक प्राचीन किला भी है जो अपनी विशेषता लिए हुए है. मध्यकालीन राजस्थानी परम्परा के प्रतिकूल यहां किले की दीवारें पत्थर के स्थान पर पक्की ईंटों से बनी है. धनोप केवल वैष्णव, शैव और शक्ति पूजा का ही केंद्र नहीं बल्कि यह श्वेताम्बर जैन संम्प्रदाय की आस्था का भी केंद्र रहा है. यहां के उत्तर मध्ययुगीन श्वेताम्बर जैन मंदिर के गर्भगृह में 10वीं से लेकर 14वीं शताब्दी की प्रतिमाएं है जिनमें काले पत्थर की चार पार्श्वनाथ प्रतिमाएं और गौमुख पक्ष की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

देवी मां के मंदिर की वास्तुकला आकर्षक

देवी शीतला माता (देवी दुर्गा) को समर्पित धनोप माता मंदिर की वास्तुकला भी काफी आकर्षक है. धनोप माता राजा की कुल देवी थी. मंदिर सभामण्डप का निर्माण पृथ्वीराज चौहान तृतीय के शासनकाल के समय का बताया जाता है. धनोप माता मंदिर में देवियों की चित्ताकर्षक मूर्तियों के अलावा यहां पर भैरो जी का स्थान भी है और शिव-पार्वती, कार्तिकेय, गणेश व चौसठ योगनियों की मूर्तियां भी हैं. वैसे तो माता के दर्शन के लिए रोजाना तीर्थ यात्री आते हैं लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां धनोप माता का मेला भी लगता है जिसमे बड़ी संख्या में यात्री शामिल होते हैं.

खुदाई में मिले चांदी के सिक्के बताते हैं इतिहास

गत वर्षों में धनोप ग्राम के एक मकान के आंगन में खुदाई में तीस चांदी के सिक्के मिले हैं. इन सिक्कों पर राजा का उर्ध्व चित्र तथा दूसरी ओर तथाकथित आग्निवेदी या सिंहासन बिन्दु रेखाओं के माध्यम से बनाए गये हैं. इन सिक्कों को पश्चिमोत्तर तथा मध्य भारत में चलाने का श्रेय हूणों को दिया जाता है. धनोप पर 11 वीं शताब्दी में राठौडों का आधिपत्य था. 8-12 वीं शताब्दी तक शिव शक्ति तथा वैष्णव मत का आधिक्य रहा.
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