Durga Puja 2020: 450 साल पहले शुरू हुई थी सिंदूर खेला की प्रथा, जानें कैसे किया जाता है देवी बोरोन

दशमी पर सिंदूर लगाने की पंरपरा सदियों से चली आ रही है.
दशमी पर सिंदूर लगाने की पंरपरा सदियों से चली आ रही है.

विजयदशमी (Vijayadashami) या मां दुर्गा विसर्जन के दिन महिलाएं एक-दूसरे के साथ मां दुर्गा (Maa Durga) के लगाए सिंदूर (Sindur) से सिंदूर खेला खेलती हैं. सिंदूर विवाहित महिलाओं की निशानी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 25, 2020, 9:12 AM IST
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जिस दिन मां दुर्गा (Maa Durga) को विदा किया जाता है यानी जिस दिन प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, उस दिन बंगाल में सिंदूर खेला या सिंदूर उत्सव (Sindur Khela) मनाया जाता है. यह विदाई का उत्सव होता है. इस दिन विजयदशमी (Vijayadashami) भी होती है. इस दिन सुहागिन महिलाएं (Married Women) पान के पत्ते से मां दुर्गा को सिंदूर (Sindur) अर्पित करती हैं. उसके बाद एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और उत्सव मनाती हैं. एक दूसरे के सुहाग की लंबी आयु की शुभकामनाएं भी देती हैं. कहा जाता है कि मां दुर्गा मायके से विदा होकर जब ससुराल जाती हैं तो सिंदूर से उनकी मांग भरी जाती है. साथ ही दुर्गा मां को पान और मिठाई भी खिलाई जाती हैं. इसी मौके पर महिलाएं एक दूसरे की मांग में सिंदूर लगाती हैं. कई महिलाएं चेहरे पर भी सिंदूर लगाती हैं. विजयदशमी या मां दुर्गा विसर्जन के दिन महिलाएं एक-दूसरे के साथ मां दुर्गा के लगाए सिंदूर से सिंदूर खेला खेलती हैं. सिंदूर विवाहित महिलाओं की निशानी है और इस अनुष्ठान के जरिए महिलाएं एक दूसरे के लिए सुखद और सौभाग्य से भरे वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं.

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450 साल पहले शुरू हुई थी परंपरा
दशमी पर सिंदूर लगाने की पंरपरा सदियों से चली आ रही है. खासतौर से बंगाली समाज में इसका बहुत महत्व है. ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा साल में एक बार अपने मायके आती हैं और वह अपने मायके में 10 दिन रूकती हैं जिसको दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है. सिंदूर खेला कि रस्म पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में पहली बार शुरू हुई थी. लगभग 450 साल पहले वहां की महिलाओं ने मां दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, कार्तिकेय और भगवान गणेश की पूजा के बाद उनके विसर्जन से पूर्व उनका श्रृंगार किया और मीठे व्यंजनों का भोग लगाया. खुद भी सोलह श्रृंगार किया. इसके बाद मां को लगाए सिंदूर से अपनी और दूसरी विवाहित महिलाओं की मांग भरी. ऐसी मान्यता थी कि भगवान इससे प्रसन्न होकर उन्हें सौभाग्य का वरदना देंगे और उनके लिए स्वर्ग का मार्ग बनाएंगे.
पूजा और भोग अनुष्ठान


विसर्जन के दिन अनुष्ठान की शुरुआत महाआरती से होती है, और देवी मां को शीतला भोग अर्पित किया जाता है, जिसमें कोचुर शाक, पंता भात और इलिश माछ को शामिल किया जाता है. पूजा के बाद प्रसाद बांटा जाता है. पूजा में एक दर्पण को देवी के ठीक सामने रखा जाता है और भक्त देवी दुर्गा के चरणों की एक झलक पाने के लिए दर्पण में देखते हैं. मान्यता है कि जिसे दपर्ण में मां दुर्गा के चरण दिख जाते हैं उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

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देवी बोरन की बारी
पूजा के बाद देवी बोरन किया जाता है, जहां विवाहित महिलाएं देवी को अंतिम अलविदा कहने के लिए कतार में खड़ी होती हैं. उनकी बोरान थली में सुपारी, पान का पत्ता, सिंदूर, आलता, अगरबत्ती और मिठाइयां होती हैं. वे अपने दोनों हाथों में पान का पत्ता और सुपारी लेती हैं और मां के चेहरे को पोंछती हैं. इसके बाद मां को सिंदूर लगाया जाता है. शाखां और पोला (लाल और सफेद चूडि़यां) पहनाकर मां को विदाई दी जाती हैं. मिठाई और पान-सुपारी चढ़ाया जाता है. आंखों में आंसू लिए हुए मां को विदाई दी जाती है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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