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Makar Sankranti 2022: आज करें बस एक काम, सूर्य और शनि दोनों होंगे प्रसन्न

Makar Sankranti 2022: आज करें बस एक काम, सूर्य और शनि दोनों होंगे प्रसन्न

मकर संक्रांति 2022

मकर संक्रांति 2022

Makar Sankranti 2022: मकर संक्रांति का पर्व आज मनाया जा रहा है. आज के दिन सूर्य देव (Surya Dev) और उनके पुत्र शनि देव (Shani Dev) को आप प्रसन्न करके अपने जीवन में सुख, धन, धान्य एवं आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं.

    Makar Sankranti 2022: मकर संक्रांति का पर्व आज मनाया जा रहा है. आज का दिन सूर्य उपासना (Surya Puja) के लिए उत्तम है. आज के दिन सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव (Shani Dev) को आप प्रसन्न करके अपने जीवन में सुख, धन, धान्य एवं आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं. मकर संक्रांति को स्नान के बाद सूर्य देव को विधि विधान से जल अर्पित करें. फिर आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya
    Stotra) का पाठ करें. शनि देव के लिए शनि स्तोत्र (Shani Stotra) का पाठ करें. इन दोनों ही स्तोत्र को उपयोगी माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ किया था, तो शनि देव को प्रसन्न करने के लिए राजा दशरथ ने शनि स्तोत्र का पाठ किया था. मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव शनि के घर मकर राशि में आते हैं, इसलिए आप आज पिता और पुत्र दोनों को प्रसन्न करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र और शनि स्तोत्र का पाठ करें.

    मकर संक्रांति पर सूर्य और शनि की पूजा

    आदित्य हृदय स्तोत्र
    ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌॥
    दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌। उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा॥

    राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌। येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे॥
    आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌। जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌॥

    सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌। चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌॥
    रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌। पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌॥

    सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन:। एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि:॥
    एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति:। महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः॥

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    पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु:। वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर:॥
    आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर:॥

    हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌। तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌॥
    हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि:। अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन:॥

    व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग:। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः॥
    आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव:॥

    नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन:। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते॥
    नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम:। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम:॥

    जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम:। नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम:॥
    नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम:। नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते॥

    ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम:॥
    तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम:॥

    तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥
    नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु:। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:॥

    एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित:। एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌॥
    देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु:॥

    एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव॥
    पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌। एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥

    अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌॥
    एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा। धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌॥

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    आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌। त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌॥
    रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌। सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌॥

    अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण:।
    निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥

    शनि स्तोत्र
    नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
    नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।।

    नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
    नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

    नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
    नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।

    नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
    नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

    नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
    सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च।।

    अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
    नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते।।

    तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
    नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।

    ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
    तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।

    देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
    त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

    प्रसाद कुरु मे सौरे वारदो भव भास्करे।
    एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।।

    इसके बाद आप सूर्य देव और शनि देव से अपनी मनोकामना व्यक्त करें. साथ ही पूजा में हुई कमी और त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना भी कर लें.

    (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

    Tags: Dharma Aastha, Makar Sankranti

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