Durga Ashtami 2020: मां कामाख्या मंदिर है बेहद अद्भुत, देवी का शक्तिपीठ है विश्व प्रसिद्ध

कामाख्या मंदिर को सबसे पुराना शक्तिपीठ कहा गया है. (pic credit: instagram/apurv_singh_official)
कामाख्या मंदिर को सबसे पुराना शक्तिपीठ कहा गया है. (pic credit: instagram/apurv_singh_official)

Durga Ashtami 2020: मां कामाख्या मंदिर (Kamakhya Devi Temple) को ही सबसे पुराना शक्तिपीठ (Shakti Peeth) कहा गया है. इसमें देवी मां कामाख्या की पूजा पूर्ण रीति-रिवाज से की जाती है. ऐसी मान्यता है कि सती का योनि भाग कामाख्या स्थान पर गिरा था. जिसके बाद इस स्थान पर देवी के पावन मंदिर को स्थापित किया गया...

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 24, 2020, 2:40 PM IST
  • Share this:
Durga Ashtami 2020: आज दुर्गा अष्टमी (Durga Ashtami 2020) है. नवरात्रि (Navratri) के आठवें दिन यानी कि अष्टमी को आज भक्त मां नव दुर्गा के आठवें स्वरुप मां महागौरी की पूजा अर्चना कर रहे हैं. आज हम माता रानी के 9 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या देवी मंदिर (Kamakhya Devi Temple) के बारे में जानेंगे. कामाख्या देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. यह शक्तिपीठ चमत्कारी और बहुत ही प्रसिद्ध माना जाता है. इस मदिंर को तांत्रिकों और अघोरियों का गढ़ भी कहते हैं. यह शक्तिपीठ असम की राजधानी गुवाहटी के दिसपुर से लगभग 7 किमी दूर नीलांचल पर्वत से 10 किमी की दूरी पर है. गौरतलब है कि कोरोना काल में बंद इस मंदिर के द्वार अब श्रृद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं.

सबसे पुराना और शक्तिशाली शक्तिपीठ
कामाख्या मंदिर को ही सबसे पुराना शक्तिपीठ कहा गया है. इसमें देवी मां कामाख्या की पूजा पूर्ण रीति-रिवाज से की जाती है. ऐसी मान्यता है कि सती का योनि भाग कामाख्या स्थान पर गिरा था. जिसके बाद इस स्थान पर देवी के पावन मंदिर को स्थापित किया गया.

इस कुंड की होती है पूजा
सभी 51 शक्तिपीठों में से सिर्फ कामाख्या मंदिर को महापीठ का दर्जा हासिल है. लेकिन कामाख्या मंदिर में दुर्गा और अम्बे मां का न कोई चित्र है और न ही कोई मूर्ति है. यहां आने वाले श्रृद्धालु मंदिर में बने के कुंड पर फूल अर्पित कर पूजा करते हैं. इस कुंड को फूलों से ढककर रखा जाता है. बताया जाता है कि इस कुंड से हमेशा का पानी का रिसाव होता है. ऐसी मान्यता है कि फूलों से ढका यह कुंड वहां स्थापित किया गया है जहां देवी सती की योनि भाग गिरा था और एक तरह से भक्त देवी सती की योनि की पूजा-अर्चना करते हैं और माता यहां रजस्वला भी होती हैं.



इस शक्तिपीठ को है महापीठ का दर्जा
पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो पता चलता है कि विष्णु भगवान ने महादेव शिवशंकर का मां सती के प्रति मोह भंग करने के लिए अपने चक्र से माता के 51 भाग कर दिए थे और जहां-जहां माता के शरीर के भाग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों को स्थापित किया गया था. इसलिए कामाख्या शक्तिपीठ को महापीठ कहा जाता है.

भक्तों की भीड़ को संभालना होता है मुश्किल
यह शक्तिशाली पीठों में से एक हैं. इस मंदिर में हर साल भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. लेकिन दुर्गादेऊल, पोहान बिया, मदानदेऊल, दुर्गा पूजा, मनासा पूजा और अम्बुवाची के अवसरों पर इस मंदिर का अपना अलग महत्व है. इन दिनों भक्तों की भारी भीड़ को संभालना मुश्किल हो जाता है.

नदी का पानी हो जाता है लाल
मान्यता है कि ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है, इसका कारण कामाख्या देवी मां के मासिक धर्म को बताया जाता है. ऐसा अम्बुवाची मेले के दौरान हर साल होता है. यही कारण है कि इन तीन दिनों में भक्तों का बड़ा सैलाब इस मंदिर में उमड़ता है. इन दिनों भक्तों को प्रसाद के रूप में लाल रंग का गीला कपड़ा भेंट किया जाता है.

भक्तों को प्रसादस्वरुप मिलता है लाल कपड़ा
मान्यता है कि देवी मां के रजस्वला के दिनों में उनके पास सफेद रंग का कपड़ा बिछा दिया जाता है जो माता के रज से तीन दिनों में लाल रंग का हो जाता है. रज से गीले इस लाल रंग के कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहा जाता है और यही कपड़ा श्रृद्धालुयों को प्रसादस्वरूप दिया जाता है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज