जानें कैसे हुआ था हनुमान जी का जन्म, कौन थी पवनपुत्र की माता अंजनी

हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते हैं.
हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते हैं.

बजरंगबली (Bajrangbali) का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार (Tuesday) के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था. हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 29, 2020, 7:35 AM IST
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हनुमान जी (Hanuman Ji) अपने भक्तों पर आने वाले तमाम तरह के कष्टों (Pains) और परेशानियों (Problems) को दूर करते हैं. ऐसी मान्यता है कि भगवान हनुमान (Lord Hanuman) बहुत जल्द प्रसन्न होने वाले देवता हैं. उनकी पूजा पाठ में ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं होती. शायद यही वजह है कि आज के समय में हनुमान जी के भक्तों की संख्या भी बहुत अधिक हो गई है. हनुमान जी राम भक्त हैं और उनकी शरण में जाने मात्र से भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं. ज्योतिषीयों की गणना के अनुसार बजरंगबली का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था. हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी. हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते हैं. राजस्थान के सालासर व मेहंदीपुर धाम में इनके विशाल और भव्य मंदिर हैं.

कौन थीं पुंजिकस्थली यानी माता अंजनी
पुंजिकस्थली देवराज इन्द्र की सभा में एक अप्सरा थीं. एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रही थीं. इससे गुस्सा होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वानरी हो जाने का श्राप दे दिया. पुंजिकस्थली ने क्षमा मांगी, तो ऋर्षि ने इच्छानुसार रूप धारण करने का वर भी दिया. कुछ वर्षों बाद पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया. उनका नाम अंजनी रखा गया. विवाह योग्य होने पर पिता ने अपनी सुंदर पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया. इस रूप में पुंजिकस्थली माता अंजनी कहलाईं.

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वानरराज को ऋर्षियों ने दिया वर


एक बार घूमते हुए वानरराज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुंचे. उन्होंने देखा कि बहुत से ऋषि वहां आए हुए हैं. कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे. उसी समय वहां एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना शुरू कर दिया. ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, वह दुष्ट हाथी उनकी ओर झपटा. पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को यूं उत्पात मचाते देखा तो उन्होंने बलपूर्वक उसके बड़े-बड़े दांत उखाड़ दिए और उसे मार डाला. हाथी के मारे जाने पर प्रसन्न होकर ऋर्षियों ने कहा- 'वर मांगो वानरराज.' केसरी ने वरदान मांगा, ' प्रभु , इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान पुत्र आप मुझे प्रदान करें.' ऋषियों ने 'तथास्तु' कहा और वो चले गए.

माता अंजनी का क्रोधित होना
एक दिन माता अंजनी, मानव रूप धारण कर पर्वत पर जा रही थी. वे डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को निहार रही थीं. अचानक तेज हवाएं चलने लगीं और उनका वस्त्र उड़ने लगा. उन्होंने चारों तरफ देखा लेकिन आसपास के पृक्षों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे. उन्होंने विचार किया कि कोई राक्षस अदृश्य होकर उनके साथ ये दुष्टता कर रहा है. वह जोर से बोलीं- कौन दुष्ट मुझ पतिपरायण स्त्री का अपमान करने की चेष्टा करता है.

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तभी अचानक पवन देव प्रकट हो गए और बोले- देवी, क्रोध न करें और मुझे क्षमा करें. आपके पति को ऋषियों ने मेरे समान पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया है. उन्हीं महात्माओं के वचनों से विवश होकर मैंने आपके शरीर को स्पर्श किया है. मेरे अंश से आपको एक महातेजस्वी बालक प्राप्त होगा. उन्होंने आगे कहा- भगवान रुद्र मेरे स्पर्श द्वारा आप में प्रविस्ट हुए हैं. वही आपके पुत्र रूप में प्रकट होंगे. वानरराज केसरी के क्षेत्र में भगवान रुद्र ने स्वयं अवतार धारण किया. इस तरह श्रीरामदूत हनुमानजी ने वानरराज केसरी के यहां जन्म लिया.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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