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त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का भव्य भवन सिंधु आर्यशैली का है अद्भुत नमूना, जानें इस ज्योतिर्लिंग की खास बातें

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर ही एक कुंड बना है. जिसे कुशावर्त का नाम दिया गया है.

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर ही एक कुंड बना है. जिसे कुशावर्त का नाम दिया गया है.

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का अपना एक अलग महत्व है. इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का भव्य भवन सिंधु आर्यशैली का अद्भुत नमूना है.
त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर ही एक कुंड बना है, जिसे कुशावर्त का नाम दिया गया है.

Trimbakeshwar Jyotirling: सनातन धर्म में भगवान शिव को मानने और उनकी आराधना करने वाले हजारों लोग हैं. मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की श्रद्धा भाव के साथ पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि भगवान शिव एक लोटा जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं. भारत वर्ष में भगवान शिव के मुख्य रूप से 12 ज्योतिर्लिंग हैं, जो देश के कोने कोने में भव्य मंदिरों के रूप में स्थापित हैं. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

-त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का भव्य भवन सिंधु आर्यशैली का अद्भुत नमूना है. इस मंदिर का पुनःनिर्माण नाना साहब पेशवा ने कराया था, जो सन 1755 में शुरू होकर 1786 में संपन्न हुआ था. तथ्य बताते हैं कि इस मंदिर के निर्माण में लगभग 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे उस समय इतनी बड़ी रकम को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था.

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-त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की सबसे असाधारण बात इसकी तीन मुखी है. ऐसा माना जाता है कि यह तीन मुख भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं. त्र्यंबकेश्वर मंदिर में इन्हें सोमवार के दिन 4:00 से 5:00 के बीच ही दिखाया जाता है. यह मंदिर ब्रह्मगिरि पर्वत के तलहटी में बसा हुआ है.

-त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर ही एक कुंड बना है, जिसे कुशावर्त का नाम दिया गया है. मान्यताओं के मुताबिक, यह कुंड गोदावरी नदी का स्रोत है. ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मगिरि पर्वत में गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाया करती थी. इसी को रोकने के लिए ऋषि गौतम ने एक कुशा की मदद से गोदावरी को यहां पर बांध दिया, इसलिए इस कुंड को कुशावर्त के नाम से जाना जाने लगा.

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-त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण गोदावरी नदी के किनारे काले रंग के पत्थरों से किया गया है. इस मंदिर की वास्तुकला अद्भुत और अनोखी है. इस मंदिर में पंचकोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबली पूजा कराई जाती है.

Tags: Dharma Aastha, Lord Shiva, Religion

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