Holika Dahan 2021: कब से शुरू हुई होलिका दहन की परंपरा? कथा से जानें दिलचस्प रहस्य

होलिका दहन का इतिहास काफी पुराना है

होलिका दहन का इतिहास काफी पुराना है

Holika Dahan 2021 History And Mythological Story: होलिका दहन का उल्लेख विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी मिलता है. आइए पौराणिक कथाओं से जानते हैं होलिका दहन के बारे में...

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  • Last Updated: March 28, 2021, 6:15 AM IST
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Holika Dahan 2021 History And Mythological Story: होलिका दहन आज 28 मार्च रविवार की रात जलाई जाएगी. कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध होलिका के दिन ही किया था. होलिका की अग्नि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. होलिका विष्णु भक्त प्रह्लाद के प्राण लेने के लिए उसे लेकर अग्नि में बैठी थी. अग्नि में ना जलने के वरदान के बावजूद वो जल कर राख हो गई क्योंकि होलिका की मंशा सही नहीं थी. होलिका दहन का इतिहास काफी पुराना है. होलिका दहन का उल्लेख विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी मिलता है. आइए पौराणिक कथाओं से जानते हैं होलिका दहन के बारे में...

होलिका दहन की पौराणिक कथा:

पौराणिक कथा के अनुसार, दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती. किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ. इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है. होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं.होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है.

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कामदेव की पौराणिक कथा:

ऐसी ही एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं. ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया. तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए. कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई. अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया. कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है.

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महाभारत की पौराणिक कथा:

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार. युधिष्ठर को श्री कृष्ण ने बताया- एक बार श्री राम के एक पूर्वज रघु, के शासन मे एक असुर महिला थी. उसे कोई भी नहीं मार सकता था, क्योंकि वह एक वरदान द्वारा संरक्षित थी. उसे गली में खेल रहे बच्चों, के अलावा किसी से भी डर नहीं था. एक दिन, गुरु वशिष्ठ, ने बताया कि- उसे मारा जा सकता है, यदि बच्चे अपने हाथों में लकड़ी के छोटे टुकड़े लेकर, शहर के बाहरी इलाके के पास चले जाएं और सूखी घास के साथ-साथ उनका ढेर लगाकर जला दें. फिर उसके चारों ओर परिक्रमा दें, नृत्य करें, ताली बजाएं, गाना गाएं और नगाड़े बजाएं. फिर ऐसा ही किया गया. इस दिन को,एक उत्सव के रूप में मनाया गया, जो बुराई पर एक मासूम दिल की जीत का प्रतीक है.

श्रीकृष्ण और पूतना की पौराणिक कथा:

पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्रीकृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को मारने के लिए भेजा. पूतना स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था. लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए. उन्होंने दुग्धपान करते समय ही पूतना का वध कर दिया. कहा जाता है कि तभी से होली पर्व मनाने की मान्यता शुरू हुई. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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