Dusshera 2020: जानें दशहरा से जुड़ी मान्यता और इस खास दिन का महत्व

नवरात्रि के पर्व के बाद दसवें दिन जश्न के तौर पर दशहरे का आयोजन किया जाता है.
नवरात्रि के पर्व के बाद दसवें दिन जश्न के तौर पर दशहरे का आयोजन किया जाता है.

हिन्दू पंचाग के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी (Dashami) को और दिवाली से ठीक बीस दिन पहले विजयदशमी (Vijayadashami) अथवा दशहरे (Dussehra) का त्योहार देशभर में मनाया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 24, 2020, 1:40 PM IST
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हिन्दू धर्म में जितने भी त्योहार मनाए जाते हैं उन सब का कोई न कोई संदेश अवश्य होता है. ठीक उसी तरह आज हम जिस त्योहार की बात करने जा रहे हैं, उसका सन्देश होता है- बुराई पर अच्छाई की जीत. जी हां, यहां हम बात कर रहे हैं दशहरे (Dussehra) के त्योहार के बारे में. हिन्दू पंचाग के अनुसार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी (Dashami) को और दिवाली से ठीक बीस दिन पहले विजयदशमी अथवा दशहरे का त्योहार देशभर में मनाया जाता है. इस वर्ष दशहरे का त्योहार 25 अक्टूबर (रविवार) के दिन मनाया जाएगा. इसी दिन भगवान राम (Lord Rama) ने अहंकारी रावण का वध कर के माता सीता को उसके चंगुल से बचाया था. देश के कई हिस्सों में यह दिन विजयदशमी (Vijayadashami) के रूप में भी मनाया जाता है. जहां मान्यतानुसार यह दिन विजया माता से भी जोड़कर देखा जाता है, वहीं बहुत से लोग इस दिन को आयुध पूजा के रूप में भी मनाते हैं. आयुध पूजा अर्थात शस्त्र पूजा.

दशहरा के दिन शस्त्र पूजा करने का महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं शस्त्र पूजन की सही विधि. मान्यता है कि इस दिन आयुध पूजन करने से शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है.

-इस दिन घर के सभी अस्त्र-शस्त्र को इकठ्ठा कर लें और उन पर गंगाजल छिड़क कर उन्हें शुद्ध कर लें.



-इसके बाद शस्त्रों पर हल्दी-कुमकुम का टीका लगाएं और उन पर फूल इत्यादि अर्पित करें.
-इस दिन की पूजा में शमी के पत्तों को अवश्य शामिल करें.

-इस दिन को नया वाहन खरीदने के लिए भी बेहद शुभ माना गया है.

-पूजा करते समय- श्रियं रामं , जयं रामं, द्विर्जयम राममीरयेत। त्रयोदशाक्षरो मन्त्रः, सर्वसिद्धिकरः स्थितः।।, यह मंत्र जरूर पढ़ें.

कैसे मनाते हैं दशहरा
देवी मां के नौ दिन की पूजा-अर्चना यानि नवरात्रि के पर्व के बाद दसवें दिन जश्न के तौर पर दशहरे का आयोजन किया जाता है. इस दिन देश में कई जगहों पर राम लीला का आयोजन होता है, जिसमे कलाकार रामायण के पात्र बनते हैं और राम-रावण के इस युद्ध को नाटिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं. मैदानों में दस सिर वाले रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले रखे जाते हैं और अंत में उसको जलाया जाता है. पटाखों और रोशनी में डूबा हुआ यह दिन बेहद ही खूबसूरत और पावन होता है.

दशहरा के त्योहार का महत्व
इस त्योहार का अर्थ होता है बुराई पर अच्छाई की जीत. उस दौर में मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम ने माता सीता को अहंकारी रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए उसका वध किया था. रावण का वध होना और भगवान राम का माता सीता को सही-सलामत बचा लेना ही बुराई पर अच्छाई की जीत मानी गई है. हालांकि आज के दौर के हिसाब से बात करें तो, आज के समय में समाज में सौ तरह की कुरीतियां फैली हुई हैं. झूठ, छल, कपट, धोखेबाजी, करप्शन, भ्रष्टाचार, हिंसा, भेद-भाव, द्वेष, यौन शोषण- ऐसे में हर साल हम दशहरे का त्योहार इसी विश्वास के साथ मनाते हैं कि हम समाज की इन बुराइयों को खत्म कर सकें और अच्छाई की जीत का परचम लहरा सकें. (साभार- Astrosage.com)
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