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Jallikattu 2021: जल्लीकट्टू में सांड को काबू करने से प्रसन्न होते हैं शिव, जानें ख़ास बातें

तमिलनाडु के फेमस खेल जल्लीकट्टू के बारे में जानें (image- AP)
तमिलनाडु के फेमस खेल जल्लीकट्टू के बारे में जानें (image- AP)

Jallikattu 2021:तमिलनाडु का मदुरई (Madurai) इलाका जल्लीकट्टू के लिए फेमस है. उसमें भी तीन स्थान सबसे प्रसिद्ध हैं. नंबर एक पर है अलंकानालुर (Alankanallur) का जल्लीकट्टू, जिसे देखने विदेशी पर्यटक भी आते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 14, 2021, 1:16 PM IST
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Jallikattu 2021: आज से तमिलनाडु (Tamilnadu) में पोंगल पर्व यानि मकर संक्रांति (Makar Sankranthi) के अवसर पर प्रसिद्ध जल्लीकट्टू (Jallikattu) खेल कई जगहों पर खेला जा रहा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जल्लीकट्टू खेल में जो व्यक्ति सांडों पर काबू पा लेता है उसपर भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और कृपा करते हैं. जल्लीकट्टू (Jallikattu) के लिए सांडों (Bulls) को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी जाती है.


कैसे खेलते हैं जल्लीकट्टू
जल्लीकट्टू दरअसल सांडों को काबू में करने का खेल है. विशेष तरीके से प्रशिक्षित सांडों को एक बंद स्थान से छोड़ा जाता है, बाहर खेलने वालों की फौज मुस्तैद खड़ी रहती है. बेरिकेटिंग से बाहर बड़ी संख्या में दर्शक इसका आनंद उठाने के लिए जमे रहते हैं. जैसे ही सांड छोड़ा जाता है, वह भागते हुए बाहर निकलता है, लोग उसे पकड़ने के लिए टूट पड़ते हैं. असली काम सांड के कूबड़ को पकड़कर उसे रोकना और फिर सींग में कपड़े से बंधे सिक्के को निकालना होता है. लेकिन बिगड़ैल और गुस्सैल सांड को काबू में करना आसान नहीं होता. अधिकांश को असफलता हाथ लगती है और कई लोग इस कोशिश में चोटिल भी हो जाते हैं. इस कवायद में कइयों की जान भी चली जाती है. लेकिन परंपरा और रोमांच से जुड़े इस खेल के प्रति खिलाड़ियों और दर्शकों का जुनून गजब का होता है. जो विजयी होते हैं उनको ईनाम मिलता है. अब तो बेटिंग भी होने लगी है.





बुलफाइटिंग से बहुत अलग है जल्लीकट्टू
कई लोग जल्लीकट्टू की तुलना स्पेन की बुलफाइटिंग (Bullfighting) से करते हैं. लेकिन यह खेल स्पेन के खेल से काफी भिन्न है. इसमें बैलों (सांड) को मारा नहीं जाता और ना बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल करते हैं. हां बैलों को गुस्सैल बनाने के लिए शराब पिलाने की बातें सामने आती हैं. उल्लेखनीय है कि, प्राचीन तमिल समाज शिवभक्त रहा है, सांड को शिव की सवारी नंदी के तौर पर पूजा जाता है. तमिल समाज की पौराणिक मान्यता के अनुसार, सांड को काबू में करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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