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पढ़ें आचार्य चाणक्य का प्रेरक प्रसंग- 'दूसरा दीपक'

देश की वस्तु की रक्षा अपनी वस्तु के समान करनी चाहिए- Image/shutterstock

देश की वस्तु की रक्षा अपनी वस्तु के समान करनी चाहिए- Image/shutterstock

Motivational Story: चाणक्य (Chanakya) की नीतियों के बारे में आपने कई बार पढ़ा और सुना होगा. आज उनसे जुड़े प्रेरक प्रसंग के बारे में भी जानें.

  • News18Hindi
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    Motivational Story: चाणक्य नीति-शास्त्र के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी नीतियों के बारे में आपने कई बार पढ़ा और सुना होगा. तो कई बार उनकी नीतियों को अपने जीवन में अपनाया भी होगा. आज हम आपको महान राजनीतिज्ञ चाणक्य से जुड़े एक प्रेरक प्रसंग के बारे में बताने जा रहे हैं. ये प्रसंग आपको बेहतर कार्य के लिए प्रेरित करने में मदद करेगा.

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    चाणक्य का प्रेरक प्रसंग-दूसरा दीपक

    चाणक्य की नीतियों और उनकी लोकप्रियता के बारे में सुनकर एक बार एक चीनी दार्शनिक उनसे मिलने आया. जब वह चाणक्य के घर पहुंचा तब तक काफी अंधेरा हो चुका था. घर में प्रवेश करते समय उसने देखा कि तेल के माध्यम से प्रज्जवलित दीपक के प्रकाश में चाणक्य कोई ग्रन्थ लिखने में व्यस्त हैं. जैसे ही चाणक्य की नज़र चीनी दार्शनिक पर पड़ी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया. फिर जल्दी से अपना लेखन कार्य समाप्त कर उस दीपक को बुझा दिया, जिसके प्रकाश में वे आगंतुक के आगमन तक कार्य कर रहे थे.

    इसके बाद चाणक्य एक दूसरा दीपक जलाकर, चीनी दार्शनिक से बातचीत करने लगे. ये देखकर उस चीनी दार्शनिक को काफी आश्चर्य हुआ. उसने सोचा कि अवश्य ही भारत में इस तरह का कोई रिवाज़ होगा. लेकिन फिर भी उसने जिज्ञासावश चाणक्य से पूछा, ”मित्र, मेरे आगमन पर आपने एक दीपक बुझा कर ठीक वैसा ही दूसरा दीपक जला दिया. दोनों में मुझे कोई अंतर नहीं दिखता. क्या भारत में आगंतुक के आने पर नया दीपक जलाने का रिवाज़ है?”

    प्रश्न सुनकर चाणक्य मुस्कुराये और उत्तर दिया, ”नहीं मित्र, ऐसी कोई बात नहीं है. जब आपने मेरे घर में प्रवेश किया, उस समय मैं राज्य का कार्य कर रहा था. इसलिए वह दीपक जला रखा था, जो राजकोष के धन से खरीदे हुए तेल से दीप्यमान था. लेकिन अब मैं आपसे वार्तालाप कर रहा हूं और यह मेरा व्यक्तिगत वार्तालाप है. इसलिए मैं उस दीपक का उपयोग नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करना राजकोष की मुद्रा का दुरुपयोग करना होगा. बस यही कारण है कि मैंने दूसरा दीपक जला लिया. चाणक्य का यह देशप्रेम देखकर वह चीनी दार्शनिक उनके सामने नतमस्तक हो गया.

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    ये सीख मिलती है

    स्वदेश प्रेम का अर्थ है अपने देश की वस्तु की रक्षा भी अपनी वस्तु के समान ही करनी चाहिए. सरकारी चीजों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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