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Magh Pradosh Vrat 2021: आज है माघ प्रदोष व्रत, भगवान शिव को खुश करने के लिए पढ़ें ये व्रत कथा

इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन एक साथ करने से कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही व्यक्ति का मन भी पवित्र होता है.
इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन एक साथ करने से कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही व्यक्ति का मन भी पवित्र होता है.

Magh Pradosh Vrat: आज माघ प्रदोष व्रत है. इस दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती (Mata Parvati) का पूजन अत्यंत फलदायी होता है. प्रदोष व्रत की पूजा मुख्य रूप से प्रदोष काल में की जाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 24, 2021, 6:57 AM IST
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Magh Pradosh Vrat 2021: हिन्दू धर्म में पूजा पाठ का विशेष महत्व होता है. हर एक त्योहार और व्रत किसी ईश्वर पर आधारित होता है और उस दिन पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. इसी प्रकार प्रदोष व्रत का भी हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. प्रदोष व्रत किसी भी माह की त्रयोदशी तिथि को होता है. पहला प्रदोष व्रत कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को और दूसरा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है. आज  माघ प्रदोष व्रत है. कहा जाता है इस दिन श्रद्धा भाव से भगवान शिव की पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य की प्राप्ति होती है. आज माघ प्रदोष व्रत है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन अत्यंत फलदायी होता है. प्रदोष व्रत की पूजा मुख्य रूप से प्रदोष काल में की जाती है. मान्यतानुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन एक साथ करने से कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही व्यक्ति का मन भी पवित्र होता है.

पढ़ें माघ प्रदोष व्रत की कथा
प्राचीनकाल में एक गरीब पुजारी हुआ करता था. उस पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पुत्र को साथ लेकर भीख मांगती हुई शाम तक घर वापस आती थी. एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था. उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नहीं गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र जैसा रखने लगी. एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई. वहां उसने ऋषि से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी.

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एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे. उनमें से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया लेकिन राजकुमार वन में ही रह गया।. उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करने लगा. उस कन्या का नाम अंशुमती था. उस दिन राजकुमार घर देरी से लौटा. राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी. तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा कि आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो न, आपका नाम धर्मगुप्त है. अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिवजी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है, क्या आप इस विवाह के लिए तैयार हैं?



राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे दी तो उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ. बाद में राजकुमार ने गंधर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगा. वहां उस महल में वह पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ ले आया तथा साथ रखने लगा. पुजारी की पत्नी तथा पुत्र के सभी दुख व दरिद्रता दूर हो गई और वे सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे.

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एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का कारण और रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात बताई और साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त फल से भी अवगत कराया. उसी दिन से प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे. कई जगहों पर अपनी श्रद्धा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों ही यह व्रत करते हैं. इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं एवं मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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