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Pradosh Vrat: जानें किस तारीख को पड़ रहा है माघ माह का पहला प्रदोष व्रत, पढ़ें व्रत की महिमा

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Updated: January 21, 2020, 3:44 AM IST
Pradosh Vrat: जानें किस तारीख को पड़ रहा है माघ माह का पहला प्रदोष व्रत, पढ़ें व्रत की महिमा
जानें किस तारीख को पड़ रहा है माघ माह का पहला प्रदोष व्रत, पढ़ें व्रत की महिमा

प्रदोष व्रत २०२० (Pradosh Vrat 2020): अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिवजी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है, क्या आप इस विवाह के लिए तैयार हैं?

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  • Last Updated: January 21, 2020, 3:44 AM IST
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प्रदोष व्रत २०२० (Pradosh Vrat 2020): हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ माह का पहला प्रदोष व्रत 22 जनवरी बुधवार को पड़ रहा है. साल भर में वैसे तो कई प्रदोष व्रत पड़ते हैं लेकिन माघ माह में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का अपना अलग ही महत्व है. प्रदोष व्रत का प्रभाव दिन के हिसाब से अलग अलग होता है. प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है. जो प्रदोष व्रत बुधवार को पड़ता है उसे बुध प्रदोष या सौम्य्वारा प्रदोष व्रत कहा जाता है. माना जाता है कि इस दिन विधिवत तरीके से भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और कई गुना लाभ प्राप्त होता है. आइए जानते हैं क्या है प्रदोष व्रत की महिमा....

प्रदोष व्रत की महिमा:
बहुत समय पहले एक नगर में एक बेहद गरीब पुजारी रहता था. उस पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पुत्र को साथ लेकर भीख मांगती हुई शाम तक घर वापस आती थी.
एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था. उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नहीं गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र जैसा रखने लगी.

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई. वहां उसने ऋषि से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी.

एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे. उनमें से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परंतु राजकुमार वन में ही रह गया. उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करने लगा. उस कन्या का नाम अंशुमती था. उस दिन वह राजकुमार घर देरी से लौटा.

राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी. तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा कि आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो ना, आपका नाम धर्मगुप्त है.इसे भी पढ़ें: Shattila Ekadashi 2020: यहां पढ़ें षटतिला एकादशी की कथा, इसके बिना अधूरा है व्रत

अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिवजी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है, क्या आप इस विवाह के लिए तैयार हैं?

राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे दी तो उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ. बाद में राजकुमार ने गंधर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगा. वहां उस महल में वह पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ ले आया तथा साथ रखने लगा. पुजारी की पत्नी तथा पुत्र के सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे.

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का कारण और रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात बताई और साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त फल से भी अवगत कराया.

उसी दिन से प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे. कई जगहों पर अपनी श्रद्धा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों ही यह व्रत करते हैं. इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं एवं मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: January 21, 2020, 3:44 AM IST
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