Janmashtami 2020 Date: जन्माष्टमी 11 अगस्त या 12 अगस्त, कब है जानें

Janmashtami 2020 Date: जन्माष्टमी 11 अगस्त या 12 अगस्त, कब है जानें
जन्माष्टमी कब है जानें (फोटो साभार: instagram/ krisnaiseverything)

कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2020 Date): भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण भगवान का जन्म कंस की बहन देवकी के गर्भ से हुआ था. हालांकि कृष्ण का लालन-पालन नन्द बाबा और यशोदा मां ने किया था. भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था...

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  • Last Updated: August 10, 2020, 3:27 PM IST
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कृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami 2020 Date): कृष्ण जन्माष्टमी इस बार दो दिन मनाई जाएगी. कृष्ण जन्माष्टमी हर साल भादो पास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. 12 अगस्त को अष्टमी तिथि है लेकिन 11 अगस्त से ही अष्टमी लग जाएगी. यही वजह है कि इस बार कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव दो दिन मनाया जाएगा. हालांकि, इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण भगवान का जन्म कंस की बहन देवकी के गर्भ से हुआ था. हालांकि कृष्ण का लालन-पालन नन्द बाबा और यशोदा मां ने किया था. भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था इस कारण से अष्टमी तिथि और रोहिणी तिथि अलग-अलग दिन में पड़ने के कारण 12 अगस्त को भी जन्माष्टमी मनाई जाएगी.

कृष्ण जन्माष्टमी की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री कृष्ण परम पुरुषोत्तम भगवान का जन्म भाद्रपद की अष्ठमी तिथि  (रोहिणी नक्षत्र और चन्द्रमा वृषभ राशि में ) को मध्यरात्रि में हुआ. उनके जन्म लेते ही दिशाएं स्वच्छ व प्रसन्न एवं समस्त पृथ्वी मंगलमय हो गई थी. विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के प्रकट होते ही जेल की कोठरी में प्रकाश फैल गया.

वासुदेव-देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट कर कहा-अब मैं बालक का रूप धारण करता हूँ, तुम मुझे तत्काल गोकुल में नन्द के यहां पहुंचा दो और उनकी अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दो. तभी वासुदेवजी की हथकड़ियां खुल गयीं, दरवाज़े अपने आप खुल गए व पहरेदार सो गए. वासुदेव श्री कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल को चल दिए. रास्ते में यमुना श्री कृष्ण के चरणों को स्पर्श करने के लिए ऊपर बढ़ने लगीं.
भगवान ने अपने श्री चरण लटका दिए और चरण छूने के बाद यमुनाजी घट गयीं. बालक कृष्ण को यशोदाजी के बगल में सुलाकर कन्या को वापस लेकर वासुदेव कंस के कारागार में वापस आ गए. कंस ने कारागार में आकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटककर मारना चाहा परंतु वह कंस के हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली-हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ है? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुँच चुका है. यह देखकर कंस हतप्रद और व्याकुल हो गया. कृष्ण के प्राकट्य से स्वर्ग में देवताओं की दुन्दुभियां अपने आप बज उठीं तथा सिद्ध और चारण भगवान के मंगलमय गुणों की स्तुति करने लगे. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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