Jagannath Rath Yatra 2020: इतिहास में पहली बार बिना भक्तों के निकली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, जानें अद्भुत कहानी

Jagannath Rath Yatra 2020: इतिहास में पहली बार बिना भक्तों के निकली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, जानें अद्भुत कहानी
जगन्नाथ रथयात्रा

जगन्नाथ रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra): हिंदू धर्म परम्परा में श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का काफी महत्व है. यात्रा शुरू होने से पहले सोने की मूठ वाली झाड़ू से श्री जगन्नाथ के रथ के सामने का रास्ता साफ किया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 23, 2020, 12:16 PM IST
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Jagannath Rath Yatra 2020: अषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि यानी कि आज 23 जून 2020 को भगवान जगन्नाथपुरी की रथ यात्रा का शुभारंभ होगा. इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी होते हैं. लेकिन इस बार की जगन्नाथपुरी की रथ यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक होगी. क्योंकि कोरोना वायरस लॉकडाउन के चलते पूरा देश बंद है. ऐसे में जगन्नाथपुरी की रथ यात्रा में हर साल शामिल होने वाले भक्त अपने घरों से बाहर नहीं निकल सकते. पुरी शहर सम्पूर्ण रूप से लॉकडाउन है.

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ऐसे निकाली जाती है श्री जगन्नाथ रथ यात्रा:
हिंदू धर्म परम्परा में श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का काफी महत्व है. यात्रा शुरू होने से पहले सोने की मूठ वाली झाड़ू से श्री जगन्नाथ के रथ के सामने का रास्ता साफ किया जाता है. इसके बाद विधिवत पूजा पाठ, मन्त्रों के जाप और ढोल, ताशे, नगाड़े की जोरदार आवाज के साथ भक्त भगवान श्री जगन्नाथ के रथ को मोटे मोटे रस्सों के सहारे खींचकर पूरे नगर में भ्रमण करते हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ का रथ खींचने में जो लोग एक दूसरे की सहायता करने हैं वो जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं.
 


यात्रा की शुरुआत सबसे पहले बलभद्र जी के रथ से होती है. उनका रथ तालध्वज के लिए निकलता है. इसके बाद सुभद्रा के पद्म रथ की यात्रा शुरू होती है. सबसे अंत में भक्त भगवान जगन्नाथ जी के रथ 'नंदी घोष' को बड़े-बड़े रस्सों की सहायता से खींचना शुरू करते हैं. गुंडीचा मां के मंदिर तक जाकर यह रथ यात्रा पूरी मानी जाती है. माना जाता है कि मां गुंडीचा भगवान जगन्नाथ की मासी हैं. यहीं पर देवताओं के इंजीनियर माने जाने वाले विश्वकर्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमा का निर्माण किया था.

अगर सूर्य डूबने तक यह रथ यात्रा पूरी नहीं हो पाती है तो इसे रोक दिया जाता है और अगले दिन यात्रा की शुरुआत होती है. इसके बाद भगवान जगन्नाथ 7 दिन तक इसी मंदिर में निवास करते हैं और तब तक वहां पूरे विधि-विधान के साथ पूजा पाठ चलता रहता है. इस दौरान गुंडीचा मंदिर में लजीज पकवान बनाकर भगवान जगन्नाथ को उनका भोग लगाया जाता है. लजीज पकवान खाकर भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं तो उन्हें रोगियों वाला भोजन बनाकर अर्पित किया जाता है ताकि वो जल्दी स्वस्थ हो जाएं.

इस यात्रा के तीसरे दिन मां लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से भेंट करने आती हैं लेकिन द्वारपाल मंदिर का दरवाजा बंद कर देते हैं. इससे रुष्ट हो कर लक्ष्मी जी रथ का पहिया तोड़कर पुरी के मुहल्ले हेरा गोहिरी साही में बने अपने मंदिर में वापस लौट जाती हैं. जब जगन्नाथ जी को इस बारे में पता चलता है तो वो लक्ष्मी जी को मनाने के लिए कई तरह की बेशकीमती भेंट लेकर उनके मंदिर पहुंचते हैं. आखिरकार बहुत जतन करने के बाद जगन्नाथ जी मां लक्ष्मी को मनाने में कामयाब हो जाते हैं उस दिन को विजया दशमी के रूप में मनाते हैं इसके बाद रथ यात्रा की वापसी को बोहतड़ी गोंचा के नाम से जश्न मनाते हैं. पूरे 9 दिन बाद भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर के लिए दोबारा प्रस्थान करते हैं. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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