Happy Janmashtami 2020: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के बाद जरूर पढ़ें उनकी जन्मकथा और आरती

Happy Janmashtami 2020: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के बाद जरूर पढ़ें उनकी जन्मकथा और आरती
कृष्ण जन्माष्टमी हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में मनाया जाता है.

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Shri Krishna Janmashtami) है. आज के दिन बाल गोपाल (Balgopal) की पूजा की जाती है. उन्हें 56 भोग लगाया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 12, 2020, 6:31 AM IST
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जन्माष्टमी (Janmashtami) हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है. इस त्योहार को देशभर में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक, सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु (Lord Vishnu) के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण (Lord Krishna) के जन्मदिन को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Shri Krishna Janmashtami) के रूप में मनाया जाता है. आज कृष्ण जन्माष्टमी है. आज के दिन बाल गोपाल की पूजा की जाती है. उन्हें 56 भोग लगाया जाता है. आइए जानते हैं बाल गोपाल की पूजा करते समय किन मंत्रों का पाठ करना चाहिए. साथ ही पूजन के बाद पढ़ें श्रीकृष्ण की जन्मकथा और आरती.

इन मंत्रों का करें जाप
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' इस मंत्र का जाप करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं. जन्माष्टमी पर पूजन के दौरान इस मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए. इसके अलावा पूजा के दौरान भक्त 'गोकुल नाथाय नमः' का जप भी करना चाहिए.

भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा
त्रेता युग के अंत और द्वापर युग के प्रारंभ काल में पापी कंस उत्पन्न हुआ. द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे. उसके बेटे कंस ने उन्हें गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन गया. कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था. एक बार कंस, अपनी बहन देवकी को उसके ससुराल पहुंचाने जा रहा था और तभी रास्ते में अचानक आकाशवाणी हुई- ''हे कंस, जिस देवकी को तू प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है. इसी की गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा''.



आकाशवाणी सुनकर कंस अपने बहनोई वसुदेव को जान से मारने के लिए तैयार हो गया. तभी देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ''मेरी गर्भ में जो संतान होगी, मैं उसे तुम्हारे सामने ला दूंगी. बहनोई को मारने से क्या लाभ होगा?'' यह सुनकर कंस देवकी को वापस मथुरा ले गया और उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में बंद कर दिया. काल कोठरी में देवकी की कोख से सात बच्चों ने जन्म लिया लेकिन कंस ने उनके पैदा होते ही उन्हें मार दिया. अब आठवां बच्चा होने वाला था. कारागार में उन पर कड़े पहरे थे. उसी बीच नंद क पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था.

जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी. जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए. दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े. तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं. तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंद के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो. इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है. फिर भी तुम चिंता न करो. जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी.'

अपनी मृत्यु के डर से घबराकर कंस ने पूतना को बुलाकर कृष्ण को मारने का आदेश दिया. कंस की आज्ञा का पालन करते हुए पूतना ने सुंदरी का रूप धारण किया और नंद बाबा के घर पहुंच गई. उसने मौका देखभर कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया और अपना दूध पिलाने लगी. स्तपान करते हुए कृष्ण ने उसके प्राण भी हर लिए. पूतना की मृत्यु की खबर सुन कंस और भी चिंतित हो गया. इस बार उसने केशी नामक अश्व दैत्य को कृष्ण को मारने के लिए भेजा. कृष्ण ने उसे भी यमलोक पहुंचा दिया. इसके बाद कंस ने अरिष्ट नामक दैत्य को बैल के रूप में भेजा. कृष्ण अपने बाल रूप में क्रीडा कर रहे थे. खेलते-खेलते ही उन्होंने उस दैत्य रूपी बैल के सींगों को क्षण भर में तोड़ कर उसे मार डाला. कंस ने फिर काल नामक दैत्य को कौवे रूप में भेजा. वह जैसी ही कृष्ण को मारने के लिए उनके पास पहुंचा. श्रीकृष्ण ने कौवे को पकड़कर उसके गले को दबोचकर मसल दिया और पंखों को अपने हाथों से उखाड़ दिया, जिससे काल नाम के असुर की मौत हो गई.

एक दिन श्रीकृष्ण यमुना नदी के तट पर खेल रहे थे तभी उनसे गेंद नदी में जा गिरी और वे गेंद लाने के लिए नदी में कूद पड़े. इधर, यशोदा को जैसे ही खबर मिली वह भागती हुई यमुना नदी के तट पर पहुंची और विलाप करने लगी. श्री कृष्ण जब नीचे पहुंचे तो नागराज की पत्नी ने कहा- 'हे भद्र! यहां पर किस स्थान से और किस प्रयोजन से आए हो? यदि मेरे पति नागराज कालिया जग गए तो वे तुम्हें भक्षण कर जायेंगे.' तब कृष्ण ने कहा, 'मैं कालिया नाग का काल हूं और उसे मार कर इस यमुना नदी को पवित्र करने के लिए यहां आया हूं.' ऐसा सुनते हीं कालिया नाग सोते से उठा और श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगा. जब कालिया नाग पूरी तरह मरनासन्न हो गया तभी उसकी पत्नी वहां पर आई और अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिये कृष्ण की स्तुति करने लगी, 'हे भगवन! मैं आप भुवनेश्वर कृष्‍ण को नहीं पहचान पाई. हे जनाद! मैं मंत्रों से रहित, क्रियाओं से रहित और भक्ति भाव से रहित हूं. मेरी रक्षा करना. हे देव! हे हरे! प्रसाद रूप में मेरे स्वामी को मुझे दे दो अर्थात् मेरे पति की रक्षा करो.' तब श्री कृष्ण ने कहा कि तुम अपने पूरे बंधु-बांधवों के साथ इस यमुना नदी को छोड़ कर कहीं और चले जाओ. इसके बाद कालिया नाग ने कृष्ण को प्रणाम कर यमुना नदी को छोड़ कर कहीं और चला गया. कृष्ण भी अपनी गेंद लेकर यमुना नदी से बाहर आ गए.

इधर, कंस को जब कोई उपाय नहीं सूझा तब उसने अक्रूर को बुला कर कहा कि नंदगांव जाकर कृष्ण और बलराम को मथुरा बुला लाओ. मथुरा आने पर कंस के पहलवान चाणुर और मुष्टिक के साथ मल्ल युद्ध की घोषणा की. अखाड़े के द्वार पर हीं कंस ने कुवलय नामक हाथी को रख छोड़ा था, ताकि वो कृष्‍ण को कुचल सके. लेकिन श्रीकृष्ण ने उस हाथी को भी मार डाला. उसके बाद श्रीकृष्ण ने चाणुर के गले में अपना पैर फंसा कर युद्ध में उसे मार डाला और बलदेव ने मुष्टिक को मार गिराया. इसके बाद कंस के भाई केशी को भी केशव ने मार डाला. बलदेव ने मूसल और हल से और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से दैत्यों को माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मार डाला. श्री कृष्ण ने कहा- 'हे दुष्ट कंस! उठो, मैं इसी स्थल पर तुम्हें मारकर इस पृथ्वी को तुम्हारे भार से मुक्त करूंगा.' यह कहते हुए कृष्‍ण ने कंस के बालों को पकड़ा और घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया जिससे वह मार गया. कंस के मरने पर देवताओं ने आकाश से कृष्ण और बलदेव पर पुष्प की वर्षा की. फिर कृष्ण ने माता देवकी और वसुदेव को कारागृह से मुक्त कराया और उग्रसेन को मथुरा की गद्दी सौंप दी.

पूजा के बाद श्रीकृष्ण की करें आरती

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी शिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
॥ आरती कुंजबिहारी की...॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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