Indira Ekadashi 2020: इंदिरा एकादशी को पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगा अद्भुत पुण्य लाभ

Indira Ekadashi 2020: इंदिरा एकादशी को पढ़ें ये व्रत कथा, मिलेगा अद्भुत पुण्य लाभ
इंदिरा एकादशी की कथा सुनने से वायपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है. (फोटो साभार: instagram/im_gyananjali)

Indira Ekadashi 2020: स्वयं भगवान कृष्ण (God Krishna) ने युधिष्ठिर को बतायी थी इंदिरा एकादशी व्रत कथा (Indira Ekadashi Katha) की महिमा, जानें...

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  • Last Updated: September 13, 2020, 7:43 AM IST
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Indira Ekadashi 2020: आज इंदिरा एकादशी है. आज भक्त भगवान विष्णु की पूजा अर्चना कर रहे हैं . हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान के साथ करने से पितरों को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस व्रत के दिन इन कामों को करने से यश, धन वैभव बढ़ता है और कर्ज से मुक्ति रहती है.. स्वयं भगवान कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर की इंदिरा एकादशी की कथा बताते हुए महिमा गाई थी. कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो जातक यह व्रत करते हुए इंदिरा एकादशी की कथा क सुनता है उसे वायपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है. आज हम आपके लिए लाए हैं इंदिरा एकादशी व्रत की कथा...


इंदिरा एकादशी व्रत की कथा...

प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था. वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था. एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए. राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया.



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सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहां यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं. आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए. तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो.
मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहां श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की. उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा. उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूं. उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है.
इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए. नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें. फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें. प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा.
हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएं और दक्षिणा दें. पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, फूल, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें.
रात में भगवान के निकट जागरण करें. इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएं . भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें. नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएंगे. इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए.नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बांधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया. राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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