Kali Puja 2020: दिवाली पर लक्ष्मी ही नहीं, काली माता की भी होती है पूजा, जानें क्यों

माता काली की सामान्य पूजा में विशेष रूप से 108 गुड़हल के फूल, 108 बेलपत्र और माला, 108 मिट्टी के दीपक और 108 दुर्वा चढ़ाने की परंपरा है.

दुष्‍टों और पापियों का संहार करने के लिए माता दुर्गा (Maa Durga) ने ही मां काली (Maa Kali) के रूप में अवतार लिया था. माना जाता है कि मां काली के पूजन से जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाता है.

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    दिवाली (Diwali 2020) पर प्रत्येक घर में मां लक्ष्मी जी (Maa Lakshmi) की पूजा की जाती है. इस दिन धन-संपदा और शांति के लिए लक्ष्मी जी की विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. दीपावली की अमावस्‍या पर देवी लक्ष्‍मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम में इस अवसर पर मां काली (Maa Kali) की पूजा होती है. यह पूजा अर्धरात्रि में की जाती है. पश्‍चिम बंगाल में लक्ष्मी पूजा दशहरे के 6 दिन बाद की जाती है जबकि दिवाली के दिन काली पूजा होती है. पौराणिक कथा के अनुसार राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ था तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए. भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया. इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई जबकि इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का विधान भी कुछ राज्यों में है.

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    काली पूजा का महत्व क्या है?
    दुष्‍टों और पापियों का संहार करने के लिए माता दुर्गा ने ही मां काली के रूप में अवतार लिया था. माना जाता है कि मां काली के पूजन से जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाता है. शत्रुओं का नाश हो जाता है. कहा जाता है कि मां काली का पूजन करने से जन्‍मकुंडली में बैठे राहू और केतु भी शांत हो जाते हैं. अधिकतर जगह पर तंत्र साधना के लिए मां काली की उपासना की जाती है.

    काली पूजा का शुभ मुहूर्त
    काली पूजा तिथि- 14 नवंबर 2020
    काली पूजा निशिता काल- रात 11 बजकर 39 मिनट से रात 12 बजकर 32 मिनट तक
    अमावस्या तिथि प्रारम्भ- दोपहर 02 बजकर 17 मिनट से (14 नवंबर 2020)
    अमावस्या तिथि समाप्त- अगले दिन सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक (15 नवंबर 2020)

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    कैसे होती है काली पूजा?
    दो तरीके से मां काली की पूजा की जाती है, एक सामान्य और दूसरी तंत्र पूजा. सामान्य पूजा कोई भी कर सकता है. माता काली की सामान्य पूजा में विशेष रूप से 108 गुड़हल के फूल, 108 बेलपत्र और माला, 108 मिट्टी के दीपक और 108 दुर्वा चढ़ाने की परंपरा है. साथ ही मौसमी फल, मिठाई, खिचड़ी, खीर, तली हुई सब्जी तथा अन्य व्यंजनों का भी भोग माता को चढ़ाया जाता है. पूजा की इस विधि में सुबह से उपवास रखकर रात्रि में भोग, होम-हवन व पुष्पांजलि का समावेश होता है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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